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मीमांसा दर्शन - अर्थसङ्ग्रहः सम्पूर्ण परिचय

मीमांसा दर्शन अर्थसङ्ग्रहः सम्पूर्ण परिचय लौगाक्षिभास्कर अर्थसंग्रह

मीमांसा दर्शन और अर्थसंग्रह: एक संपूर्ण शास्त्रीय विवेचन | Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara Full Guide

भारतीय वाङ्मय में षड्दर्शनों का अद्वितीय स्थान है। इनमें मीमांसा दर्शन (जिसे पूर्व-मीमांसा भी कहा जाता है) वेदों के कर्मकांडीय भाग की व्याख्या करने वाला सबसे महत्वपूर्ण शास्त्र है। यदि वेद एक विशाल कल्पवृक्ष हैं, तो मीमांसा उसकी जड़ों को पुष्ट करने वाला विज्ञान है।

आज के इस विस्तृत लेख में हम लौगाक्षिभास्कर कृत 'अर्थसंग्रह' का सांगोपांग अध्ययन करेंगे। यह ग्रन्थ मीमांसा दर्शन का एक 'प्रकरण ग्रन्थ' है, जो गागर में सागर भरने के समान है।


1. मीमांसा दर्शन: पृष्ठभूमि और परिचय

'मीमांसा' शब्द 'मन्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है - पूजित विचार या गहन विश्लेषण

"मीमांसा पूजितविचारः"

मीमांसा को 'वाक्यार्थ विचार शास्त्र' भी कहा जाता है क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य वेद वाक्यों के सही अर्थ का निर्धारण करना है। इसके प्रवर्तक महर्षि जैमिनी हैं, जिन्होंने 'मीमांसा सूत्र' की रचना की। इस दर्शन का मुख्य विषय 'कर्मकांड' है।

अर्थसंग्रह और उसके रचनाकार

'अर्थसंग्रह' मीमांसा दर्शन में प्रवेश करने के लिए द्वार के समान है। इसके रचनाकार लौगाक्षिभास्कर हैं।

  • लेखक: लौगाक्षिभास्कर

  • पिता: मुद्गल

  • ग्रन्थ स्वरूप: लघुकाय प्रकरण ग्रन्थ (शाबरभाष्य का संक्षिप्त सार)

  • अन्य रचनाएँ: तर्ककौमुदी

डॉ० कुंनन् राजा ने "बृहती" की भूमिका में स्पष्ट किया है कि भारतीय कर्मकांड सिद्धांत का प्रतिदान इसी दर्शन में प्राप्त होता है। यद्यपि वैशेषिक दर्शन में धर्म का उल्लेख है, किन्तु उसका सूक्ष्म विवेचन केवल मीमांसा में ही मिलता है।


2. मङ्गलाचरणम् (Mangalacharan)

किसी भी शास्त्रीय ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए मङ्गलाचरण की परंपरा है। लौगाक्षिभास्कर ने अपने ग्रन्थ के प्रारंभ में भगवान विष्णु की स्तुति की है:

वासुदेवं रमाकान्तं नत्त्वा लौगाक्षिभास्करः ।
कुरुते जैमिनिनये प्रवेशायार्थसङ्ग्रहम् ॥

अर्थ: लक्ष्मीपति भगवान वासुदेव को प्रणाम करके, लौगाक्षिभास्कर महर्षि जैमिनि द्वारा प्रतिपादित मीमांसा दर्शन (न्याय) में जिज्ञासुओं के प्रवेश के लिए 'अर्थसंग्रह' नामक ग्रन्थ की रचना करते हैं। यहाँ 'नय' शब्द का अर्थ न्याय या दर्शन है।


3. धर्म जिज्ञासा और प्रथम सूत्र का विश्लेषण

मीमांसा का प्रथम सूत्र है: "अथातो धर्मजिज्ञासा" (1.1.1)।

इस सूत्र के प्रत्येक पद का गहरा अर्थ है:

  1. अथ: यह 'आनन्तर्य' (निरंतरता) का वाचक है। इसका अर्थ है "वेदाध्ययन के बाद"।

  2. अतः: यह 'दृष्टार्थत्व' का बोध कराता है। वेदों का अध्ययन केवल रटने के लिए नहीं, बल्कि अर्थ ज्ञान के लिए है।

  3. धर्मजिज्ञासा: 'धर्मस्य जिज्ञासा' (षष्ठी तत्पुरुष)। यहाँ जिज्ञासा का अर्थ केवल 'जानने की इच्छा' नहीं, बल्कि 'विचार' है (विचारे लक्षणा)।


4. धर्म का लक्षण (Definition of Dharma)

मीमांसा दर्शन का केंद्र बिंदु 'धर्म' है। लौगाक्षिभास्कर ने धर्म को इस प्रकार परिभाषित किया है:

