सर्वदर्शनसंग्रह में जैन मत, बौद्ध मत और चार्वाक मत का विस्तृत अध्ययन
भारतीय दर्शनशास्त्र मानवीय चिंतन की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है। “सर्वदर्शनसंग्रह” हमारे देश के महान दार्शनिक मतों का एक अद्भुत संकलन है, जिसमें वैदिक एवं अवैदिक दोनों प्रकार के दर्शन सम्मिलित हैं। इस लेख में हम उन तीन महत्वपूर्ण नास्तिक दर्शनों—जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन और चार्वाक दर्शन—का विस्तृत विवेचन करेंगे, जिनका प्रभाव भारतीय चिंतन पर अमिट रहा है।
जैन दर्शन : अहिंसा, आत्मा और मोक्ष का मार्ग
“अहिंसा परमोधर्मः”
— जिनवाणी (जैन आगम)
जैन दर्शन भारतीय आस्तिक और नास्तिक परंपराओं के बीच का संतुलन प्रस्तुत करता है। इसमें ईश्वर की सर्जनात्मक सत्ता को नहीं माना गया है, परंतु आत्मा, कर्म और मोक्ष की अवधारणाएँ अत्यंत गूढ़ रूप में विवेचित हैं।
🕊️ जैन दर्शन की उत्पत्ति
जैन परंपरा के अनुसार, २४ तीर्थंकरों ने समय-समय पर इस संसार में अवतरित होकर जीवों को मोक्षमार्ग की प्रेरणा दी।
पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे, जबकि अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (छठी शताब्दी ई.पू.) ने इस दर्शन का पुनरुद्धार किया।
🧘 जैन शब्द की व्युत्पत्ति
“जैन” शब्द ‘जिन’ से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है—विजेता।
सिर्फ बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि वह जिसने मन, वासना और राग-द्वेष पर विजय प्राप्त कर ली हो।
ऐसे “जिन” के अनुयायी “जैन” कहलाते हैं। जैन दर्शन को “अर्हत दर्शन” भी कहा जाता है।
📜 जैन दर्शन के प्रमुख ग्रंथ
जैन दर्शन के प्राथमिक ग्रंथ प्राकृत (मागधी) भाषा में रचे गए।
बाद में संस्कृत में दार्शनिक ग्रंथ लिखे गए, जिनमें प्रमुख है—
- तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित, लगभग 100 ई.)
यह जैन दर्शन का प्रथम संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें सभी तत्त्वों और सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप में रखा गया है।
अन्य प्रसिद्ध जैन आचार्य हैं:
सिद्धसेन दिवाकर (500 ई.), हरिभद्राचार्य (900 ई.), और मेरुतुंगाचार्य (14वीं शताब्दी)।
सात तत्त्व — जैन दर्शन के स्तंभ
जैन दर्शन में सात मूल तत्त्व माने गए हैं:
- जीव (आत्मा)
- अजीव (पदार्थ)
- आस्रव (कर्मों का प्रवाह)
- बन्ध (कर्मबंधन)
- संवर (कर्मों का अवरोध)
- निर्जरा (कर्मों का नाश)
- मोक्ष (मुक्ति)
इन तत्त्वों का सूत्र इस प्रकार है:
“जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरमोक्षास्तत्त्वानि।”
🧩 जीव और अजीव
जीव वह है जिसमें चेतना का अस्तित्व है—वह अनादि, अनन्त और अनश्वर है।
अजीव के पाँच प्रकार हैं:
- पुद्गल (भौतिक द्रव्य)
- धर्म (गति के लिए सहायक)
- अधर्म (स्थिति के लिए सहायक)
- आकाश (स्थान देने वाला)
- काल (परिवर्तन का द्रव्य)
🧘 मोक्ष का मार्ग : त्रिरत्न (Three Jewels of Liberation)
जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए तीन रत्न आवश्यक हैं:
सम्यक् दर्शन — सत्य तत्त्वों में श्रद्धा
“तत्त्वार्थ श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्।”
सम्यक् ज्ञान — तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान
“यथावस्थित तत्त्वानाम् संक्षेपाद्विस्तरेण वा।
योऽवबोधस्तमत्राहुः सम्यग्ज्ञानं मनीषिणः॥”सम्यक् चरित्र — सदाचार व संयम का पालन
ये तीनों मिलकर “त्रिरत्न” या “रत्नत्रय” कहलाते हैं।
पंचमहाव्रत — आचार का आधार
महावीर स्वामी ने प्रत्येक साधक के लिए पाँच प्रमुख व्रत बताए:
- अहिंसा (प्राणियों को न मारना)
- सत्य (सत्य वचन बोलना)
- अस्तेय (चोरी न करना)
- ब्रह्मचर्य (काम से विरति)
- अपरिग्रह (संपत्ति का त्याग)
गृहस्थों के लिए ये “अणुव्रत” कहे गए हैं।
ज्ञान के पाँच प्रकार
- मति ज्ञान — इंद्रियों से प्राप्त
- श्रुत ज्ञान — शास्त्र और श्रवण से
- अवधि ज्ञान — सूक्ष्म वस्तुओं का अनुभव
- मनः पर्याय ज्ञान — दूसरों के विचार जानना
- केवल ज्ञान — सर्वज्ञता, जो मोक्ष से पूर्व प्राप्त होती है।
“तज्ज्ञानं पञ्चविधं मति-श्रुत-अवधि-मनःपर्याय-केवलभेदेन।”
स्याद्वाद और सप्तभंगीनय
जैनी तर्कशास्त्र का मर्म “स्याद्वाद” और “सप्तभंगीनय” में निहित है।
यह विचार कहता है कि किसी भी वस्तु या सत्य का निर्णय “सापेक्षता” के सिद्धांत पर होना चाहिए।
“स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च...”
