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वेदान्त दर्शन और वेदान्तसार: एक संपूर्ण परिचय

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वेदान्त दर्शन और वेदान्तसार: एक संपूर्ण परिचय

वेदान्त का अर्थ और स्वरूप

वेदान्त शब्द 'वेद' और 'अन्त' के मेल से बना है। इसका अर्थ केवल वेदों की समाप्ति नहीं, बल्कि वेदों के ज्ञान का चरम लक्ष्य है। उपनिषदों को वेदान्त कहा जाता है क्योंकि वे वैदिक साहित्य के अंतिम भाग हैं और उनमें वेदों का गूढ़तम ज्ञान समाहित है।

महर्षि व्यास द्वारा रचित 'ब्रह्मसूत्र' इस दर्शन का मूल स्तंभ है। वेदान्त दर्शन को 'उत्तर मीमांसा' भी कहा जाता है। इसका प्रथम सूत्र ही जिज्ञासा की मशाल जलाता है:

"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्रह्मसूत्र १.१.१)
(अर्थ: अब ब्रह्म को जानने की इच्छा की जाती है।)

यह दर्शन स्पष्ट करता है कि ब्रह्म ही एकमात्र शाश्वत सत्ता है, जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और आनंदमय है।


वेदान्त के प्रमुख संप्रदाय और आचार्य

वेदान्त दर्शन समय के साथ विभिन्न शाखाओं में विभाजित हुआ, जिनमें प्रमुख ग्यारह भाष्य और संप्रदाय निम्नलिखित हैं:

  1. अद्वैत वेदान्त: आचार्य शंकर (शारीरिक भाष्य)

  2. विशिष्टाद्वैत: रामानुजाचार्य (श्रीभाष्य)

  3. द्वैत वेदान्त: मध्वाचार्य (पूर्णप्रज्ञ भाष्य)

  4. द्वैताद्वैत: निम्बार्काचार्य (वेदान्त पारिजात)

  5. शुद्धाद्वैत: वल्लभाचार्य (अणुभाष्य)

  6. अचिन्त्यभेदाभेद: बलदेव विद्याभूषण (गोविन्द भाष्य)

  7. भेदाभेद: भास्कराचार्य (भास्कर भाष्य)

आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की:

  • गोवर्धन मठ (पुरी): ऋग्वेद - "प्रज्ञानं ब्रह्म"

  • शृंगेरी पीठ (कर्नाटक): यजुर्वेद - "अहं ब्रह्मास्मि"

  • शारदा पीठ (द्वारका): सामवेद - "तत्त्वमसि"

  • ज्योतिष् पीठ (बद्रीनाथ): अथर्ववेद - "अयमात्मा ब्रह्म"


वेदान्तसार: सदानन्द योगीन्द्र का अमर ग्रंथ

वेदान्तसार (१६वीं शताब्दी) अद्वैत वेदान्त का एक 'प्रकरण ग्रंथ' है। प्रकरण ग्रंथ वह होता है जो शास्त्र के एक विशिष्ट अंश का निरूपण करता है:

"शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम्।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः॥"

सदानन्द ने इस ग्रंथ का प्रारंभ मंगलाचरण से किया है, जो ब्रह्म के स्वरूप को परिभाषित करता है:

"अखण्डं सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम्।
आत्मानमखिलाधारमाश्रयेऽभीष्टसिद्धये॥"
(अर्थ: मैं उन अखंड, सच्चिदानन्द, वाणी और मन के विषय से परे तथा समस्त जगत के आधारभूत आत्मा का आश्रय लेता हूँ।)


अनुबन्ध-चतुष्टय: वेदान्त के चार द्वार

किसी भी शास्त्र के अध्ययन के लिए चार अनुबन्धों का होना आवश्यक है:

  1. अधिकारी: वह व्यक्ति जो साधन-चतुष्टय से संपन्न हो, वेदों का ज्ञाता हो और निष्काम भाव से कर्म करने वाला हो।

  2. विषय: जीव और ब्रह्म की एकता (शुद्ध चैतन्य) ही इसका मुख्य विषय है।

  3. सम्बन्ध: प्रतिपाद्य (ब्रह्म) और प्रतिपादक (उपनिषद) के बीच बोध्य-बोधक भाव संबंध।

