सांख्य दर्शन और सांख्यकारिका: तत्वमीमांसा, सृष्टिक्रम और कैवल्य का संपूर्ण विवेचन
सांख्यकारिका - सत्कार्यवाद, पुरुषस्वरूप प्रकृतिस्वरूप, सृष्टिक्रम, प्रत्ययसर्ग, कैमल्य
1. सांख्यकारिका: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और महत्व
ज्ञान की परंपरा: ईश्वरकृष्ण के अनुसार यह ज्ञान कपिल से आसुरी को, आसुरी से पंचशिख को और पंचशिख से उन्हें प्राप्त हुआ। अन्य नाम: इसे 'सुवर्णसप्तति', 'कनकसप्तति' या 'हिरण्यसप्तति' के नाम से भी जाना जाता है। प्रमुख टीकाएँ: इस ग्रंथ की महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इस पर अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं। सबसे प्राचीन भाष्य गौडपाद का है। वाचस्पति मिश्र की 'सांख्यतत्वकौमुदी' और 'युक्तिदीपिका' अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। वैश्विक प्रभाव: 6वीं शताब्दी में इसका चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। 19वीं सदी में क्रिश्चियन लासेन ने लैटिन और एच.टी. कोलब्रुक ने अंग्रेजी में इसका अनुवाद कर इसे वैश्विक पटल पर रखा।
2. दुःखत्रय और जिज्ञासा का कारण
आध्यात्मिक दुःख: जो व्यक्ति के भीतर से उत्पन्न होते हैं (शारीरिक रोग, मानसिक चिंताएँ, क्रोध, शोक)। आधिभौतिक दुःख: जो बाहरी प्राणियों या भौतिक कारणों से होते हैं (सर्पदंश, युद्ध, हिंसक पशु)। आधिदैविक दुःख: जो दैवीय या प्राकृतिक शक्तियों से होते हैं (भूकंप, अतिवृष्टि, अकाल, ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव)।
3. सांख्य की प्रमाण मीमांसा (Epistemology)
प्रत्यक्ष (Perception): इन्द्रियों और विषय के संयोग से प्राप्त ज्ञान। इसके दो प्रकार हैं: 'निर्विकल्पक' (प्रारंभिक आभास) और 'सविकल्पक' (निश्चित पहचान)। अनुमान (Inference): जहाँ चिह्न (लिंग) के आधार पर अदृश्य का ज्ञान हो। यह तीन प्रकार का है— पूर्ववत् (कारण से कार्य), शेषवत् (कार्य से कारण) और सामान्यतोदृष्ट (व्याप्ति संबंध के आधार पर)। शब्द (Testimony): आप्त पुरुष (यथार्थ वक्ता) या वेदों के वचन।
4. सत्कार्यवाद: सांख्य का अद्वितीय सिद्धांत
असदकरणात्: जो पहले से मौजूद नहीं है, उसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता (जैसे रेत से तेल नहीं निकल सकता)। उपादान ग्रहणात्: किसी विशिष्ट कार्य के लिए विशिष्ट कारण की खोज करनी पड़ती है (दही के लिए दूध ही चाहिए)। सर्वसम्भवाभावात्: हर चीज से हर चीज पैदा नहीं हो सकती। शक्तस्य शक्यकरणात्: कारण में वह शक्ति होनी चाहिए जो कार्य को उत्पन्न कर सके। कारणभावात्: कार्य और कारण मूलतः एक ही द्रव्य हैं।
5. पुरुष और प्रकृति: सांख्य का द्वैतवाद
पुरुष का स्वरूप
गुण: यह निर्गुण (त्रिगुणातीत), दृष्टा (साक्षी), अकर्ता (निष्क्रिय) और भोक्ता है। पुरुष बहुत्व: सांख्य 'अद्वैत' के विपरीत मानता है कि पुरुष अनेक हैं। तर्क यह है कि यदि आत्मा एक होती, तो एक के जन्म लेने या मरने पर सभी का जन्म-मरण एक साथ होता।
प्रकृति का स्वरूप