यह सात प्रकार की दृष्टियों से सत्य को दृष्ट करने का तरीका बताता है।
यही सापेक्षता का भाव जैन दर्शन को सहिष्णुता का दर्शन बनाता है।
🕉️बौद्ध दर्शन : मध्य मार्ग का विज्ञान
“अप्प दीपो भव” – गौतम बुद्ध
बौद्ध दर्शन, भगवान बुद्ध के बोध एवं निर्वाण के पश्चात् उनके शिष्यों द्वारा विकसित विचार प्रणाली है।
इसका मूल उद्देश्य — “दुःख से मुक्ति” है।
बौद्ध दर्शन का आधार
बुद्ध के उपदेशों का संग्रह तीन पिटकों में है:
- विनय पिटक — अनुशासन एवं आचार
- सुत्त पिटक — धर्मोपदेश एवं प्रवचन
- अभिधम्म पिटक — दार्शनिक विश्लेषण
इन तीनों को मिलाकर त्रिपिटक कहा जाता है।
चार आर्य सत्य (Four Noble Truths)
बुद्ध का दर्शन चार आर्य सत्यों पर आधारित है:
- दुःख: संसार का सार दुःख है।
- दुःख-समुदय: तृष्णा (इच्छा) दुःख का कारण है।
- दुःख-निरोध: तृष्णा के क्षय से दुःख का अंत संभव है।
- दुःख-निरोध मार्ग: अष्टांगिक मार्ग ही मुक्ति का साधन है।
अष्टांगिक मार्ग
- सम्यक दृष्टि
- सम्यक संकल्प
- सम्यक वाणी
- सम्यक कर्म
- सम्यक आजीव
- सम्यक प्रयत्न
- सम्यक स्मृति
- सम्यक समाधि
इन्हीं मार्गों का अनुसरण कर व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है।
“चित्तं दंमयं सुखं,” — धम्मपद
(नियंत्रित चित्त ही सच्चा सुख है)
बौद्ध दर्शन के चार प्रमुख मत
- वैभाषिक मत (सर्वास्तिवाद) — बाह्य वस्तु वास्तविक है, किन्तु क्षणिक।
- सौत्रान्तिक मत — बाह्य वस्तु अनुमान से जानी जा सकती है।
- योगाचार मत (विज्ञानवाद) — सब कुछ ‘चित्त’ ही है; बाह्य पदार्थ मायिक हैं।
- माध्यमिक मत (शून्यवाद) — न आत्मा है, न वस्तु; सब कुछ शून्य है।
“सर्वं शून्यं सर्वं शून्यम्” — नागार्जुन
प्रतीत्यसमुत्पाद : बौद्धों का कारणवाद
“इमस्मिं सति इदं होता — इदं असति इदं न होता।”
(जब यह है तो वह उत्पन्न होता है; जब यह नहीं है तो वह नहीं होता।)
यह सिद्धांत कारण और कार्य के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करता है।
यह न शाश्वतवाद है, न नास्तित्ववाद — बल्कि मध्यम मार्ग है।
बौद्ध दर्शन के तीन शील
- शील (आचरण का अनुशासन)
- समाधि (ध्यान व एकाग्रता)
- प्रज्ञा (तत्त्वज्ञान)
इन्हें “त्रिशिक्षा” कहा गया है।
अनात्मवाद और शून्यवाद
बुद्ध ने कहा —
“अनत्ता लक्षणं – न किञ्चि आत्मा।”
अर्थात् ‘आत्मा’ स्थायी अस्तित्व नहीं, बल्कि मानसीक प्रवाह है।
नागार्जुन ने इसे और विकसित किया और कहा —
“शून्यता सर्वदृष्टिनां प्रभवो यदि निःश्रिताः।”
शून्यता का अर्थ “नि:स्वभावता” है — किसी भी तत्व का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं।
बौद्ध दर्शन के प्रमुख आचार्य
- नागार्जुन (माध्यमिक मत)
- वसुबंधु और असंग (योगाचार मत)
- दिङ्नाग और धर्मकीर्ति (प्रमाणवाद के अग्रदूत)
