योग दर्शन: पातंजलयोगदर्शनम् का संपूर्ण परिचय | Yoga Darshana: A Comprehensive Guide
1. योग दर्शन का उद्भव और परिचय (Introduction to Yoga Philosophy)
सेश्वर सांख्य (Theistic Samkhya)
योगसूत्र की संरचना
समाधि पाद (51 सूत्र): योग के स्वरूप और चित्त वृत्तियों का वर्णन। साधन पाद (55 सूत्र): क्लेश, क्रियायोग और अष्टांग योग के बहिरंग अंगों का वर्णन। विभूति पाद (55 सूत्र): योग के अंतरंग अंगों और सिद्धियों का वर्णन। कैवल्य पाद (34 सूत्र): मोक्ष, निर्वाण और चित्त के विलीनीकरण का वर्णन।
2. योग की परिभाषा और व्युत्पत्ति (Definition of Yoga)
युज् समाधौ (दिवादिगण): समाधि के अर्थ में। युजिर योगे (रुधादिगण): जोड़ना या मिलन। युज संयमने (चुरादिगण): नियंत्रण या संयमन।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ (योगसूत्र 1.2) अर्थ: चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है।
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥ अर्थ: दुःखरूप संसार के संयोग से रहित होना ही योग है।
3. प्रथम अध्याय: समाधि पाद (Samadhi Pada)
(A) चित्त की भूमियाँ (States of Mind)
क्षिप्त: रजोगुण के कारण अत्यंत चंचल मन (सांसारिक विषयों में भटकना)। मूढ़: तमोगुण के कारण निद्रा, आलस्य और अज्ञान में डूबा मन। विक्षिप्त: सत्व की प्रधानता लेकिन कभी-कभी चंचलता (भक्ति या पूजा में मन का थोड़ा टिकना)। एकाग्र: सत्वगुण की पूर्ण प्रधानता, जहाँ चित्त एक ही विषय पर टिका रहे। यहाँ 'सम्प्रज्ञात समाधि' होती है। निरुद्ध: सभी वृत्तियों का निरोध। यहाँ 'असम्प्रज्ञात समाधि' घटित होती है।
(B) चित्त की वृत्तियाँ (Fluctuations of Mind)
प्रमाण: प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम (सही ज्ञान)। विपर्यय: मिथ्या ज्ञान (भ्रम)। विकल्प: शब्द के ज्ञान से होने वाला वस्तुशून्य ज्ञान (कल्पना)। निद्रा: अभाव के प्रत्यय का अवलंबन करने वाली वृत्ति। स्मृति: अनुभूत विषयों का पुनः प्रकट होना।
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ (1.12) इन वृत्तियों को रोकने के दो उपाय हैं: अभ्यास (निरंतर प्रयत्न) और वैराग्य (विषयों में तृष्णा का अभाव)।
(C) ईश्वर का स्वरूप (Concept of God)
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ (1.24) अर्थात्: जो क्लेश, कर्म, विपाक और वासनाओं से अछूता है, वह 'ईश्वर' है। उसका वाचक शब्द 'प्रणव' (ॐ) है।
4. द्वितीय अध्याय: साधन पाद (Sadhana Pada)
(A) क्रियायोग (Kriya Yoga)
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ (2.1)
तप: द्वंद्वों को सहना। स्वाध्याय: मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन और मंत्र जप। ईश्वर प्रणिधान: सब कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना।
(B) पञ्च क्लेश (Five Afflictions)
अविद्या: अनित्य को नित्य समझना (अज्ञान)। अस्मिता: बुद्धि और आत्मा को एक ही मान लेना (अहंकार)। राग: सुखद विषयों के प्रति आसक्ति। द्वेष: दुःखद विषयों के प्रति घृणा। अभिनिवेश: मृत्यु का भय।
(C) अष्टांग योग (The Eight Limbs of Yoga)
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥ (2.29)
1. यम (Social Ethics)
अहिंसा: किसी को कष्ट न देना। सत्य: यथार्थ बोलना। अस्तेय: चोरी न करना। ब्रह्मचर्य: इंद्रियों पर संयम। अपरिग्रह: अनावश्यक वस्तुओं का संचय न करना।
2. नियम (Personal Observances)
शौच: शुद्धि (आंतरिक और बाह्य)। संतोष: जो प्राप्त है उसमें सुखी रहना। तप: अनुशासन। स्वाध्याय: आत्म-अध्ययन। ईश्वर प्रणिधान: समर्पण।
3. आसन (Posture)
स्थिरसुखमासनम् ॥ (2.46) - जो स्थिर और सुखदायक हो, वही आसन है।
4. प्राणायाम (Breath Control)
5. प्रत्याहार (Withdrawal of Senses)
5. तृतीय अध्याय: विभूति पाद (Vibhuti Pada)
(A) धारणा, ध्यान और समाधि
धारणा: चित्त को एक स्थान (जैसे हृदय कमल या नासिकाग्र) पर बांधना। ध्यान: उस स्थान पर ज्ञान की एकतानता (निरंतर प्रवाह)। समाधि: जब केवल ध्येय वस्तु का ही आभास रहे और अपना स्वरूप शून्य जैसा हो जाए।
त्रयमेकत्र संयमः ॥ (3.4)
(B) सिद्धियाँ (Vibhutis)
अतीत और अनागत का ज्ञान। पशु-पक्षियों की वाणी का ज्ञान। अदृश्य होने की शक्ति (कायारूप संयम)। अणिमा, महिमा, लघिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ। सावधानी: पतंजलि चेतावनी देते हैं कि ये सिद्धियाँ समाधि में बाधक हैं (ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः)।
6. चतुर्थ अध्याय: कैवल्य पाद (Kaivalya Pada)
(A) सिद्धियों के स्रोत
(B) कर्म के प्रकार
(C) कैवल्य का स्वरूप
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥ (4.34) अर्थात्: गुणों का अपने मूल (प्रकृति) में विलीन हो जाना और पुरुष का अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होना ही कैवल्य है।
7. चित्त के विक्षेप और अन्तराय (Obstacles in Yoga)
व्याधि: शारीरिक रोग। स्त्यान: मानसिक अकर्मण्यता। संशय: दुविधा। प्रमाद: सावधानी की कमी। आलस्य: भारीपन। अविरति: विषयों के प्रति वैराग्य का अभाव। भ्रान्तिदर्शन: गलत धारणा। अलब्धभूमिकत्व: समाधि की स्थिति प्राप्त न होना। अनवस्थितत्व: प्राप्त स्थिति में टिक न पाना।
8. योग दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ और व्याख्याकार
योगसूत्र: महर्षि पतंजलि (मूल ग्रन्थ)। व्यासभाष्य: महर्षि वेदव्यास (सर्वश्रेष्ठ व्याख्या)। तत्त्ववैशारदी: वाचस्पति मिश्र। भोजवृत्ति: राजा भोज। योगवार्तिक: विज्ञानभिक्षु। योगमणिप्रभा: रामानन्द सरस्वती।
9. निष्कर्ष (Conclusion)
"चित्तस्य शुद्धये योगः" - चित्त की शुद्धि के लिए ही योग है।
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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-
योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )
(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-
दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-