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वैशेषिक दर्शन तर्कभाषा सम्पूर्ण परिचय

वैशेषिक दर्शन तर्कभाषा सम्पूर्ण परिचय केशव मिश्र तर्कभाषा - पदार्थ, कारण, प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) प्रामाण्यवाद, प्रमेय

तर्कभाषा: न्याय-वैशेषिक दर्शन का तार्किक और वैज्ञानिक विवेचन

प्रस्तावना: तर्कशक्ति का आधार 'तर्कभाषा'

भारतीय दर्शन की विशाल परंपरा में न्याय दर्शन को 'प्रमाणशास्त्र' और 'तर्कशास्त्र' की संज्ञा दी गई है। महर्षि गौतम द्वारा प्रवर्तित न्यायसूत्रों को सरल और सुबोध रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय आचार्य केशव मिश्र को जाता है। उनकी कालजयी रचना 'तर्कभाषा' न केवल न्याय के 16 पदार्थों की व्याख्या करती है, बल्कि वैशेषिक दर्शन के भौतिक सिद्धांतों को भी आत्मसात करती है।

इस ग्रंथ की व्युत्पत्ति इसके नाम में ही निहित है:

"तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्ते इति तर्काः (प्रमाणादयः षोडश पदार्थाः) ते भाष्यन्ते अनया इति तर्कभाषा।"
अर्थात् वह भाषा या ग्रंथ जिसके माध्यम से प्रमाण आदि 16 पदार्थों का प्रतिपादन किया जाए, वह 'तर्कभाषा' है।


1. मंगलाचरण और ग्रंथ का उद्देश्य

आचार्य केशव मिश्र ने ग्रंथ के प्रारंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि यह ग्रंथ उन 'बालकों' (शिष्यों) के लिए है जो कठिन शास्त्रों से घबराते हैं लेकिन सत्य को जानने की जिज्ञासा रखते हैं।

वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण (Shloka)

बालोऽपि यो न्यायनये प्रवेशम्, अल्पेन वाञ्छत्यलसः श्रुतेन।
संक्षिप्तयुक्त्यन्विततर्कभाषा, प्रकाश्यते तस्य कृते मयैषा॥

अर्थ: "जो आलसी बालक (अल्प बुद्धि वाला) भी बहुत कम परिश्रम से न्याय शास्त्र के सिद्धांतों में प्रवेश करना चाहता है, उसके लिए मैं संक्षिप्त युक्तियों से युक्त इस 'तर्कभाषा' की रचना कर रहा हूँ।"


2. न्याय दर्शन के 16 पदार्थ (The 16 Categories)

न्याय दर्शन का मुख्य लक्ष्य 'मोक्ष' (निःश्रेयस) की प्राप्ति है। महर्षि गौतम के अनुसार, इन 16 पदार्थों के तत्वज्ञान से ही मोक्ष प्राप्त होता है:

  1. प्रमाण, 2. प्रमेय, 3. संशय, 4. प्रयोजन, 5. दृष्टान्त, 6. सिद्धान्त, 7. अवयव, 8. तर्क, 9. निर्णय, 10. वाद, 11. जल्प, 12. वितण्डा, 13. हेत्वाभास, 14. छल, 15. जाति, 16. निग्रहस्थान।

न्याय शास्त्र की पद्धति तीन चरणों में चलती है:

  • उद्देश: नाम मात्र से वस्तु का कथन।

  • लक्षण: उस वस्तु के असाधारण धर्म का वर्णन।

  • परीक्षा: यह जाँचना कि लक्षण सही है या नहीं।


3. ज्ञान की मीमांसा: प्रमाण, प्रमा और करण

तर्कभाषा में ज्ञान की प्रक्रिया को वैज्ञानिक ढंग से समझाया गया है।

प्रमा और प्रमाण

  • प्रमाण: 'प्रमाकरणं प्रमाणं' - प्रमा (यथार्थ ज्ञान) के साधन को प्रमाण कहते हैं।

  • प्रमा: 'यथार्थानुभवः प्रमा' - वस्तु जैसी है, उसे वैसा ही अनुभव करना प्रमा है। इसमें संशय, विपर्यय और तर्क शामिल नहीं होते।

