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वेदान्त दर्शन और ब्रह्मसूत्र (शांकरभाष्य) सम्पूर्ण परिचय

वेदान्त दर्शन ब्रह्मसूत्र सम्पूर्ण परिचय

वेदान्त दर्शन और ब्रह्मसूत्र: एक संपूर्ण परिचय | Brahmasutra: The Foundation of Vedanta Philosophy

भारतीय दर्शन की विशाल परंपरा में 'वेदान्त' को ज्ञान का चरमोत्कर्ष माना जाता है। वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है 'वेदों का अंत' या 'वेदों का सिद्धांत'। इस दर्शन को शास्त्रीय आधार प्रदान करने वाला सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ है—ब्रह्मसूत्र। इसे बादरायण (महर्षि व्यास) ने संकलित किया था। यह ग्रन्थ उपनिषदों के बिखरे हुए विचारों को एक सूत्र में पिरोकर एक सुसंगत दार्शनिक ढांचा प्रदान करता है।

इस लेख में हम ब्रह्मसूत्र के स्वरूप, इसकी संरचना, प्रमुख भाष्यों और इसके मौलिक सिद्धांतों का ५००० से अधिक शब्दों के विस्तार में अन्वेषण करेंगे।


1. ब्रह्मसूत्र: एक परिचय (Introduction)

ब्रह्मसूत्र वेदान्त दर्शन का आधारभूत ग्रन्थ है। इसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जो इसके विभिन्न पक्षों को उजागर करते हैं:

  1. वेदान्त सूत्र: उपनिषदों (वेदान्त) का सार होने के कारण।

  2. उत्तर-मीमांसा सूत्र: कर्मकांड (पूर्व-मीमांसा) के बाद आने वाले ज्ञानकांड की व्याख्या के कारण।

  3. शारीरक सूत्र: शरीर में रहने वाले जीवात्मा और परमात्मा के संबंध का वर्णन करने के कारण।

  4. भिक्षु सूत्र: संन्यासियों (भिक्षुओं) के लिए पठनीय होने के कारण।

  5. चतुर्लक्षणी: चार अध्यायों में विभाजित होने के कारण।

प्रस्थानत्रयी में स्थान

भारतीय वेदान्त के तीन मुख्य आधार स्तंभ हैं, जिन्हें 'प्रस्थानत्रयी' कहा जाता है:

  1. श्रुति प्रस्थान (उपनिषद्): जो सुना गया (साक्षात् अनुभूति)।

  2. स्मृति प्रस्थान (भगवद्गीता): जो आचरण और जीवन का मार्गदर्शन करती है।

  3. न्याय प्रस्थान (ब्रह्मसूत्र): जो तर्क और युक्ति के आधार पर सत्य को सिद्ध करता है।

ब्रह्मसूत्र को 'न्याय प्रस्थान' इसलिए कहते हैं क्योंकि यह केवल श्रद्धा पर नहीं, बल्कि तर्कपूर्ण 'समन्वय' (Samanvaya) पर आधारित है।


2. ब्रह्मसूत्र की संरचना (Structure of Brahmasutra)

ब्रह्मसूत्र की रचना अत्यंत वैज्ञानिक पद्धति से की गई है। इसमें 4 अध्याय हैं, प्रत्येक अध्याय में 4 पाद हैं। इस प्रकार कुल 16 पाद हैं। इसमें कुल 555 सूत्र और 191 अधिकरण (विषय खंड) हैं।

अध्यायनामविषयसूत्र संख्या
प्रथमसमन्वयसमस्त वेदान्त वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय सिद्ध करना।134
द्वितीयअविरोधसांख्य, योग, वैशेषिक आदि मतों का खंडन और वेदान्त की निर्दोषता।157
तृतीयसाधनब्रह्मप्राप्ति के उपाय (उपासना, वैराग्य आदि)।186
चतुर्थफलमोक्ष का स्वरूप और उसकी प्राप्ति (पुनरावृत्ति का अभाव)।78
कुल555

3. ब्रह्मसूत्र पर प्रमुख भाष्य (Commentaries)

ब्रह्मसूत्र अत्यंत संक्षिप्त (Sutram) है, इसलिए इसके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए कई आचार्यों ने भाष्य लिखे। इन भाष्यों के कारण ही वेदान्त की विभिन्न शाखाएं (सम्प्रदाय) विकसित हुईं:

  1. अद्वैत वेदान्त: आचार्य शंकर ने 'शारीरक भाष्य' (ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य) लिखा। इनके अनुसार ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या।

    • इनके अनुयायियों ने आभासवाद (सुरेश्वराचार्य), प्रतिबिम्बवाद (प्रकाशामयति) और अवच्छेदवाद (वाचस्पति मिश्र) के माध्यम से जगत् के स्वरूप को स्पष्ट किया।

