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सांख्य दर्शन और सांख्यकारिका: तत्वमीमांसा, सृष्टिक्रम और कैवल्य का संपूर्ण विवेचन

साङ्ख्य दर्शन सांख्यकारिका सम्पूर्ण परिचय सांख्यकारिका - सत्कार्यवाद, पुरुषस्वरूप प्रकृतिस्वरूप, सृष्टिक्रम, प्रत्ययसर्ग, कैमल्य

सांख्य दर्शन और सांख्यकारिका: तत्वमीमांसा, सृष्टिक्रम और कैवल्य का संपूर्ण विवेचन

सांख्यकारिका - सत्कार्यवाद, पुरुषस्वरूप प्रकृतिस्वरूप, सृष्टिक्रम, प्रत्ययसर्ग, कैमल्य

प्रस्तावना: सांख्य दर्शन का गौरव
भारतीय दर्शन की षड्दर्शन परंपरा में सांख्य दर्शन (Samkhya Philosophy) सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित माना जाता है। सांख्य का शाब्दिक अर्थ 'संख्या' या 'सम्यक् ज्ञान' है। यह दर्शन ब्रह्मांड के रहस्यों को 25 तत्वों के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करता है। सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल हैं, जिन्हें 'आदिविद्वान' कहा जाता है। हालाँकि कपिल मुनि का मूल ग्रंथ 'सांख्यसूत्र' कालक्रम में लुप्तप्राय हो गया, लेकिन ईश्वरकृष्ण द्वारा रचित 'सांख्यकारिका' आज इस दर्शन का सबसे प्रामाणिक और उपलब्ध आधार स्तंभ है।

1. सांख्यकारिका: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और महत्व

सांख्यकारिका का रचना काल ईसा की तृतीय शताब्दी के मध्य माना जाता है। इसमें ईश्वरकृष्ण ने सांख्य के गूढ़ सिद्धांतों को मात्र 72 श्लोकों (कारिकाओं) में समेट दिया है।

  • ज्ञान की परंपरा: ईश्वरकृष्ण के अनुसार यह ज्ञान कपिल से आसुरी को, आसुरी से पंचशिख को और पंचशिख से उन्हें प्राप्त हुआ।

  • अन्य नाम: इसे 'सुवर्णसप्तति', 'कनकसप्तति' या 'हिरण्यसप्तति' के नाम से भी जाना जाता है।

  • प्रमुख टीकाएँ: इस ग्रंथ की महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इस पर अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं। सबसे प्राचीन भाष्य गौडपाद का है। वाचस्पति मिश्र की 'सांख्यतत्वकौमुदी' और 'युक्तिदीपिका' अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।

  • वैश्विक प्रभाव: 6वीं शताब्दी में इसका चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। 19वीं सदी में क्रिश्चियन लासेन ने लैटिन और एच.टी. कोलब्रुक ने अंग्रेजी में इसका अनुवाद कर इसे वैश्विक पटल पर रखा।

2. दुःखत्रय और जिज्ञासा का कारण

सांख्य दर्शन की यात्रा 'दुःख' की पहचान से शुरू होती है। संसार में तीन प्रकार के दुःख हैं:

  1. आध्यात्मिक दुःख: जो व्यक्ति के भीतर से उत्पन्न होते हैं (शारीरिक रोग, मानसिक चिंताएँ, क्रोध, शोक)।

  2. आधिभौतिक दुःख: जो बाहरी प्राणियों या भौतिक कारणों से होते हैं (सर्पदंश, युद्ध, हिंसक पशु)।

  3. आधिदैविक दुःख: जो दैवीय या प्राकृतिक शक्तियों से होते हैं (भूकंप, अतिवृष्टि, अकाल, ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव)।

ईश्वरकृष्ण कहते हैं कि इन दुःखों की निवृत्ति के लिए लौकिक उपाय (जैसे दवाइयाँ या भोग) स्थायी नहीं हैं। स्थायी समाधान केवल 'व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात्' यानी व्यक्त (महदादि), अव्यक्त (प्रकृति) और ज्ञ (पुरुष) के भेद को जानने से मिलता है।

3. सांख्य की प्रमाण मीमांसा (Epistemology)

सांख्य दर्शन केवल तीन प्रमाणों को स्वीकार करता है, क्योंकि अन्य सभी प्रमाण इन्हीं में समाहित हो जाते हैं:

