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वैशेषिक दर्शन और तर्कसंग्रह सम्पूर्ण परिचय

वैशेषिक दर्शन तर्कसंग्रह सम्पूर्ण परिचय अन्नंभट्टः तर्कसंग्रह - पदार्थ, कारण, प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) प्रामाण्यवाद, प्रमेय

 वैशेषिक दर्शन और तर्कसंग्रह: भारतीय तर्कशास्त्र और भौतिक विज्ञान का संपूर्ण परिचय

प्रस्तावना: भारतीय दर्शन की गौरवशाली परंपरा

भारतीय वाङ्मय में दर्शन का अर्थ केवल 'देखना' नहीं, बल्कि 'सत्य का साक्षात्कार' करना है। भारतीय मनीषा ने ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने के लिए छह आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) की रचना की, जिनमें वैशेषिक दर्शन (Vaisheshika Darshana) अपनी वैज्ञानिक दृष्टि और परमाणुवादी सिद्धांत के कारण विशिष्ट स्थान रखता है।

जब हम वैशेषिक और न्याय दर्शन के सिद्धांतों को सरल रूप में समझना चाहते हैं, तो सबसे पहले जिस ग्रंथ का नाम आता है, वह है 'तर्कसंग्रह' (Tarkasangraha)। महामहोपाध्याय अन्नंभट्ट द्वारा रचित यह ग्रंथ न्याय-वैशेषिक परंपरा का प्रवेश द्वार माना जाता है।

इस लेख में हम तर्कसंग्रह के माध्यम से वैशेषिक दर्शन के सात पदार्थों, कारणता के सिद्धांत, प्रमाणों के स्वरूप और ब्रह्मांड की संरचना का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।


1. वैशेषिक दर्शन: मूल और प्रवर्तक

वैशेषिक दर्शन के मूल प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं, जिनका समय ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी माना जाता है। यह दर्शन केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि एक 'स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी' दर्शन है।

महर्षि कणाद: 'परमाणु' के प्रथम अन्वेषक

महर्षि कणाद को 'कणभुक्' या 'उल्का' भी कहा जाता है। उनके इन नामों के पीछे रोचक कथाएं और तर्क हैं:

  1. उच्छवृत्ति: वे खेतों में गिरे हुए धान्य के कणों को चुनकर अपना जीवन निर्वाह करते थे, इसलिए उन्हें 'कणाद' (कण + अद - कण खाने वाला) कहा गया।

  2. परमाणुवाद: उन्होंने जगत के मूल तत्व के रूप में 'कण' यानी परमाणु (Atom) का सूक्ष्म विवेचन किया।

  3. औलूक्य दर्शन: कहा जाता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ईश्वर ने 'उलूक' (उल्लू) पक्षी के रूप में उन्हें दर्शन दिए और शास्त्र का उपदेश दिया। इसी कारण इस दर्शन को 'औलूक्य दर्शन' भी कहा जाता है।


2. तर्कसंग्रह: ग्रंथ परिचय और मंगलाचरण

अन्नंभट्ट कृत 'तर्कसंग्रह' एक प्रकरण ग्रंथ है। यह न्याय और वैशेषिक दोनों मतों का सम्मिश्रण है। इसमें पदार्थों का विवेचन वैशेषिक के अनुसार है और प्रमाणों का विवेचन न्याय के अनुसार।

मंगलाचरण (Shloka)

अन्नंभट्ट ने ग्रंथ की निर्विघ्न समाप्ति और बालकों की सुबोधता के लिए यह मंगलाचरण लिखा:

निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम्।
बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसंग्रहः॥

अर्थ: "हृदय में विश्वेश्वर (भगवान शिव) को धारण करके और गुरु की वंदना करके, बालकों (नवसीखुओं) को सुखपूर्वक पदार्थों का ज्ञान कराने के लिए मैं 'तर्कसंग्रह' की रचना कर रहा हूँ।"

तर्कसंग्रह का अर्थ

  • तर्क: 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्त इति तर्काः' - अर्थात् वे पदार्थ जिनका प्रतिपादन किया जाए (द्रव्यादि सात पदार्थ)।