कारण और कार्य (Causality)

किसी भी कार्य की उत्पत्ति के लिए 'कारण' का होना अनिवार्य है।

“यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत्कारणम्”
अर्थात् जो कार्य से पूर्व निश्चित रूप से विद्यमान हो और जो अनावश्यक (अन्यथासिद्ध) न हो, वह कारण है।

कारण के तीन प्रकार:

  1. समवायिकारण: जिसमें कार्य समवाय संबंध से उत्पन्न होता है (जैसे मिट्टी घड़े का, तंतु कपड़े का)।

  2. असमवायिकारण: जो समवायि कारण में रहकर कार्य में सहायता करे (जैसे तंतुओं का संयोग)।

  3. निमित्तकारण: जो इन दोनों से भिन्न हो (जैसे जुलाहा या कुम्हार)।


4. प्रत्यक्ष प्रमाण (Perception)

प्रत्यक्ष का अर्थ है साक्षात् अनुभव।

"साक्षात्कारिप्रमाकरणं प्रत्यक्षम्"

इन्द्रिय और पदार्थ के मिलन को सन्निकर्ष कहते हैं। तर्कभाषा में छह प्रकार के सन्निकर्षों का वर्णन है:

  1. संयोग: आँख का घड़े से मिलना।

  2. संयुक्तसमवाय: घड़े के रूप (रंग) को देखना।

  3. संयुक्तसमवेतसमवाय: रूप की जाति (रूपत्व) का ज्ञान।

  4. समवाय: कान से शब्द सुनना (कान का छिद्र आकाश है, शब्द उसका गुण)।

  5. समवेतसमवाय: शब्द की जाति (शब्दत्व) का ज्ञान।

  6. विशेषण-विशेष्यभाव: अभाव का ज्ञान (जैसे भूमि पर घड़ा नहीं है)।


5. अनुमान प्रमाण (Inference)

अनुमान का अर्थ है - वह ज्ञान जो प्रत्यक्ष के बाद (अनु) होता है।

"लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्"

अनुमान के लिए 'व्याप्ति' का होना अनिवार्य है। व्याप्ति वह अविनाभावी नियम है जो कहता है कि 'जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग है'।

अनुमान के भेद:

  • स्वार्थानुमान: अपने स्वयं के संशय को दूर करने के लिए किया गया मानसिक अनुमान।

  • परार्थानुमान: दूसरों को समझाने के लिए प्रयुक्त पाँच अवयवों वाला तर्क।

पञ्चावयव वाक्य:

  1. प्रतिज्ञा: पर्वत अग्निमान है।

  2. हेतु: क्योंकि वहाँ धुआँ है।

  3. उदाहरण: जहाँ धुआँ होता है, वहाँ आग होती है (जैसे रसोई)।

  4. उपनय: इस पर्वत पर वैसा ही धुआँ है जो आग से व्याप्त है।

  5. निगमन: इसलिए यह पर्वत अग्निमान है।


6. हेत्वाभास: तार्किक दोष (Logical Fallacies)

जो हेतु (कारण) सही न हो लेकिन सही जैसा दिखे, उसे 'हेत्वाभास' कहते हैं। ये पाँच प्रकार के होते हैं:

  1. असिद्ध: जिसका आधार ही सिद्ध न हो (जैसे 'आकाश कमल सुगंधित है')।

  2. विरुद्ध: जो साध्य के विपरीत हो।

  3. अनैकान्तिक (सव्यभिचार): जो भटक जाए (जैसे 'सब कुछ अनित्य है क्योंकि वह प्रमेय है')।

  4. प्रकरणसम (सत्प्रतिपक्ष): जिसके विरुद्ध वैसा ही दूसरा तर्क खड़ा हो जाए।

  5. कालात्ययापदिष्ट (बाधित): जो प्रत्यक्ष प्रमाण से ही झूठा सिद्ध हो जाए (जैसे 'अग्नि शीतल है')।


7. उपमान और शब्द प्रमाण

  • उपमान: 'अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृतं सादृश्यज्ञानम्'। किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर अज्ञात वस्तु को पहचानना (जैसे गाय जैसी नीलगाय)।

