वेदान्त दर्शन और ब्रह्मसूत्र: एक संपूर्ण परिचय | Brahmasutra: The Foundation of Vedanta Philosophy
1. ब्रह्मसूत्र: एक परिचय (Introduction)
वेदान्त सूत्र: उपनिषदों (वेदान्त) का सार होने के कारण। उत्तर-मीमांसा सूत्र: कर्मकांड (पूर्व-मीमांसा) के बाद आने वाले ज्ञानकांड की व्याख्या के कारण। शारीरक सूत्र: शरीर में रहने वाले जीवात्मा और परमात्मा के संबंध का वर्णन करने के कारण। भिक्षु सूत्र: संन्यासियों (भिक्षुओं) के लिए पठनीय होने के कारण। चतुर्लक्षणी: चार अध्यायों में विभाजित होने के कारण।
प्रस्थानत्रयी में स्थान
श्रुति प्रस्थान (उपनिषद्): जो सुना गया (साक्षात् अनुभूति)। स्मृति प्रस्थान (भगवद्गीता): जो आचरण और जीवन का मार्गदर्शन करती है। न्याय प्रस्थान (ब्रह्मसूत्र): जो तर्क और युक्ति के आधार पर सत्य को सिद्ध करता है।
2. ब्रह्मसूत्र की संरचना (Structure of Brahmasutra)
3. ब्रह्मसूत्र पर प्रमुख भाष्य (Commentaries)
अद्वैत वेदान्त: आचार्य शंकर ने 'शारीरक भाष्य' (ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य) लिखा। इनके अनुसार ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या। इनके अनुयायियों ने आभासवाद (सुरेश्वराचार्य), प्रतिबिम्बवाद (प्रकाशामयति) और अवच्छेदवाद (वाचस्पति मिश्र) के माध्यम से जगत् के स्वरूप को स्पष्ट किया।
विशिष्टाद्वैत: आचार्य रामानुज ने 'श्रीभाष्य' लिखा। इनके अनुसार जीव और जगत् ब्रह्म के ही विशेषण हैं। द्वैत वेदान्त: आचार्य मध्व ने द्वैत भाष्य लिखा। इनके अनुसार जीव और ब्रह्म सदैव भिन्न हैं। द्वैताद्वैत: आचार्य निम्बार्क (सबसे प्राचीन भाष्य माना जाता है)। शुद्धाद्वैत: आचार्य वल्लभाचार्य (अणुभाष्य)। इनके अनुसार माया के ज्ञान के बिना शुद्ध ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता।
4. जिज्ञासाधिकरण: प्रथम सूत्र का विश्लेषण
॥ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ (1.1.1)
'अथ' शब्द का दार्शनिक अर्थ
नित्यानित्यवस्तुविवेक: क्या नित्य है और क्या अनित्य, इसका ज्ञान। इहामुत्रफलभोगविराग: लोक और परलोक के सुखों से विरक्ति। शमदमादिसाधनसम्पत्ति: मन और इंद्रियों का निग्रह (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान)। मुमुक्षुत्व: मोक्ष की तीव्र इच्छा।
'अतः' शब्द का अर्थ
"तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते" (जैसे यहाँ कर्म से अर्जित लोक नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही परलोक में पुण्य से अर्जित फल भी क्षीण हो जाते हैं।)
जिज्ञासा का अर्थ
5. जन्माद्यधिकरण: ब्रह्म का लक्षण
॥ जन्माद्यस्य यतः ॥ (1.1.2)
ब्रह्म के दो लक्षण:
स्वरूप लक्षण: जो वस्तु का स्थायी स्वरूप है। जैसे: "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" या "सच्चिदानंद"। तटस्थ लक्षण: जो वस्तु के स्वरूप में सदैव न रहे, पर उसकी पहचान कराए। 'जगत् की उत्पत्ति का कारण होना' ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है।
6. शास्त्रयोनित्वाधिकरण: ज्ञान का स्रोत
॥ शास्त्रयोनित्वात् ॥ (1.1.3)
ब्रह्म शास्त्रों का कारण है: ऋग्वेद आदि महान विद्याएँ उस सर्वज्ञ ब्रह्म से ही उत्पन्न हुई हैं। शास्त्र ब्रह्मज्ञान का कारण है: ब्रह्म को प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं जाना जा सकता, वह केवल शब्द प्रमाण (वेदान्त) से ही जाना जा सकता है।
"परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च" (श्वेताश्वतरोपनिषद्) (उस परमेश्वर की स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रिया रूपी दिव्य शक्तियां अनेक प्रकार की सुनी जाती हैं।)
7. समन्वयाधिकरण: समस्त वेदों का निष्कर्ष
॥ तत्तु समन्वयात् ॥ (1.1.4)
क्रिया: पुरुष के व्यापार (इच्छा) पर निर्भर है। ज्ञान: वस्तु के स्वरूप (वस्तुतंत्र) पर निर्भर है। ब्रह्मज्ञान क्रिया नहीं, बल्कि वस्तु का बोध है।
8. वेदान्त के सूक्ष्म सिद्धांत और वाद
आभासवाद (सुरेश्वराचार्य): जीवात्मा ब्रह्म का एक आभास मात्र है। प्रतिबिम्बवाद (प्रकाशामयति): जैसे दर्पण में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही अविद्या में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब 'जीव' है। अवच्छेदवाद (वाचस्पति मिश्र): जैसे घड़े के भीतर का आकाश (घटाकाश) महाकाश का ही हिस्सा है, वैसे ही शरीर रूपी उपाधि से सीमित ब्रह्म ही जीव है।
9. अनुबन्ध चतुष्टय (Four Prerequisites)
विषय: शुद्ध चैतन्य ब्रह्म और जीव की एकता। प्रयोजन: अविद्या की निवृत्ति और परमानंद (मोक्ष) की प्राप्ति। सम्बन्ध: प्रतिपाद्य-प्रतिपादक भाव (शास्त्र और विषय का संबंध)। अधिकारी: साधनचतुष्टय सम्पन्न जिज्ञासु।
10. उपसंहार (Conclusion)
"ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" (ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।)
मुख्य शब्दावली और स्मरणीय तथ्य:
अधिकरण: ५ अंगों वाला विषय विवेचन (विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तर, निर्णय)। बादरायण: ब्रह्मसूत्र के रचयिता। चतुःसूत्री: प्रथम चार सूत्र जो सम्पूर्ण वेदान्त का आधार हैं। अजातवाद: गौड़पादाचार्य (शङ्कराचार्य के परमगुरु) का सिद्धांत कि कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ, सब ब्रह्म है।
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