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न्यायदर्शन न्यायसिद्धान्तमुक्तावली (अनुमानखण्ड) सम्पूर्ण परिचय 9

न्यायदर्शन न्यायसिद्धान्तमुक्तावली (अनुमानखण्ड) सम्पूर्ण परिचय

न्याय दर्शन और न्यायसिद्धान्तमुक्तावली (अनुमान खण्ड): एक गहन विश्लेषण | Nyaya Philosophy & Anumana Khanda

भारतीय वाङ्मय में न्याय दर्शन को 'प्रमाणशास्त्र' और 'तर्कविद्या' का सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जहाँ अन्य दर्शन आत्मा और जगत् के रहस्यों की खोज करते हैं, वहीं न्याय दर्शन उस खोज के 'साधन' (प्रमाणों) की शुद्धता की परीक्षा करता है। न्याय दर्शन के बिना भारतीय दर्शन की किसी भी शाखा को समझना असंभव है।

इस विस्तृत लेख में हम ऋषि अक्षपाद गौतम के न्याय सूत्र से लेकर नव्य-न्याय की उत्कृष्ट कृति 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली' के अनुमान खण्ड तक का सांगोपांग अध्ययन करेंगे।


1. न्याय दर्शन: अर्थ, व्युत्पत्ति एवं परिचय

'न्याय' शब्द का अर्थ है—वह साधन जिसके द्वारा किसी विवक्षित अर्थ (सिद्धान्त) तक पहुँचा जा सके।

"नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्यायः"

महर्षि वात्स्यायन के अनुसार:

“प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः”
अर्थात् प्रमाणों के माध्यम से किसी विषय की परीक्षा करना ही न्याय है।

न्याय दर्शन के अन्य नाम हैं: आन्वीक्षिकी, तर्कशास्त्र, प्रमाणशास्त्र, हेतुविद्या और वादविद्या। इसके प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम हैं। न्याय दर्शन का मुख्य उद्देश्य 'निःश्रेयस' (मोक्ष) की प्राप्ति है, जो १६ पदार्थों के तत्त्वज्ञान से संभव है।


2. न्याय दर्शन के १६ पदार्थ (Categories)

न्याय सूत्र के प्रथम सूत्र में ही सोलह पदार्थों का उल्लेख है, जिनके ज्ञान से मोक्ष प्राप्त होता है:

  1. प्रमाण: ज्ञान के साधन (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द)।

  2. प्रमेय: ज्ञान के विषय (आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख, अपवर्ग)।

  3. संशय: अनिश्चय की स्थिति।

  4. प्रयोजन: कार्य का उद्देश्य।

  5. दृष्टान्त: उदाहरण।

  6. सिद्धान्त: स्थापित मत।

  7. अवयव: न्याय वाक्य के अंग।

  8. तर्क: ऊहापोह।

  9. निर्णय: निष्कर्ष।

  10. वाद: सत्य की खोज हेतु चर्चा।

  11. जल्प: विजय हेतु चर्चा।

  12. वितण्डा: केवल विपक्षी के खंडन हेतु चर्चा।

  13. हेत्वाभास: तर्क के दोष।

  14. छल: शब्दों का हेर-फेर।

  15. जाति: असंगत उत्तर।

  16. निग्रहस्थान: पराजय का आधार।


3. न्याय दर्शन का ऐतिहासिक विकास: प्राचीन एवं नव्य न्याय

न्याय शास्त्र के इतिहास को दो मुख्य धाराओं में बाँटा गया है:

(A) प्राचीन न्याय (Prachina Nyaya)

यह प्रमेयप्रधान है। इसमें पदार्थों के स्वरूप और उनके गुणों पर अधिक बल दिया गया है। गौतम से लेकर गंगेशोपाध्याय से पूर्व तक के विद्वान (वात्स्यायन, उद्योतकर, वाचस्पति मिश्र) इसी श्रेणी में आते हैं।

(B) नव्य न्याय (Navya Nyaya)