  4. प्रोजन: अज्ञान की निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति।

साधन-चतुष्टय (अधिकारी के लक्षण)

वेदान्त का अधिकारी वही है जिसमें ये चार गुण हों:

  • नित्यानित्यवस्तुविवेक: ब्रह्म सत्य है और जगत अनित्य, ऐसा विवेक।

  • इहामुत्रार्थफलभोगविराग: इस लोक और परलोक के सुखों से विरक्ति।

  • शमादिषट्कसम्पत्ति: शम (मन निग्रह), दम (इन्द्रिय निग्रह), उपरति, तितिक्षा (धैर्य), समाधान (एकाग्रता) और श्रद्धा।

  • मुमुक्षुत्व: मोक्ष की तीव्र इच्छा।


अज्ञान: माया का खेल

अद्वैत वेदान्त में अज्ञान (माया) को 'अनिर्वचनीय' कहा गया है। यह न तो 'सत्' है और न ही 'असत्'।

"अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधि भावरूपं यत्किञ्चिदिति॥"

अज्ञान की दो शक्तियाँ होती हैं:

  1. आवरण शक्ति: यह सत्य को ढँक लेती है (जैसे बादल सूर्य को ढँक लेता है)।

  2. विक्षेप शक्ति: यह असत्य को सत्य के रूप में दिखाती है (जैसे रस्सी में साँप का दिखना)।

अज्ञान के दो स्तर हैं:

  • समष्टि (Universal): इसे 'माया' कहते हैं। इससे उपहित चैतन्य ईश्वर कहलाता है।

  • व्यष्टि (Individual): इसे 'अविद्या' कहते हैं। इससे उपहित चैतन्य प्राज्ञ कहलाता है।


अध्यारोप और अपवाद: सृष्टि और प्रलय

वेदान्त में जगत की उत्पत्ति को 'अध्यारोप' कहा गया है। वस्तु (ब्रह्म) पर अवस्तु (जगत) का आरोप ही अध्यारोप है।

"असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद्वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः।"

सृष्टिक्रम और लिंगशरीरोत्पत्ति

ईश्वर से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है। इन सूक्ष्म भूतों से लिंगशरीर (सूक्ष्म शरीर) बनता है, जिसके १७ अवयव होते हैं:

  • ५ ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण)

  • ५ कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ)

  • ५ प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान)

  • बुद्धि और मन।

इन अवयवों से तीन कोश बनते हैं:

  1. विज्ञानमय कोश: बुद्धि + ज्ञानेन्द्रियाँ।

  2. मनोमय कोश: मन + ज्ञानेन्द्रियाँ।

  3. प्राणमय कोश: प्राण + कर्मेन्द्रियाँ।

पंचीकरण (Grossification)

स्थूल जगत के निर्माण के लिए पंचीकरण प्रक्रिया होती है। इसमें प्रत्येक महाभूत को दो बराबर भागों में बाँटा जाता है, फिर एक भाग को पुनः चार भागों में बाँटकर अन्य भूतों के साथ मिलाया जाता है।

"द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः।
स्वस्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात्पञ्च पञ्च ते॥"


विवर्तवाद बनाम परिणामवाद

  • परिणामवाद: जब कारण वास्तव में कार्य में बदल जाए (जैसे दूध से दही)।

  • विवर्तवाद: जब कारण बदले बिना ही कार्य के रूप में भासित हो (जैसे रस्सी में साँप)। वेदान्त विवर्तवाद को मानता है।

"अतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विवर्त इत्युदीरितः।"


महावाक्य विवेचन: तत्त्वमसि

वेदान्त का चरम लक्ष्य महावाक्यों के अर्थ को समझना है। "तत्त्वमसि" (वह तू है) महावाक्य में तीन संबंध होते हैं:

  1. सामानाधिकरण्य संबंध: 'तत्' और 'त्वम्' दोनों एक ही चैतन्य को बताते हैं।

  2. विशेषण-विशेष्य भाव: परोक्षता और अपरोक्षता के भेदों को दूर करना।

  3. लक्ष्य-लक्षण संबंध: इसे 'जहदजहलक्षणा' या 'भागलक्षणा' कहते हैं। इसमें विरुद्ध अंशों (परोक्षता/अपरोक्षता) को त्यागकर शुद्ध चैतन्य अंश को ग्रहण किया जाता है।