त्रिगुण: प्रकृति तीन गुणों की साम्यावस्था है— सत्त्व (प्रकाश, सुख), रजस् (गति, दुःख) और तमस् (अज्ञान, जड़ता)। अस्तित्व के तर्क: जगत के सीमित पदार्थों का कोई असीमित कारण होना चाहिए, जो प्रकृति ही है।
6. सृष्टिक्रम (The Order of Evolution)
मूल प्रकृति से महत् (बुद्धि) उत्पन्न होती है। महत् से अहंकार का जन्म होता है। अहंकार के तीन रूप होते हैं: सात्त्विक (वैकृत): इससे मन और 10 इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। तामस (भूतादि): इससे 5 तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) उत्पन्न होती हैं। राजस (तैजस): यह दोनों को गति प्रदान करता है।
5 तन्मात्राओं से 5 महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) बनते हैं।
7. इन्द्रियाँ और अंतःकरण (Psychology of Samkhya)
बाह्य करण (10): 5 ज्ञानेन्द्रियाँ और 5 कर्मेन्द्रियाँ। ये केवल वर्तमान का ज्ञान कराते हैं। अंतःकरण (3): मन (संकल्प-विकल्प), अहंकार (अभिमान) और बुद्धि (निश्चय)। ये तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) का विषय ग्रहण करते हैं।
8. प्रत्यय सर्ग और बुद्धिसर्ग
विपर्यय (5): मिथ्या ज्ञान या अविद्या (तम, मोह, महामोह, तामिस्र, अंधतामिस्र)। अशक्ति (28): इन्द्रियों और बुद्धि की दुर्बलता। तुष्टि (9): संतोष की भावना लेकिन तत्वज्ञान का अभाव। सिद्धि (8): तत्वज्ञान की प्राप्ति (ऊह, शब्द, अध्ययन आदि)।
9. भौतिक सर्ग (The Physical World)
दैव सर्ग (8 प्रकार): उच्च लोक के प्राणी (देवता)। तिर्यक् योनि (5 प्रकार): पशु, पक्षी, सरीसृप आदि। मानुष्य सर्ग (1 प्रकार): मनुष्य। इस सृष्टि में ऊपर 'सत्त्व' की प्रधानता है, नीचे 'तम' की और मध्य (मनुष्य लोक) में 'रज' की प्रधानता है।
10. कैवल्य: मोक्ष की अवधारणा
विवेक ज्ञान: जब पुरुष को यह बोध हो जाता है कि "मैं प्रकृति नहीं हूँ, मैं अकर्ता हूँ" (नास्मि, न मे, नाहम्), तब वह मुक्त हो जाता है। नर्तकी का रूपक: जैसे एक नर्तकी दर्शकों को अपना नृत्य दिखाकर मंच से हट जाती है, वैसे ही प्रकृति पुरुष को भोग और मोक्ष दिखाकर निवृत्त हो जाती है।
मुक्ति के प्रकार:
जीवनमुक्ति: तत्वज्ञान प्राप्त होने पर भी जब तक 'प्रारब्ध कर्म' शेष रहते हैं, शरीर बना रहता है। यह वैसा ही है जैसे कुम्हार का चाक हाथ हटा लेने के बाद भी पिछले वेग के कारण घूमता रहता है।
विदेहमुक्ति: शरीर त्याग के बाद जब पुरुष प्रकृति से पूर्णतः अलग हो जाता है, उसे विदेहमुक्ति कहते हैं।
11. सांख्यकारिका के मुख्य सूत्र (Quick Facts)
मूल प्रकृति: न प्रकृति है न विकृति (Uncaused cause)।
महत्, अहंकार, 5 तन्मात्रा: ये प्रकृति भी हैं और विकृति भी (7 तत्व)।
10 इन्द्रियाँ, मन, 5 महाभूत: ये केवल विकृति हैं (16 तत्व)।
पुरुष: न प्रकृति है न विकृति (Pure soul)।
सूक्ष्म शरीर: 18 तत्वों से मिलकर बना होता है जो मोक्ष तक साथ रहता है।
निष्कर्ष
UGC - net सम्पुर्ण संस्कृत सामग्री कोड - २५ पुरा सिलेबस
(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-
योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )
(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-
दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-