  • शब्द: 'आप्तवाक्यं शब्दः'। जो यथार्थ वक्ता है, उसके वचन शब्द प्रमाण हैं। वाक्य के लिए आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि का होना अनिवार्य है।


8. प्रमेय: ज्ञान के विषय (12 Prameyas)

तर्कभाषा में 12 प्रमेयों का वर्णन है, जिनका ज्ञान मोक्ष के लिए आवश्यक है:

  1. आत्मा, 2. शरीर, 3. इन्द्रिय, 4. अर्थ, 5. बुद्धि, 6. मन, 7. प्रवृत्ति, 8. दोष, 9. प्रेत्यभाव (पुनर्जन्म), 10. फल, 11. दुःख, 12. अपवर्ग (मोक्ष)।

आत्मा (The Soul)

आत्मा प्रत्येक शरीर में भिन्न है, नित्य है और सर्वव्यापी (विभु) है। इसका ज्ञान 'अहं' (मैं) की प्रतीति से होता है।

"आत्मा विभुर्नित्यश्च"


9. द्रव्यों का वैज्ञानिक विवेचन (The 9 Substances)

वैशेषिक मत के अनुसार द्रव्यों का विवेचन तर्कभाषा में अत्यंत रोचक है:

  • पृथिवी: गन्धयुक्त। नित्य (परमाणु) और अनित्य (कार्य)।

  • जल: शीत स्पर्शयुक्त।

  • तेज: उष्ण स्पर्शयुक्त (इसमें सुवर्ण/सोना भी शामिल है)।

  • वायु: रूपहीन किंतु स्पर्शयुक्त।

  • आकाश: शब्द गुण वाला, एक और नित्य।

  • काल, दिक्, आत्मा, मन।

कार्य द्रव्य की उत्पत्ति का क्रम: परमाणु → द्व्यणुक → त्र्यणुक → स्थूल द्रव्य।


10. गुण, कर्म और अभाव

  • गुण: 24 गुण माने गए हैं (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, बुद्धि, सुख, दुःख आदि)।

  • कर्म: उत्क्षेपण (ऊपर), अपक्षेपण (नीचे), आकुञ्चन, प्रसारण, गमन।

  • अभाव: किसी वस्तु का न होना। यह चार प्रकार का है: प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव।


11. मोक्ष का स्वरूप: अपवर्ग

न्याय दर्शन के अनुसार दुःखों की आत्यंतिक निवृत्ति ही मोक्ष है।

"दुःखस्यान्तिकी निवृत्तिः अपवर्गः"
21 प्रकार के दुःखों (शरीर, 6 इन्द्रियाँ, 6 विषय, 6 बुद्धि, सुख और दुःख) से पूर्ण छुटकारा ही मोक्ष है।


12. मीमांसा और अन्य दर्शनों का संक्षिप्त परिचय

लेख के अंत में मीमांसा दर्शन का भी उल्लेख है। महर्षि जैमिनि द्वारा प्रवर्तित यह दर्शन 'धर्म' की व्याख्या करता है।

  • पूर्व मीमांसा: कर्मकाण्ड और यज्ञ का विवेचन।

  • उत्तर मीमांसा (वेदान्त): ब्रह्म का विचार।
    लौगाक्षिभास्कर कृत 'अर्थसंग्रह' मीमांसा का महत्वपूर्ण प्रकरण ग्रंथ है।


निष्कर्ष

केशव मिश्र की 'तर्कभाषा' केवल प्राचीन भारतीय ज्ञान की धरोहर नहीं है, बल्कि यह आज के वैज्ञानिक युग में भी तर्क करने की सही पद्धति सिखाती है। यह ग्रंथ हमें अंधविश्वास से हटाकर 'प्रमाण' की कसौटी पर सत्य को कसना सिखाता है। चाहे वह परमाणुवाद हो या कार्य-कारण सिद्धांत, तर्कभाषा भारतीय मेधा की श्रेष्ठता का प्रतीक है।


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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-

योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )


(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-

दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-


मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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