गंगेशोपाध्याय की 'तत्त्वचिन्तामणि' से नव्य न्याय का आरम्भ होता है। यह प्रमाणप्रधान है। इसकी भाषा अत्यंत जटिल और सूक्ष्म है। विश्वनाथ पञ्चानन की 'कारिकावली' और उसकी टीका 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली' नव्य-न्याय का एक सरल और अत्यंत लोकप्रिय ग्रन्थ है।


4. न्यायसिद्धान्तमुक्तावली: अनुमान खण्ड (Anumana Khanda)

अनुमान वह ज्ञान है जो प्रत्यक्ष के पश्चात (अनु + मान) प्राप्त होता है। मुक्तावली में अनुमान की प्रक्रिया को अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से समझाया गया है।

(A) अनुमिति और परामर्श (Inference and Deliberation)

अनुमिति (Inferred Knowledge) के लिए 'व्याप्ति' का ज्ञान कारण है और 'परामर्श' व्यापार है।

“व्यापारस्तु परामर्श: करणं व्याप्तिधीर्भवेत् ॥66॥"

परामर्श क्या है?

"व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधी: परामर्श उच्यते"
जब हमें यह ज्ञान होता है कि 'व्याप्ति' (जैसे धुएँ और आग का अविनाभावी संबंध) से युक्त हेतु (धुआँ) पक्ष (पर्वत) में विद्यमान है, तो उसे 'परामर्श' कहते हैं। इसी परामर्श से 'अनुमिति' (पर्वत आग वाला है) पैदा होती है।

(B) व्याप्ति (Universal Concomitance)

व्याप्ति अनुमान की आत्मा है। यह हेतु और साध्य के बीच का अपरिवर्तनीय संबंध है।

"साध्येन हेतोरैकाधिकरण्यं व्याप्तिरुच्यते ॥69॥"
जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग है—यह साहचर्य नियम ही व्याप्ति है।

(C) पक्ष (Locus of Inference)

"सिषाधयिषया शून्या सिद्धिर्यत्र न तिष्ठति । स पक्षस्तत्र..." ॥70॥
जहाँ साध्य (आग) का होना संदिग्ध हो और उसे सिद्ध करने की इच्छा हो, उसे 'पक्ष' कहते हैं (जैसे धुआँ उठता हुआ पर्वत)।


5. हेत्वाभास: तर्क के दोष (Fallacies of Inference)

हेतु का वास्तविक हेतु न होकर हेतु जैसा आभास देना ही 'हेत्वाभास' है। मुक्तावली में ५ प्रकार के हेत्वाभास बताए गए हैं:

"अनैकान्तों विरुद्धश्चाऽप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः । कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तु पञ्चधा" ॥71॥

  1. अनैकान्तिक (सव्यभिचार): जो हेतु साध्य के साथ एकांत (निश्चित) न हो। इसके तीन भेद हैं:

    • साधारण: जो सपक्ष और विपक्ष दोनों में रहे (उदा: पर्वत आग वाला है क्योंकि वह प्रमेय है—यहाँ 'प्रमेय' होना आग के बिना भी संभव है)।

    • असाधारण: जो केवल पक्ष में रहे (उदा: शब्द नित्य है क्योंकि इसमें शब्दत्व है)।

    • अनुपसंहारी: जिसका कोई दृष्टान्त न मिले।

  2. विरुद्ध: जो साध्य का ही विरोधी हो (उदा: शब्द नित्य है क्योंकि वह कार्य है—जबकि कार्य होना अनित्यता का लक्षण है)।

  3. असिद्ध: जिसका आधार ही सिद्ध न हो। इसके तीन भेद हैं:

    • आश्रयासिद्ध: (उदा: आकाशकमल सुगंधित है—यहाँ आश्रय 'आकाशकमल' ही असत्य है)।

    • स्वरूपासिद्ध: (उदा: झील द्रव्य है क्योंकि इसमें धुआँ है—झील में धुआँ संभव ही नहीं)।