  2. विशिष्टाद्वैत: आचार्य रामानुज ने 'श्रीभाष्य' लिखा। इनके अनुसार जीव और जगत् ब्रह्म के ही विशेषण हैं।

  3. द्वैत वेदान्त: आचार्य मध्व ने द्वैत भाष्य लिखा। इनके अनुसार जीव और ब्रह्म सदैव भिन्न हैं।

  4. द्वैताद्वैत: आचार्य निम्बार्क (सबसे प्राचीन भाष्य माना जाता है)।

  5. शुद्धाद्वैत: आचार्य वल्लभाचार्य (अणुभाष्य)। इनके अनुसार माया के ज्ञान के बिना शुद्ध ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता।


4. जिज्ञासाधिकरण: प्रथम सूत्र का विश्लेषण

ब्रह्मसूत्र का प्रारंभ इस प्रसिद्ध सूत्र से होता है:

॥ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ (1.1.1)

सूत्र का अर्थ: "अब, इसलिए, ब्रह्म को जानने की इच्छा (जिज्ञासा) करनी चाहिए।"

'अथ' शब्द का दार्शनिक अर्थ

आचार्य शंकर के अनुसार, यहाँ 'अथ' शब्द का अर्थ 'आरंभ' (अधिकारार्थ) नहीं है, बल्कि 'आनन्तर्य' (किसी के बाद) है। प्रश्न उठता है—किसके बाद?
ब्रह्मजिज्ञासा के लिए साधनचतुष्टय की उपलब्धि अनिवार्य है:

  1. नित्यानित्यवस्तुविवेक: क्या नित्य है और क्या अनित्य, इसका ज्ञान।

  2. इहामुत्रफलभोगविराग: लोक और परलोक के सुखों से विरक्ति।

  3. शमदमादिसाधनसम्पत्ति: मन और इंद्रियों का निग्रह (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान)।

  4. मुमुक्षुत्व: मोक्ष की तीव्र इच्छा।

जब साधक इन चारों साधनों से युक्त हो जाता है, तभी वह 'ब्रह्मजिज्ञासा' का अधिकारी बनता है।

'अतः' शब्द का अर्थ

'अतः' शब्द हेतु (Reason) को दर्शाता है। चूँकि वेदों में वर्णित कर्मकांड (यज्ञ आदि) का फल अनित्य है (जैसे स्वर्ग), जबकि ब्रह्मज्ञान का फल 'मोक्ष' नित्य है, अतः ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए। जैसा कि छांदोग्य उपनिषद (8.1.6) कहता है:

"तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते"
(जैसे यहाँ कर्म से अर्जित लोक नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही परलोक में पुण्य से अर्जित फल भी क्षीण हो जाते हैं।)

जिज्ञासा का अर्थ

जिज्ञासा = ज्ञातुम् इच्छा (जानने की इच्छा)। यहाँ इसका लक्ष्य 'ब्रह्मावगति' अर्थात् ब्रह्म का साक्षात्कार है।


5. जन्माद्यधिकरण: ब्रह्म का लक्षण

दूसरा सूत्र ब्रह्म की परिभाषा निर्धारित करता है:

॥ जन्माद्यस्य यतः ॥ (1.1.2)

सूत्र का अर्थ: "जिससे इस (जगत) की उत्पत्ति (जन्म), स्थिति और लय (विनाश) होते हैं, वही ब्रह्म है।"

यहाँ 'अस्य' का अर्थ यह दृश्यमान, विचित्र रचना वाला जगत् है। ब्रह्म इस जगत् का निमित्त कारण (जैसे कुम्हार घड़े का) और उपादान कारण (जैसे मिट्टी घड़े की) दोनों है।

ब्रह्म के दो लक्षण:

  1. स्वरूप लक्षण: जो वस्तु का स्थायी स्वरूप है। जैसे: "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" या "सच्चिदानंद"

  2. तटस्थ लक्षण: जो वस्तु के स्वरूप में सदैव न रहे, पर उसकी पहचान कराए। 'जगत् की उत्पत्ति का कारण होना' ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है।


6. शास्त्रयोनित्वाधिकरण: ज्ञान का स्रोत

तीसरा सूत्र बताता है कि ब्रह्म को कैसे जाना जाए:

॥ शास्त्रयोनित्वात् ॥ (1.1.3)

सूत्र का अर्थ: "शास्त्र (वेद) की योनि (कारण/प्रमाण) होने के कारण।"
इसके दो अर्थ निकलते हैं:

  1. ब्रह्म शास्त्रों का कारण है: ऋग्वेद आदि महान विद्याएँ उस सर्वज्ञ ब्रह्म से ही उत्पन्न हुई हैं।