इसी प्रकार अनुभव वाक्य है: "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)।


साधना के सोपान: श्रवण, मनन, निदिध्यासन

ब्रह्म साक्षात्कार के लिए तीन चरण अनिवार्य हैं:

  1. श्रवण: उपनिषदों के तात्पर्य को ६ लिंगों (उपक्रम-उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद, उपपत्ति) द्वारा समझना।

  2. मनन: सुने हुए अर्थ का तर्कों द्वारा निरंतर चिंतन।

  3. निदिध्यासन: विजातीय विचारों को हटाकर सजातीय ब्रह्म-वृत्ति का प्रवाह।


समाधि: चेतना की उच्चतम अवस्था

समाधि दो प्रकार की होती है:

  1. सविकल्पक समाधि: इसमें ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद बना रहता है, परंतु बुद्धि ब्रह्म में स्थित होती है।

  2. निर्विकल्पक समाधि: इसमें ज्ञाता-ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है और केवल अखंड चैतन्य शेष रहता है। जैसे जल में नमक पूरी तरह घुल जाता है।

समाधि के आठ अंग योगसूत्र के समान ही हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

समाधि के विघ्न

साधना के मार्ग में चार प्रमुख विघ्न आते हैं:

  1. लय: चित्त का निद्रा में चले जाना।

  2. विक्षेप: चित्त का अन्य विषयों में भटकना।

  3. कषाय: राग-द्वेष की पुरानी वासनाओं के कारण चित्त का स्तब्ध होना।

  4. रसास्वाद: सविकल्पक आनंद में ही अटक जाना और निर्विकल्पक तक न पहुँचना।


जीवन्मुक्ति: जीते जी मोक्ष

वेदान्त की सबसे सुंदर अवधारणा 'जीवन्मुक्ति' है। जब मनुष्य को अखंड ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है, तो वह जीवित रहते हुए भी समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है।

"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥" (मुण्डकोपनिषद २.२.८)

जीवन्मुक्त व्यक्ति का शरीर प्रारब्ध कर्मों के कारण तब तक बना रहता है जब तक वे समाप्त नहीं हो जाते, जैसे कुम्हार का चाक हाथ हटा लेने के बाद भी पिछले वेग के कारण घूमता रहता है।


वेदान्तसार के अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • पाँच महावाक्य: उपनिषदों के ये वाक्य भारतीय दर्शन के आधार हैं— उत्पत्ति, स्थिति, लय, प्रवेश और नियमन वाक्य।

  • अन्य दर्शनों का खंडन: सदानन्द ने चार्वाक (शरीर को आत्मा मानने वाले), बौद्ध (बुद्धि या शून्य को आत्मा मानने वाले) और नैयायिकों के मतों का खंडन कर 'शुद्ध चैतन्य' को ही आत्मा सिद्ध किया है।

  • टीकाएँ: वेदान्तसार पर नृसिंह सरस्वती की 'सुबोधिनी', रामतीर्थ की 'विद्वन्मनोरञ्जनी' और आपदेव की 'बालबोधिनी' प्रसिद्ध टीकाएँ हैं।


निष्कर्ष

वेदान्त दर्शन केवल बौद्धिक विमर्श नहीं है, बल्कि यह स्वयं को जानने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक यात्रा है। सदानन्द का 'वेदान्तसार' हमें उस यात्रा के लिए आवश्यक मानचित्र प्रदान करता है। अज्ञान के आवरण को हटाकर जब जीव अपनी वास्तविक सत्ता को पहचानता है, तभी वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर 'सच्चिदानन्द' रूप में स्थित होता है।

जैसा कि आदि शंकराचार्य ने कहा है:

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।"
(ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है।)

यह दर्शन हमें सिखाता है कि हम यह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि वह अनंत प्रकाश हैं जो कभी बुझता नहीं। वेदान्त का अध्ययन मानवता को संकीर्णताओं से ऊपर उठाकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और आत्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है।


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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-

योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )


(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-

दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-



मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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