    • व्याप्यत्वासिद्ध: जिसमें हेतु का साध्य के साथ संबंध दोषपूर्ण हो।

  4. सत्प्रतिपक्ष (प्रकरणसम): जब एक साध्य को सिद्ध करने वाले हेतु के विरुद्ध दूसरा समान बल वाला हेतु खड़ा हो जाए।

  5. कालात्ययापदिष्ट (बाध): जब प्रत्यक्ष प्रमाण से ही हेतु का साध्य बाधित हो जाए (उदा: आग शीतल है क्योंकि वह द्रव्य है—जबकि प्रत्यक्ष से आग उष्ण सिद्ध है)।


6. पञ्चावयव वाक्य (The Nyaya Syllogism)

न्याय दर्शन किसी भी तर्क को सिद्ध करने के लिए ५ चरणों का पालन करता है:

  1. प्रतिज्ञा: साध्य का निर्देश (पर्वतो वह्निमान्—पर्वत आग वाला है)।

  2. हेतु: कारण बताना (धूमात्—क्योंकि वहाँ धुआँ है)।

  3. उदाहरण: व्याप्ति का दृष्टान्त (यत्र यत्र धूमः तत्र तत्र वह्निः यथा महानसम्—जहाँ धुआँ है वहाँ आग है, जैसे रसोई)।

  4. उपनयन: हेतु का पक्ष के साथ उपसंहार (तथा चायम्—वैसा ही धुआँ इस पर्वत पर भी है)।

  5. निगमन: सिद्धान्त की पुनः स्थापना (तस्मात्तथा—इसलिए यह पर्वत आग वाला है)।


7. न्याय दर्शन के प्रमुख आचार्य और ग्रन्थ

न्याय शास्त्र की परंपरा अत्यंत समृद्ध है:

  • मेधातिथि गौतम: न्याय के प्राचीन प्रवर्तक।

  • वात्स्यायन: 'न्यायभाष्य' (प्रथम प्रामाणिक भाष्य)।

  • उद्योतकर: 'न्यायवार्तिक'।

  • वाचस्पति मिश्र: 'तात्पर्यटीका'।

  • जयन्त भट्ट: 'न्यायमञ्जरी' (अत्यंत विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ)।

  • उदयन: 'न्यायकुसुमाञ्जलि' (ईश्वर की सिद्धि हेतु सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ)।

  • अन्नंभट्ट: 'तर्कसंग्रह' (प्रारंभिक विद्यार्थियों हेतु)।

  • विश्वनाथ: 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली'।


8. ज्ञान का स्वरूप: प्रमा और अप्रमा

न्याय दर्शन के अनुसार, आत्मा का मन के साथ, मन का इन्द्रिय के साथ और इन्द्रिय का विषय के साथ जो संबंध होता है, उससे ज्ञान (बुद्धि) उत्पन्न होती है।

  • मुख्य प्रमा (अनुव्यवसाय): "अहं घटं जानामि" (मैं घड़े को जानता हूँ)।

  • गौण प्रमा (व्यवसाय): "अयं घटः" (यह घड़ा है)।

दुःख की निवृत्ति के लिए २१ प्रकार के दुखों (७ इन्द्रियाँ, ७ विषय, ७ ज्ञान आदि) का विनाश आवश्यक है, जो केवल तत्त्वज्ञान से ही संभव है।


निष्कर्ष

न्यायदर्शन केवल शुष्क तर्क नहीं है, बल्कि यह यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग है। न्यायसिद्धान्तमुक्तावली का अनुमान खण्ड हमें यह सिखाता है कि कैसे हम अपने दैनिक जीवन और आध्यात्मिक खोज में भ्रमों (हेत्वाभासों) से बचकर सत्य (प्रमा) तक पहुँच सकते हैं। भारतीय मेधा का यह 'आन्वीक्षिकी' शास्त्र आज भी आधुनिक तर्कशास्त्र (Logic) और कंप्यूटर विज्ञान की कोडिंग प्रणालियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-

योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )


(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-

दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-



मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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