“यागादिरेव धर्मः। वेदप्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्मः”

अर्थात्: यज्ञ (याग) आदि ही धर्म हैं। वह विषय जो वेद द्वारा प्रतिपादित हो, जिसका कोई प्रयोजन (फल) हो और जो अर्थ (कल्याणकारी) हो, वही धर्म है।

धर्म लक्षण के तीन प्रमुख घटक (Padakritya)

लक्षण में प्रयुक्त पदों की सार्थकता समझना अनिवार्य है, अन्यथा 'अतिव्याप्ति' दोष उत्पन्न हो जाता है:

  1. वेदप्रतिपाद्य: यदि केवल 'प्रयोजनवद्' कहते, तो 'भोजन' भी धर्म हो जाता क्योंकि भोजन का प्रयोजन तृप्ति है। अतः 'वेदप्रतिपाद्य' कहना आवश्यक है ताकि लोक-सिद्ध क्रियाएँ धर्म की श्रेणी में न आएँ।

  2. प्रयोजनवत्: यदि केवल 'वेदप्रतिपाद्य' कहते, तो स्वयं 'स्वर्ग' (जो फल है) भी धर्म बन जाता। किन्तु स्वर्ग 'साध्य' है, धर्म 'साधन' (याग) है। अतः स्वर्ग में अतिव्याप्ति रोकने के लिए 'प्रयोजनवत्' कहा गया।

  3. अर्थः: यदि 'अर्थ' पद न होता, तो 'श्येन याग' (शत्रु के विनाश हेतु किया जाने वाला अभिचार यज्ञ) भी धर्म कहलाता। चूँकि श्येन याग अनर्थ (हिंसा) उत्पन्न करता है, इसलिए 'अर्थ' पद उसे धर्म की श्रेणी से बाहर करता है।

महर्षि जैमिनी ने सूत्र दिया है:

“चोदनालक्षणोऽर्थोधर्मः”

यहाँ 'चोदना' का तात्पर्य वेद के प्रेरक वाक्यों से है।


5. भावना का स्वरूप (The Concept of Bhavana)

मीमांसा में 'भावना' का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। भावना का अर्थ है - वह व्यापार जो होने वाली वस्तु की उत्पत्ति में सहायक हो।

“भावना नाम भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापार विशेषः”

भावना के दो मुख्य भेद हैं:

(A) शाब्दी भावना (Shabdi Bhavana)

जब वेद के शब्द मनुष्य को कर्म में प्रवृत्त करते हैं, तो उसे शाब्दी भावना कहते हैं।

  • लक्षण: "पुरुषप्रवृत्यनुकूलो भावयितुर्व्यापार विशेष: शाब्दीभावना"।

  • यह 'लिङ्' (विधिलिङ् लकार) का अर्थ है।

  • इसके तीन अंश होते हैं:

    1. साध्य (किं भावयेत्?): पुरुष की प्रवृत्ति।

    2. साधन (केन भावयेत्?): लिङ् आदि का ज्ञान।

    3. इतिकर्तव्यता (कथं भावयेत्?): अर्थवाद के वाक्यों द्वारा स्तुति।

(B) आर्थी भावना (Arthi Bhavana)

पुरुष की वह इच्छा जो उसे यज्ञ आदि कर्म करने के लिए आंतरिक रूप से प्रेरित करती है।

  • लक्षण: "प्रयोजनेच्छाजनित क्रियाविषयव्यापार आर्थीभावना"।

  • यह 'आख्यात' (तिङ् प्रत्यय) का अर्थ है।

  • इसके भी तीन अंश हैं:

    1. साध्य: स्वर्ग आदि फल।

    2. साधन: याग (यज्ञ)।

    3. इतिकर्तव्यता: प्रयाज आदि सहायक अंग।


6. वेद लक्षण और उसके विभाग

लौगाक्षिभास्कर के अनुसार वेद का लक्षण है:

“अपौरुषेयं वाक्यं वेदः”

अर्थात् जो पुरुष द्वारा निर्मित नहीं है, वही वेद है। वेद के पाँच मुख्य भाग हैं:

  1. विधि (Injunctions)

  2. मन्त्र (Hymns)

  3. नामधेय (Proper Names)

  4. निषेध (Prohibitions)

  5. अर्थवाद (Explanatory passages)


7. विधि विचार (Detailed Study of Vidhi)

विधि वह वाक्य है जो अज्ञात अर्थ का ज्ञान कराता है।

“तत्राज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधि:”

जैसे: "अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः" (स्वर्ग की कामना वाला अग्निहोत्र करे)।

विधि के चार प्रकार:

  1. उत्पत्ति विधि: जो केवल कर्म के स्वरूप का बोध कराए। (उदा. अग्निहोत्रं जुहोति)।

  2. विनियोग विधि: जो अंग और प्रधान के संबंध का बोध कराए। इसके 6 सहायक प्रमाण हैं: श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या

  3. प्रयोग विधि: जो अनुष्ठान के क्रम का बोध कराए।

  4. अधिकार विधि: जो फल के स्वामी (अधिकारी) का बोध कराए। (उदा. यजेत स्वर्गकामः)।

विनियोग विधि के 6 प्रमाण (Sextuple Evidences):

यह भाग परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है:

  1. श्रुति: जो शब्द किसी अन्य की अपेक्षा न रखे (निरपेक्ष शब्द)। जैसे तृतीया विभक्ति 'व्रीहिभिः' (चावलों से)।

  2. लिङ्ग: शब्द की सामर्थ्य। (उदा. बहिर्देवसदनं दामि)।

  3. वाक्य: शब्दों का एक साथ उच्चारण (समभिव्यावहार)।

  4. प्रकरण: जहाँ साध्य-साधन की आकांक्षा बनी रहे। इसके दो भेद हैं: महाप्रकरण और अवान्तरप्रकरण।

  5. स्थान: देश या क्रम की समानता।

  6. समाख्या: यौगिक शब्द (जैसे 'होतृचमस')।


8. मन्त्र, नामधेय और निषेध

मन्त्र (Mantra)

मन्त्रों का कार्य अनुष्ठान के समय देवताओं और द्रव्यों का स्मरण कराना है।

“प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्राः”

नामधेय (Namadheya)

यज्ञों के नाम (जैसे 'उद्भिद्', 'चित्र') नामधेय कहलाते हैं। इनके चार कारण होते हैं: मत्वर्थलक्षणाभय, वाक्यभेदभय, तत्प्रख्यशास्त्र और तद्व्यपदेश।

निषेध (Nishedha)

जो पुरुष को अनर्थकारी कार्यों से रोकता है।

“पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेधः”
जैसे: "कलजं न भक्षयेत्" (विषैला मांस न खाएं)।


9. अर्थवाद: स्तुति और निन्दा

वेद का वह भाग जो किसी विधि की प्रशंसा या निषेध की निन्दा करता है, अर्थवाद कहलाता है।

“प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरंवाक्यमर्थवादः”

इसके तीन प्रकार हैं:

  1. गुणवाद: जो प्रत्यक्ष के विरुद्ध हो (उदा. 'आदित्यो यूपः' - सूर्य ही यज्ञ का खंभा है - यहाँ गौण अर्थ है)।

  2. अनुवाद: जो ज्ञात बात को दोहराए (उदा. 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' - अग्नि पाले की दवा है)।

  3. भूतार्थवाद: जो न विरुद्ध हो और न पहले से ज्ञात हो (उदा. 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्')।


10. कर्म के प्रकार

मीमांसा के अनुसार कर्म दो प्रकार के होते हैं:

  1. गुणकर्म (Subsidiary Act): जो द्रव्यों के संस्कार के लिए किए जाते हैं (जैसे चावलों को धोना)। इसके चार रूप हैं: उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति।

  2. अर्थकर्म (Main Act): जो मुख्य फल के लिए किए जाते हैं।

अंगों के भी दो भेद हैं:

  • सन्निपत्योपकारक: जो प्रधान के स्वरूप में मदद करें।

  • आरादुपकारक: जो सीधे फल में मदद करें।


11. मीमांसा के अन्य प्रमुख ग्रन्थ और परंपरा

मीमांसा दर्शन का विस्तार बहुत व्यापक है। इसके प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं:

  • मीमांसा सूत्र: महर्षि जैमिनि

  • शाबरभाष्य: शबर स्वामी

  • तन्त्रवार्तिक/श्लोकवार्तिक: कुमारिल भट्ट

  • शास्त्रदीपिका: पार्थसारथी मिश्र

लौगाक्षिभास्कर ने अपनी इस कृति के माध्यम से कर्मकांड की जटिलताओं को सुलझाने का सफल प्रयास किया है। उन्होंने अंत में चतुर्दश विद्याओं का भी उल्लेख किया है:

पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।
वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥


निष्कर्ष

'अर्थसंग्रह' केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह भाषाई विश्लेषण (Linguistic Analysis) और तर्कशास्त्र (Logic) का अद्भुत मिश्रण है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार वेदों के रहस्यों को नियमों के माध्यम से समझा जा सकता है। लौगाक्षिभास्कर की यह कृति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी।

यदि आप वैदिक संस्कृति और भारतीय दर्शन की गहराई में उतरना चाहते हैं, तो 'अर्थसंग्रह' का अध्ययन अनिवार्य है।



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मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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