  • प्रत्यक्ष (Perception): इन्द्रियों और विषय के संयोग से प्राप्त ज्ञान। इसके दो प्रकार हैं: 'निर्विकल्पक' (प्रारंभिक आभास) और 'सविकल्पक' (निश्चित पहचान)।

  • अनुमान (Inference): जहाँ चिह्न (लिंग) के आधार पर अदृश्य का ज्ञान हो। यह तीन प्रकार का है— पूर्ववत् (कारण से कार्य), शेषवत् (कार्य से कारण) और सामान्यतोदृष्ट (व्याप्ति संबंध के आधार पर)।

  • शब्द (Testimony): आप्त पुरुष (यथार्थ वक्ता) या वेदों के वचन।

4. सत्कार्यवाद: सांख्य का अद्वितीय सिद्धांत

सांख्य दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत 'सत्कार्यवाद' है। इसका अर्थ है कि "कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व कारण में सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहता है।" उत्पत्ति केवल उसकी 'अभिव्यक्ति' (manifestation) है, नया सृजन नहीं। इसके समर्थन में सांख्यकारिका में 5 ठोस तर्क दिए गए हैं:

  1. असदकरणात्: जो पहले से मौजूद नहीं है, उसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता (जैसे रेत से तेल नहीं निकल सकता)।

  2. उपादान ग्रहणात्: किसी विशिष्ट कार्य के लिए विशिष्ट कारण की खोज करनी पड़ती है (दही के लिए दूध ही चाहिए)।

  3. सर्वसम्भवाभावात्: हर चीज से हर चीज पैदा नहीं हो सकती।

  4. शक्तस्य शक्यकरणात्: कारण में वह शक्ति होनी चाहिए जो कार्य को उत्पन्न कर सके।

  5. कारणभावात्: कार्य और कारण मूलतः एक ही द्रव्य हैं।

5. पुरुष और प्रकृति: सांख्य का द्वैतवाद

सांख्य दो स्वतंत्र सत्ताओं को मानता है: पुरुष (Consciousness) और प्रकृति (Matter)

पुरुष का स्वरूप

सांख्य में पुरुष 'आत्मा' का पर्याय है। यह शुद्ध चैतन्य है।

  • गुण: यह निर्गुण (त्रिगुणातीत), दृष्टा (साक्षी), अकर्ता (निष्क्रिय) और भोक्ता है।

  • पुरुष बहुत्व: सांख्य 'अद्वैत' के विपरीत मानता है कि पुरुष अनेक हैं। तर्क यह है कि यदि आत्मा एक होती, तो एक के जन्म लेने या मरने पर सभी का जन्म-मरण एक साथ होता।

प्रकृति का स्वरूप

प्रकृति जगत का मूल कारण है। यह जड़ है लेकिन सक्रिय है।

  • त्रिगुण: प्रकृति तीन गुणों की साम्यावस्था है— सत्त्व (प्रकाश, सुख), रजस् (गति, दुःख) और तमस् (अज्ञान, जड़ता)।

  • अस्तित्व के तर्क: जगत के सीमित पदार्थों का कोई असीमित कारण होना चाहिए, जो प्रकृति ही है।

6. सृष्टिक्रम (The Order of Evolution)

सृष्टि का आरंभ तब होता है जब पुरुष और प्रकृति का संयोग होता है। इसे 'पङ्गु-अन्ध' (लंगड़े और अंधे) के न्याय से समझाया गया है। प्रकृति अंधी है लेकिन चल सकती है, पुरुष देख सकता है लेकिन चल नहीं सकता। दोनों मिलकर सृष्टि का विकास करते हैं:

  1. मूल प्रकृति से महत् (बुद्धि) उत्पन्न होती है।

  2. महत् से अहंकार का जन्म होता है।

  3. अहंकार के तीन रूप होते हैं:

    • सात्त्विक (वैकृत): इससे मन और 10 इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं।

    • तामस (भूतादि): इससे 5 तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) उत्पन्न होती हैं।

    • राजस (तैजस): यह दोनों को गति प्रदान करता है।

  4. 5 तन्मात्राओं से 5 महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) बनते हैं।

कुल मिलाकर ये 25 तत्व सांख्य की सृष्टि प्रक्रिया को पूरा करते हैं।

7. इन्द्रियाँ और अंतःकरण (Psychology of Samkhya)

सांख्य के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के लिए 13 'करण' (उपकरण) होते हैं:

  • बाह्य करण (10): 5 ज्ञानेन्द्रियाँ और 5 कर्मेन्द्रियाँ। ये केवल वर्तमान का ज्ञान कराते हैं।