  • संग्रह: संक्षेप में उद्देश्य, लक्षण और परीक्षा का निरूपण करना।


3. सप्त पदार्थ (The Seven Categories)

वैशेषिक दर्शन संपूर्ण विश्व को सात श्रेणियों या पदार्थों में विभाजित करता है:

“द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायाऽभावाः सप्तपदार्थाः”

  1. द्रव्य (Substance): क्रिया और गुण का आश्रय।

  2. गुण (Quality): जो द्रव्य में रहे लेकिन स्वयं निर्गुण हो।

  3. कर्म (Action/Motion): जो संयोग और विभाग का कारण हो।

  4. सामान्य (Universality): जो अनेक में एक रूप से रहे (जाति)।

  5. विशेष (Particularity): जो नित्य द्रव्यों को एक-दूसरे से अलग करे।

  6. समवाय (Inherence): नित्य संबंध।

  7. अभाव (Non-existence): किसी वस्तु की अनुपस्थिति।


4. द्रव्यों का विस्तृत विवेचन (Nine Substances)

तर्कसंग्रह के अनुसार द्रव्यों की संख्या नौ है:

“पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव”

1. पृथिवी (Earth)

  • लक्षण: 'तत्र गन्धवती पृथिवी' (जिसमें गन्ध हो)।

  • भेद: नित्य (परमाणु रूप) और अनित्य (कार्य रूप)।

  • त्रिविध स्वरूप: शरीर, इन्द्रिय (घ्राण) और विषय (मिट्टी, पत्थर)।

2. जल (Water)

  • लक्षण: 'शीतस्पर्शवत्यः आपः' (जिसका स्पर्श शीतल हो)।

  • भेद: नित्य और अनित्य।

  • इन्द्रिय: रसन (जीभ)।

3. तेज (Fire)

  • लक्षण: 'उष्णस्पर्शवत्तेजः' (जिसका स्पर्श गर्म हो)।

  • चार प्रकार के विषय:

    • भौम: अग्नि।

    • दिव्य: बिजली।

    • औदर्य: जठराग्नि (पाचन शक्ति)।

    • आकरज: सोना-चांदी (खनिज)।

4. वायु (Air)

  • लक्षण: 'रूपरहितः स्पर्शवान्वायुः' (रूपहीन किंतु स्पर्शयुक्त)।

  • प्राण: शरीर के भीतर संचरण करने वाली वायु 'प्राण' है, जो उपाधि भेद से पाँच प्रकार की है (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान)।

5. आकाश (Ether)

  • लक्षण: 'शब्दगुणकमाकाशम्' (जिसका गुण शब्द है)। यह एक, विभु (सर्वव्यापी) और नित्य है।

6. काल (Time)

  • 'अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः' - भूत, भविष्य, वर्तमान के व्यवहार का कारण।

7. दिक् (Space/Direction)

  • 'प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिक' - पूर्व, पश्चिम आदि दिशाओं के ज्ञान का कारण।

8. आत्मा (Soul)

  • लक्षण: 'ज्ञानाधिकरणमात्मा' (ज्ञान का आधार)।

  • भेद:

    • परमात्मा: ईश्वर, जो सर्वज्ञ और एक है।

    • जीवात्मा: जो प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न है।

9. मन (Mind)

  • 'सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः' - सुख-दुःख की अनुभूति का साधन। यह परमाणु रूप और नित्य है।


5. चौबीस गुण (24 Qualities)

तर्कसंग्रह में 24 गुणों का वर्णन है, जो द्रव्यों की विशेषताओं को बताते हैं:

  1. रूप (Color), 2. रस (Taste), 3. गन्ध (Smell), 4. स्पर्श (Touch), 5. संख्या (Number), 6. परिमाण (Magnitude), 7. पृथक्त्व (Distinctness), 8. संयोग (Conjunction), 9. विभाग (Disjunction), 10. परत्व (Remoteness), 11. अपरत्व (Proximity), 12. गुरुत्व (Weight), 13. द्रवत्व (Fluidity), 14. स्नेह (Viscidity), 15. शब्द (Sound), 16. बुद्धि (Knowledge), 17. सुख (Pleasure), 18. दुःख (Pain), 19. इच्छा (Desire), 20. द्वेष (Aversion), 21. प्रयत्न (Effort), 22. धर्म (Merit), 23. अधर्म (Demerit), 24. संस्कार (Impression)।


6. कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय

कर्म (Motion)

कर्म पाँच प्रकार के होते हैं:

  1. उत्क्षेपण: ऊपर फेंकना।

  2. अपक्षेपण: नीचे फेंकना।

  3. आकुञ्चन: सिकोड़ना।

  4. प्रसारण: फैलाना।

  5. गमन: अन्य सभी प्रकार की गतियाँ।

सामान्य (Universality)

  • जो नित्य हो और अनेक में व्याप्त हो (जैसे मनुष्यत्व जाति)। यह दो प्रकार का है: 'पर' (अधिक देश में रहने वाला - सत्ता) और 'अपर' (न्यून देश में रहने वाला - जैसे द्रव्यत्व)।

विशेष (Particularity)

  • यह केवल नित्य द्रव्यों (परमाणुओं) में रहता है। यह वह तत्व है जो दो समान दिखने वाले परमाणुओं को एक-दूसरे से भिन्न करता है।

समवाय (Inherence)

  • 'नित्यसम्बन्धः समवायः' - ऐसा संबंध जो वस्तुओं के अलग होने पर वस्तु का विनाश कर दे (जैसे तन्तु और पट का संबंध)।


7. अभाव का स्वरूप (Non-existence)

अभाव चार प्रकार का होता है:

  1. प्रागभाव: वस्तु की उत्पत्ति से पहले उसका न होना।

  2. प्रध्वंसाभाव: विनाश के बाद वस्तु का अभाव।

  3. अत्यन्ताभाव: तीनों कालों में अभाव (जैसे 'वायु में रूप नहीं है')।

  4. अन्योन्याभाव: एक वस्तु का दूसरी वस्तु न होना (जैसे 'घड़ा कपड़ा नहीं है')।


8. प्रमाण मीमांसा: ज्ञान कैसे प्राप्त करें?

यथार्थ ज्ञान को 'प्रमा' कहते हैं और उसके साधन को 'प्रमाण'। अन्नंभट्ट चार प्रमाण मानते हैं:

“प्रत्यक्षानुमानोपमानशाब्दभेदात् प्रमाणानि चत्वारि”

I. प्रत्यक्ष प्रमाण (Perception)

इन्द्रिय और पदार्थ के मेल से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष है। इसके छह प्रकार के सन्निकर्ष (सम्बन्ध) होते हैं:

  1. संयोग: आँख से घड़ा देखना।

  2. संयुक्त-समवाय: घड़े का रंग देखना।

  3. संयुक्त-समवेत-समवाय: रंग की जाति (रूपत्व) देखना।

  4. समवाय: कान से शब्द सुनना।

  5. समवेत-समवाय: शब्द की जाति (शब्दत्व) सुनना।

  6. विशेषण-विशेष्यभाव: अभाव का प्रत्यक्ष (जैसे ज़मीन पर घड़े का न होना)।

II. अनुमान प्रमाण (Inference)

'परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः' - व्याप्ति के ज्ञान से जो ज्ञान उत्पन्न हो।

  • व्याप्ति: 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निः' (जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है)।

  • पञ्चावयव वाक्य: दूसरे को समझाने के लिए पाँच चरणों का प्रयोग:

    1. प्रतिज्ञा (पर्वत आग वाला है)।

    2. हेतु (क्योंकि वहाँ धुआँ है)।

    3. उदाहरण (जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है, जैसे रसोई)।

    4. उपनय (इस पर्वत पर भी वैसा ही धुआँ है)।

    5. निगमन (इसलिए यह पर्वत आग वाला है)।

III. उपमान प्रमाण (Comparison)

सादृश्य के आधार पर संज्ञा-संज्ञी संबंध का ज्ञान। जैसे 'नीलगाय (गवय) गाय जैसी होती है' सुनकर जंगल में नीलगाय को पहचान लेना।