- शान्तरक्षित, चन्द्रकीर्ति, वसुमित्र आदि
🔥 चार्वाक दर्शन : भौतिक यथार्थ का विज्ञान
“यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥”
चार्वाक या लोकायत दर्शन भारतीय भौतिकवाद का प्रथम स्वरूप है।
यह दर्शन प्रत्यक्ष प्रमाण को ही सत्य मानता है, और आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं को अस्वीकार करता है।
चार्वाक दर्शन की विशेषताएँ
प्रत्यक्षवाद: केवल इंद्रियों द्वारा अनुभव ही सत्य है।
“प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्।”
भौतिकवाद: संसार चार तत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु – से बना है।
देहात्मवाद: शरीर ही आत्मा है।
सुखवाद: जीवन का उद्देश्य केवल आनंद है।
अनीश्वरवाद: ईश्वर और वेद दोनों असत्य हैं।
चार्वाक के प्रमुख सिद्धांत
चार्वाक दर्शन के अनुसार—
“मरणमेव अपवर्गः”
अर्थात् मृत्यु ही मुक्ति है।
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि जब तक जीवन है, वह पूर्ण आनंद और भौतिक सुखों का आस्वादन करे।
चैतन्य, शरीर से पृथक कोई सत्ता नहीं; यह केवल चार तत्वों के संयोग से उत्पन्न गुण है—
“पक्वान्नस्य यथा गन्धः तद्वद् देहे चैतन्यम्।”
चार्वाक दर्शन का तात्त्विक सार
- आत्मा: शरीर ही आत्मा।
- ज्ञान: केवल इंद्रिय अनुभव से।
- मोक्ष: मृत्यु के बाद कुछ नहीं, इसलिए मोक्ष की कल्पना व्यर्थ।
- धर्म: आनंद की प्राप्ति ही धर्म है।
यह दृष्टिकोण व्यावहारिक संसार को ही वास्तविकता मानता है।
🧩 सर्वदर्शनसंग्रह का महत्व
“सर्वदर्शनसंग्रह” में इन तीनों दर्शन सहित 16 प्राचीन भारतीय दार्शनिक प्रणालियाँ सम्मिलित हैं।
इन दर्शनों का क्रमबद्ध अध्ययन न केवल भारतीय बौद्धिक इतिहास को समझने में सहायक है,
बल्कि यह दिखाता है कि भारतवर्ष ने सत्य की खोज में कितनी विविध धारणाओं को जन्म दिया।
🪔 निष्कर्ष
जैन, बौद्ध और चार्वाक दर्शन — तीनों ही भारतीय दर्शन के नास्तिक प्रवाह में अमूल्य योगदान रखते हैं।
- जैन दर्शन — आत्मशुद्धि और अहिंसा का मार्ग।
- बौद्ध दर्शन — मध्यम पथ और करुणा का दर्शन।
- चार्वाक दर्शन — भौतिक यथार्थ की स्वीकृति।
तीनों के विचार भिन्न हैं, पर उद्देश्य एक — मनुष्य के कल्याण का मार्ग खोज।
“न हिंस्यात् सर्वा भूतानि, करुणा सर्वत्र भाव्यते।”
“अप्प दीपो भव।”
“यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्।”
इन तीनों सूत्रों में भारतीय दर्शन का सम्पूर्ण सार निहित है —
अहिंसा, करुणा और यथार्थ।
जैन दर्शन विस्तार से, बौद्ध दर्शन चार आर्य सत्य, चार्वाक दर्शन क्या है, सर्वदर्शनसंग्रह, नास्तिक दर्शन, जैन दार्शनिक तत्त्व, बौद्ध धर्म का दर्शन, माध्यमिक शून्यवाद, योगाचार विज्ञानवाद, प्रत्यक्षवाद दर्शन, भारतीय दर्शन के मत।
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