  • अंतःकरण (3): मन (संकल्प-विकल्प), अहंकार (अभिमान) और बुद्धि (निश्चय)। ये तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) का विषय ग्रहण करते हैं।

8. प्रत्यय सर्ग और बुद्धिसर्ग

बुद्धि के द्वारा जो मानसिक सृष्टि होती है, उसे 'प्रत्यय सर्ग' कहते हैं। इसके 50 भेद बताए गए हैं:

  1. विपर्यय (5): मिथ्या ज्ञान या अविद्या (तम, मोह, महामोह, तामिस्र, अंधतामिस्र)।

  2. अशक्ति (28): इन्द्रियों और बुद्धि की दुर्बलता।

  3. तुष्टि (9): संतोष की भावना लेकिन तत्वज्ञान का अभाव।

  4. सिद्धि (8): तत्वज्ञान की प्राप्ति (ऊह, शब्द, अध्ययन आदि)।

ये 50 भेद गुणों की विषमता के कारण उत्पन्न होते हैं।

9. भौतिक सर्ग (The Physical World)

सांख्य भौतिक सृष्टि को 14 श्रेणियों में विभाजित करता है:

  • दैव सर्ग (8 प्रकार): उच्च लोक के प्राणी (देवता)।

  • तिर्यक् योनि (5 प्रकार): पशु, पक्षी, सरीसृप आदि।

  • मानुष्य सर्ग (1 प्रकार): मनुष्य।
    इस सृष्टि में ऊपर 'सत्त्व' की प्रधानता है, नीचे 'तम' की और मध्य (मनुष्य लोक) में 'रज' की प्रधानता है।

10. कैवल्य: मोक्ष की अवधारणा

सांख्य के अनुसार मोक्ष का अर्थ है 'कैवल्य'। यह दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति है।

  • विवेक ज्ञान: जब पुरुष को यह बोध हो जाता है कि "मैं प्रकृति नहीं हूँ, मैं अकर्ता हूँ" (नास्मि, न मे, नाहम्), तब वह मुक्त हो जाता है।

  • नर्तकी का रूपक: जैसे एक नर्तकी दर्शकों को अपना नृत्य दिखाकर मंच से हट जाती है, वैसे ही प्रकृति पुरुष को भोग और मोक्ष दिखाकर निवृत्त हो जाती है।

मुक्ति के प्रकार:

  1. जीवनमुक्ति: तत्वज्ञान प्राप्त होने पर भी जब तक 'प्रारब्ध कर्म' शेष रहते हैं, शरीर बना रहता है। यह वैसा ही है जैसे कुम्हार का चाक हाथ हटा लेने के बाद भी पिछले वेग के कारण घूमता रहता है।

  2. विदेहमुक्ति: शरीर त्याग के बाद जब पुरुष प्रकृति से पूर्णतः अलग हो जाता है, उसे विदेहमुक्ति कहते हैं।

11. सांख्यकारिका के मुख्य सूत्र (Quick Facts)

  • मूल प्रकृति: न प्रकृति है न विकृति (Uncaused cause)।

  • महत्, अहंकार, 5 तन्मात्रा: ये प्रकृति भी हैं और विकृति भी (7 तत्व)।

  • 10 इन्द्रियाँ, मन, 5 महाभूत: ये केवल विकृति हैं (16 तत्व)।

  • पुरुष: न प्रकृति है न विकृति (Pure soul)।

  • सूक्ष्म शरीर: 18 तत्वों से मिलकर बना होता है जो मोक्ष तक साथ रहता है।

निष्कर्ष

सांख्य दर्शन और सांख्यकारिका हमें जीवन का गहन यथार्थ समझाते हैं। यह दर्शन ईश्वर की सत्ता पर मौन रहकर भी मनुष्य को 'आत्मज्ञान' और 'विवेक' के माध्यम से सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त करता है। प्रकृति के जटिल जाल और गुणों के प्रभाव से ऊपर उठकर अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप (पुरुष) को पहचानना ही सांख्य का अंतिम लक्ष्य है।

आज के आधुनिक युग में, जहाँ मानसिक तनाव और भौतिकवाद चरम पर है, सांख्य का 'विवेक ज्ञान' मानसिक शांति और आत्म-नियंत्रण के लिए एक वैज्ञानिक औषधि की तरह कार्य करता है।


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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-

योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )


(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-

दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-


मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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