वैशेषिक दर्शन और तर्कसंग्रह: भारतीय तर्कशास्त्र और भौतिक विज्ञान का संपूर्ण परिचय
1. वैशेषिक दर्शन: मूल और प्रवर्तक
महर्षि कणाद: 'परमाणु' के प्रथम अन्वेषक
उच्छवृत्ति: वे खेतों में गिरे हुए धान्य के कणों को चुनकर अपना जीवन निर्वाह करते थे, इसलिए उन्हें 'कणाद' (कण + अद - कण खाने वाला) कहा गया। परमाणुवाद: उन्होंने जगत के मूल तत्व के रूप में 'कण' यानी परमाणु (Atom) का सूक्ष्म विवेचन किया। औलूक्य दर्शन: कहा जाता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ईश्वर ने 'उलूक' (उल्लू) पक्षी के रूप में उन्हें दर्शन दिए और शास्त्र का उपदेश दिया। इसी कारण इस दर्शन को 'औलूक्य दर्शन' भी कहा जाता है।
2. तर्कसंग्रह: ग्रंथ परिचय और मंगलाचरण
मंगलाचरण (Shloka)
निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम्। बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसंग्रहः॥
तर्कसंग्रह का अर्थ
तर्क: 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्त इति तर्काः' - अर्थात् वे पदार्थ जिनका प्रतिपादन किया जाए (द्रव्यादि सात पदार्थ)। संग्रह: संक्षेप में उद्देश्य, लक्षण और परीक्षा का निरूपण करना।
3. सप्त पदार्थ (The Seven Categories)
“द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायाऽभावाः सप्तपदार्थाः”
द्रव्य (Substance): क्रिया और गुण का आश्रय। गुण (Quality): जो द्रव्य में रहे लेकिन स्वयं निर्गुण हो। कर्म (Action/Motion): जो संयोग और विभाग का कारण हो। सामान्य (Universality): जो अनेक में एक रूप से रहे (जाति)। विशेष (Particularity): जो नित्य द्रव्यों को एक-दूसरे से अलग करे। समवाय (Inherence): नित्य संबंध। अभाव (Non-existence): किसी वस्तु की अनुपस्थिति।
4. द्रव्यों का विस्तृत विवेचन (Nine Substances)
“पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव”
1. पृथिवी (Earth)
लक्षण: 'तत्र गन्धवती पृथिवी' (जिसमें गन्ध हो)। भेद: नित्य (परमाणु रूप) और अनित्य (कार्य रूप)। त्रिविध स्वरूप: शरीर, इन्द्रिय (घ्राण) और विषय (मिट्टी, पत्थर)।
2. जल (Water)
लक्षण: 'शीतस्पर्शवत्यः आपः' (जिसका स्पर्श शीतल हो)। भेद: नित्य और अनित्य। इन्द्रिय: रसन (जीभ)।
3. तेज (Fire)
लक्षण: 'उष्णस्पर्शवत्तेजः' (जिसका स्पर्श गर्म हो)। चार प्रकार के विषय: भौम: अग्नि। दिव्य: बिजली। औदर्य: जठराग्नि (पाचन शक्ति)। आकरज: सोना-चांदी (खनिज)।
4. वायु (Air)
लक्षण: 'रूपरहितः स्पर्शवान्वायुः' (रूपहीन किंतु स्पर्शयुक्त)। प्राण: शरीर के भीतर संचरण करने वाली वायु 'प्राण' है, जो उपाधि भेद से पाँच प्रकार की है (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान)।
5. आकाश (Ether)
लक्षण: 'शब्दगुणकमाकाशम्' (जिसका गुण शब्द है)। यह एक, विभु (सर्वव्यापी) और नित्य है।
6. काल (Time)
'अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः' - भूत, भविष्य, वर्तमान के व्यवहार का कारण।
7. दिक् (Space/Direction)
'प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिक' - पूर्व, पश्चिम आदि दिशाओं के ज्ञान का कारण।
8. आत्मा (Soul)
लक्षण: 'ज्ञानाधिकरणमात्मा' (ज्ञान का आधार)। भेद: परमात्मा: ईश्वर, जो सर्वज्ञ और एक है। जीवात्मा: जो प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न है।
9. मन (Mind)
'सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः' - सुख-दुःख की अनुभूति का साधन। यह परमाणु रूप और नित्य है।
5. चौबीस गुण (24 Qualities)
रूप (Color), 2. रस (Taste), 3. गन्ध (Smell), 4. स्पर्श (Touch), 5. संख्या (Number), 6. परिमाण (Magnitude), 7. पृथक्त्व (Distinctness), 8. संयोग (Conjunction), 9. विभाग (Disjunction), 10. परत्व (Remoteness), 11. अपरत्व (Proximity), 12. गुरुत्व (Weight), 13. द्रवत्व (Fluidity), 14. स्नेह (Viscidity), 15. शब्द (Sound), 16. बुद्धि (Knowledge), 17. सुख (Pleasure), 18. दुःख (Pain), 19. इच्छा (Desire), 20. द्वेष (Aversion), 21. प्रयत्न (Effort), 22. धर्म (Merit), 23. अधर्म (Demerit), 24. संस्कार (Impression)।
6. कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय
कर्म (Motion)
उत्क्षेपण: ऊपर फेंकना। अपक्षेपण: नीचे फेंकना। आकुञ्चन: सिकोड़ना। प्रसारण: फैलाना। गमन: अन्य सभी प्रकार की गतियाँ।
सामान्य (Universality)
जो नित्य हो और अनेक में व्याप्त हो (जैसे मनुष्यत्व जाति)। यह दो प्रकार का है: 'पर' (अधिक देश में रहने वाला - सत्ता) और 'अपर' (न्यून देश में रहने वाला - जैसे द्रव्यत्व)।
विशेष (Particularity)
यह केवल नित्य द्रव्यों (परमाणुओं) में रहता है। यह वह तत्व है जो दो समान दिखने वाले परमाणुओं को एक-दूसरे से भिन्न करता है।
समवाय (Inherence)
'नित्यसम्बन्धः समवायः' - ऐसा संबंध जो वस्तुओं के अलग होने पर वस्तु का विनाश कर दे (जैसे तन्तु और पट का संबंध)।
7. अभाव का स्वरूप (Non-existence)
प्रागभाव: वस्तु की उत्पत्ति से पहले उसका न होना। प्रध्वंसाभाव: विनाश के बाद वस्तु का अभाव। अत्यन्ताभाव: तीनों कालों में अभाव (जैसे 'वायु में रूप नहीं है')। अन्योन्याभाव: एक वस्तु का दूसरी वस्तु न होना (जैसे 'घड़ा कपड़ा नहीं है')।
8. प्रमाण मीमांसा: ज्ञान कैसे प्राप्त करें?
“प्रत्यक्षानुमानोपमानशाब्दभेदात् प्रमाणानि चत्वारि”
I. प्रत्यक्ष प्रमाण (Perception)
संयोग: आँख से घड़ा देखना। संयुक्त-समवाय: घड़े का रंग देखना। संयुक्त-समवेत-समवाय: रंग की जाति (रूपत्व) देखना। समवाय: कान से शब्द सुनना। समवेत-समवाय: शब्द की जाति (शब्दत्व) सुनना। विशेषण-विशेष्यभाव: अभाव का प्रत्यक्ष (जैसे ज़मीन पर घड़े का न होना)।
II. अनुमान प्रमाण (Inference)
व्याप्ति: 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निः' (जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है)। पञ्चावयव वाक्य: दूसरे को समझाने के लिए पाँच चरणों का प्रयोग: प्रतिज्ञा (पर्वत आग वाला है)। हेतु (क्योंकि वहाँ धुआँ है)। उदाहरण (जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है, जैसे रसोई)। उपनय (इस पर्वत पर भी वैसा ही धुआँ है)। निगमन (इसलिए यह पर्वत आग वाला है)।
III. उपमान प्रमाण (Comparison)
IV. शब्द प्रमाण (Verbal Testimony)
आकांक्षा: पदों की एक-दूसरे की अपेक्षा। योग्यता: अर्थ में बाधा न होना (जैसे 'आग से सींचना' योग्य नहीं है)। सन्निधि: पदों का बिना विलम्ब के उच्चारण।
9. कार्य-कारण सिद्धांत (Causality)
समवायि कारण: जिसमें कार्य उत्पन्न हो (धागा कपड़े का समवायि कारण है)। असमवायि कारण: जो समवायि कारण में रहकर कार्य में मदद करे (धागों का संयोग)। निमित्त कारण: जो अलग रहकर कार्य बनाए (जुलाहा, मशीन)।
10. हेत्वाभास: तर्क के दोष
सव्यभिचार: हेतु का भटक जाना। विरुद्ध: जो साध्य के विपरीत हो। सत्प्रतिपक्ष: जिसका विरोधी तर्क मौजूद हो। असिद्ध: जिसका आधार ही गलत हो। बाधित: जिसे प्रत्यक्ष से ही झूठ प्रमाणित किया जा सके (जैसे 'अग्नि ठंडी है')।
11. न्याय दर्शन और तर्कशास्त्र का महत्व
प्रदीपः सर्वविद्यानां उपायः सर्वकर्मणाम्। आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षिकी मता॥
12. वैशेषिक धारा के प्रमुख आचार्य और ग्रंथ
प्रशस्तपाद: 'पदार्थधर्मसंग्रह' (वैशेषिक का सबसे महत्वपूर्ण भाष्य)। उदयनाचार्य: 'किरणावली' और 'न्यायकुसुमांजलि' (ईश्वर की सिद्धि)। श्रीधराचार्य: 'न्यायकन्दली'। शिवादित्य: 'सप्तपदार्थी' (न्याय और वैशेषिक को जोड़ने वाले प्रथम आचार्य)।
निष्कर्ष
UGC - net सम्पुर्ण संस्कृत सामग्री कोड - २५ पुरा सिलेबस
(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-
योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )
(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-
दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-