वेदान्त दर्शन और वेदान्तसार: एक संपूर्ण परिचय
वेदान्त का अर्थ और स्वरूप
"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्रह्मसूत्र १.१.१) (अर्थ: अब ब्रह्म को जानने की इच्छा की जाती है।)
वेदान्त के प्रमुख संप्रदाय और आचार्य
अद्वैत वेदान्त: आचार्य शंकर (शारीरिक भाष्य) विशिष्टाद्वैत: रामानुजाचार्य (श्रीभाष्य) द्वैत वेदान्त: मध्वाचार्य (पूर्णप्रज्ञ भाष्य) द्वैताद्वैत: निम्बार्काचार्य (वेदान्त पारिजात) शुद्धाद्वैत: वल्लभाचार्य (अणुभाष्य) अचिन्त्यभेदाभेद: बलदेव विद्याभूषण (गोविन्द भाष्य) भेदाभेद: भास्कराचार्य (भास्कर भाष्य)
गोवर्धन मठ (पुरी): ऋग्वेद - "प्रज्ञानं ब्रह्म" शृंगेरी पीठ (कर्नाटक): यजुर्वेद - "अहं ब्रह्मास्मि" शारदा पीठ (द्वारका): सामवेद - "तत्त्वमसि" ज्योतिष् पीठ (बद्रीनाथ): अथर्ववेद - "अयमात्मा ब्रह्म"
वेदान्तसार: सदानन्द योगीन्द्र का अमर ग्रंथ
"शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम्। आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः॥"
"अखण्डं सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम्। आत्मानमखिलाधारमाश्रयेऽभीष्टसिद्धये॥" (अर्थ: मैं उन अखंड, सच्चिदानन्द, वाणी और मन के विषय से परे तथा समस्त जगत के आधारभूत आत्मा का आश्रय लेता हूँ।)
अनुबन्ध-चतुष्टय: वेदान्त के चार द्वार
अधिकारी: वह व्यक्ति जो साधन-चतुष्टय से संपन्न हो, वेदों का ज्ञाता हो और निष्काम भाव से कर्म करने वाला हो। विषय: जीव और ब्रह्म की एकता (शुद्ध चैतन्य) ही इसका मुख्य विषय है। सम्बन्ध: प्रतिपाद्य (ब्रह्म) और प्रतिपादक (उपनिषद) के बीच बोध्य-बोधक भाव संबंध। प्रोजन: अज्ञान की निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति।
साधन-चतुष्टय (अधिकारी के लक्षण)
नित्यानित्यवस्तुविवेक: ब्रह्म सत्य है और जगत अनित्य, ऐसा विवेक। इहामुत्रार्थफलभोगविराग: इस लोक और परलोक के सुखों से विरक्ति। शमादिषट्कसम्पत्ति: शम (मन निग्रह), दम (इन्द्रिय निग्रह), उपरति, तितिक्षा (धैर्य), समाधान (एकाग्रता) और श्रद्धा। मुमुक्षुत्व: मोक्ष की तीव्र इच्छा।
अज्ञान: माया का खेल
"अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधि भावरूपं यत्किञ्चिदिति॥"
आवरण शक्ति: यह सत्य को ढँक लेती है (जैसे बादल सूर्य को ढँक लेता है)। विक्षेप शक्ति: यह असत्य को सत्य के रूप में दिखाती है (जैसे रस्सी में साँप का दिखना)।
समष्टि (Universal): इसे 'माया' कहते हैं। इससे उपहित चैतन्य ईश्वर कहलाता है। व्यष्टि (Individual): इसे 'अविद्या' कहते हैं। इससे उपहित चैतन्य प्राज्ञ कहलाता है।
अध्यारोप और अपवाद: सृष्टि और प्रलय
"असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद्वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः।"
सृष्टिक्रम और लिंगशरीरोत्पत्ति
५ ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण) ५ कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) ५ प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) बुद्धि और मन।
विज्ञानमय कोश: बुद्धि + ज्ञानेन्द्रियाँ। मनोमय कोश: मन + ज्ञानेन्द्रियाँ। प्राणमय कोश: प्राण + कर्मेन्द्रियाँ।
पंचीकरण (Grossification)
"द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्वस्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात्पञ्च पञ्च ते॥"
विवर्तवाद बनाम परिणामवाद
परिणामवाद: जब कारण वास्तव में कार्य में बदल जाए (जैसे दूध से दही)। विवर्तवाद: जब कारण बदले बिना ही कार्य के रूप में भासित हो (जैसे रस्सी में साँप)। वेदान्त विवर्तवाद को मानता है।
"अतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विवर्त इत्युदीरितः।"
महावाक्य विवेचन: तत्त्वमसि
सामानाधिकरण्य संबंध: 'तत्' और 'त्वम्' दोनों एक ही चैतन्य को बताते हैं। विशेषण-विशेष्य भाव: परोक्षता और अपरोक्षता के भेदों को दूर करना। लक्ष्य-लक्षण संबंध: इसे 'जहदजहलक्षणा' या 'भागलक्षणा' कहते हैं। इसमें विरुद्ध अंशों (परोक्षता/अपरोक्षता) को त्यागकर शुद्ध चैतन्य अंश को ग्रहण किया जाता है।
साधना के सोपान: श्रवण, मनन, निदिध्यासन
श्रवण: उपनिषदों के तात्पर्य को ६ लिंगों (उपक्रम-उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद, उपपत्ति) द्वारा समझना। मनन: सुने हुए अर्थ का तर्कों द्वारा निरंतर चिंतन। निदिध्यासन: विजातीय विचारों को हटाकर सजातीय ब्रह्म-वृत्ति का प्रवाह।
समाधि: चेतना की उच्चतम अवस्था
सविकल्पक समाधि: इसमें ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद बना रहता है, परंतु बुद्धि ब्रह्म में स्थित होती है। निर्विकल्पक समाधि: इसमें ज्ञाता-ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है और केवल अखंड चैतन्य शेष रहता है। जैसे जल में नमक पूरी तरह घुल जाता है।
समाधि के विघ्न
लय: चित्त का निद्रा में चले जाना। विक्षेप: चित्त का अन्य विषयों में भटकना। कषाय: राग-द्वेष की पुरानी वासनाओं के कारण चित्त का स्तब्ध होना। रसास्वाद: सविकल्पक आनंद में ही अटक जाना और निर्विकल्पक तक न पहुँचना।
जीवन्मुक्ति: जीते जी मोक्ष
"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥" (मुण्डकोपनिषद २.२.८)
वेदान्तसार के अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
पाँच महावाक्य: उपनिषदों के ये वाक्य भारतीय दर्शन के आधार हैं— उत्पत्ति, स्थिति, लय, प्रवेश और नियमन वाक्य। अन्य दर्शनों का खंडन: सदानन्द ने चार्वाक (शरीर को आत्मा मानने वाले), बौद्ध (बुद्धि या शून्य को आत्मा मानने वाले) और नैयायिकों के मतों का खंडन कर 'शुद्ध चैतन्य' को ही आत्मा सिद्ध किया है। टीकाएँ: वेदान्तसार पर नृसिंह सरस्वती की 'सुबोधिनी', रामतीर्थ की 'विद्वन्मनोरञ्जनी' और आपदेव की 'बालबोधिनी' प्रसिद्ध टीकाएँ हैं।
निष्कर्ष
"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।" (ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है।)
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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-
योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )
(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-
दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-