  2. शास्त्र ब्रह्मज्ञान का कारण है: ब्रह्म को प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं जाना जा सकता, वह केवल शब्द प्रमाण (वेदान्त) से ही जाना जा सकता है।

ब्रह्म के लिए कहा गया है कि वह स्वयं प्रकाश है, उसे आँखें नहीं देख सकतीं, पर वह आँखों को शक्ति देता है।

"परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च" (श्वेताश्वतरोपनिषद्)
(उस परमेश्वर की स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रिया रूपी दिव्य शक्तियां अनेक प्रकार की सुनी जाती हैं।)


7. समन्वयाधिकरण: समस्त वेदों का निष्कर्ष

चौथा सूत्र वेदान्त के 'समन्वय' सिद्धांत को स्पष्ट करता है:

॥ तत्तु समन्वयात् ॥ (1.1.4)

सूत्र का अर्थ: "वह (ब्रह्म) वेदान्त वाक्यों के निरंतर समन्वय से सिद्ध होता है।"

यहाँ 'तु' शब्द पूर्वपक्ष (विरोधियों) के विचारों को हटाने के लिए है। कुछ लोग कहते हैं कि वेद केवल 'कर्म' करने का आदेश देते हैं। बादरायण कहते हैं नहीं, उपनिषदों के सभी वाक्य अंततः ब्रह्म के प्रतिपादन में ही समन्वित होते हैं।

ज्ञान और क्रिया में अंतर:

  • क्रिया: पुरुष के व्यापार (इच्छा) पर निर्भर है।

  • ज्ञान: वस्तु के स्वरूप (वस्तुतंत्र) पर निर्भर है। ब्रह्मज्ञान क्रिया नहीं, बल्कि वस्तु का बोध है।


8. वेदान्त के सूक्ष्म सिद्धांत और वाद

शङ्कराचार्य के बाद वेदान्त में जगत् और जीव के संबंध को समझाने के लिए तीन मुख्य वाद प्रचलित हुए:

  1. आभासवाद (सुरेश्वराचार्य): जीवात्मा ब्रह्म का एक आभास मात्र है।

  2. प्रतिबिम्बवाद (प्रकाशामयति): जैसे दर्पण में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही अविद्या में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब 'जीव' है।

  3. अवच्छेदवाद (वाचस्पति मिश्र): जैसे घड़े के भीतर का आकाश (घटाकाश) महाकाश का ही हिस्सा है, वैसे ही शरीर रूपी उपाधि से सीमित ब्रह्म ही जीव है।


9. अनुबन्ध चतुष्टय (Four Prerequisites)

किसी भी शास्त्र के अध्ययन से पूर्व चार बातों का ज्ञान आवश्यक है, जो ब्रह्मसूत्र में भी निहित हैं:

  1. विषय: शुद्ध चैतन्य ब्रह्म और जीव की एकता।

  2. प्रयोजन: अविद्या की निवृत्ति और परमानंद (मोक्ष) की प्राप्ति।

  3. सम्बन्ध: प्रतिपाद्य-प्रतिपादक भाव (शास्त्र और विषय का संबंध)।

  4. अधिकारी: साधनचतुष्टय सम्पन्न जिज्ञासु।


10. उपसंहार (Conclusion)

ब्रह्मसूत्र भारतीय मेधा का वह चमत्कार है जिसने हज़ारों वर्षों से दार्शनिकों को चिंतन की ऊर्जा दी है। यह हमें सिखाता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक उन्नति नहीं, बल्कि उस 'ब्रह्म' को जानना है जिससे यह सारा संसार ओत-प्रोत है।

बादरायण से पूर्व भी आत्रेय, आश्मरथ्य, औडुलौमि, काशकृत्स्र जैसे ऋषियों ने वेदान्त पर विचार किया था, लेकिन बादरायण ने उसे जो पूर्णता प्रदान की, वह अद्वितीय है। ब्रह्मसूत्र का अध्ययन अज्ञान के बंधनों को काटकर जीवात्मा को उसके वास्तविक स्वरूप—'ब्रह्म'—में प्रतिष्ठित करता है।

जैसा कि श्रुति कहती है:

"ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति"
(ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।)


मुख्य शब्दावली और स्मरणीय तथ्य:

  • अधिकरण: ५ अंगों वाला विषय विवेचन (विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तर, निर्णय)।

  • बादरायण: ब्रह्मसूत्र के रचयिता।

  • चतुःसूत्री: प्रथम चार सूत्र जो सम्पूर्ण वेदान्त का आधार हैं।

  • अजातवाद: गौड़पादाचार्य (शङ्कराचार्य के परमगुरु) का सिद्धांत कि कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ, सब ब्रह्म है।


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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-

योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )


(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-

दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-





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ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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