IV. शब्द प्रमाण (Verbal Testimony)

'आप्तवाक्यं शब्दः' - यथार्थ वक्ता (आप्त) के वचन। वाक्य के लिए तीन शर्तें अनिवार्य हैं:

  1. आकांक्षा: पदों की एक-दूसरे की अपेक्षा।

  2. योग्यता: अर्थ में बाधा न होना (जैसे 'आग से सींचना' योग्य नहीं है)।

  3. सन्निधि: पदों का बिना विलम्ब के उच्चारण।


9. कार्य-कारण सिद्धांत (Causality)

जगत की हर घटना के पीछे कारण होता है। कारण तीन प्रकार के हैं:

  1. समवायि कारण: जिसमें कार्य उत्पन्न हो (धागा कपड़े का समवायि कारण है)।

  2. असमवायि कारण: जो समवायि कारण में रहकर कार्य में मदद करे (धागों का संयोग)।

  3. निमित्त कारण: जो अलग रहकर कार्य बनाए (जुलाहा, मशीन)।


10. हेत्वाभास: तर्क के दोष

गलत तर्क को हेत्वाभास कहते हैं। ये पाँच हैं:

  1. सव्यभिचार: हेतु का भटक जाना।

  2. विरुद्ध: जो साध्य के विपरीत हो।

  3. सत्प्रतिपक्ष: जिसका विरोधी तर्क मौजूद हो।

  4. असिद्ध: जिसका आधार ही गलत हो।

  5. बाधित: जिसे प्रत्यक्ष से ही झूठ प्रमाणित किया जा सके (जैसे 'अग्नि ठंडी है')।


11. न्याय दर्शन और तर्कशास्त्र का महत्व

न्याय दर्शन को 'प्रमाणशास्त्र' या 'अन्वीक्षिकी' भी कहा जाता है। महर्षि गौतम (अक्षपाद) इसके प्रवर्तक हैं।

प्रदीपः सर्वविद्यानां उपायः सर्वकर्मणाम्।
आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षिकी मता॥

अर्थ: "न्याय शास्त्र सभी विद्याओं का दीपक है, सभी कार्यों का साधन है और सभी धर्मों का आश्रय है।"

यह शास्त्र बुद्धि को तीव्र और परिष्कृत करता है। इसके बिना वेदान्त, व्याकरण या आयुर्वेद जैसे गूढ़ विषयों को समझना असंभव है।


12. वैशेषिक धारा के प्रमुख आचार्य और ग्रंथ

वैशेषिक दर्शन की यात्रा कणाद से शुरू होकर आधुनिक काल तक निरंतर रही है:

  • प्रशस्तपाद: 'पदार्थधर्मसंग्रह' (वैशेषिक का सबसे महत्वपूर्ण भाष्य)।

  • उदयनाचार्य: 'किरणावली' और 'न्यायकुसुमांजलि' (ईश्वर की सिद्धि)।

  • श्रीधराचार्य: 'न्यायकन्दली'।

  • शिवादित्य: 'सप्तपदार्थी' (न्याय और वैशेषिक को जोड़ने वाले प्रथम आचार्य)।


निष्कर्ष

वैशेषिक दर्शन और तर्कसंग्रह हमें केवल पदार्थों की सूची नहीं देते, बल्कि सोचने का एक वैज्ञानिक तरीका सिखाते हैं। यह दर्शन स्पष्ट करता है कि जगत परमाणुओं का समूह है, जिसे ईश्वर की इच्छा और जीवों के अदृष्ट (कर्म) के अनुसार व्यवस्थित किया गया है।

अन्नंभट्ट का 'तर्कसंग्रह' आज भी भारतीय विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में तर्कशास्त्र की नींव के रूप में पढ़ाया जाता है। यदि आप सत्य की खोज करना चाहते हैं और अपनी तर्कशक्ति को हिमालय जैसा सुदृढ़ बनाना चाहते हैं, तो 'तर्कसंग्रह' का अध्ययन अनिवार्य है।



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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-

योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )


(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-

दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-




मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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