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योग दर्शन - पातंजलयोगदर्शनम् सम्पूर्ण परिचय

योग दर्शन - पातंजलयोगदर्शनम् सम्पूर्ण परिचय

योग दर्शन: पातंजलयोगदर्शनम् का संपूर्ण परिचय | Yoga Darshana: A Comprehensive Guide

भारतीय वाङ्मय में षड्दर्शनों (छह आस्तिक दर्शनों) का अत्यंत गौरवशाली स्थान है। इनमें योग दर्शन न केवल एक सैद्धांतिक दर्शन है, बल्कि यह एक व्यावहारिक जीवन पद्धति भी है। इसे महर्षि पतंजलि ने 'योगसूत्रों' के माध्यम से संकलित किया। यदि आप मोक्ष, मानसिक शांति और कैवल्य की खोज में हैं, तो योग दर्शन आपके लिए सर्वोच्च मार्गदर्शिका है।

इस विशेष लेख में, हम योग दर्शन के चारों पादों, चित्त की भूमियों, अष्टांग योग और कैवल्य की गहन विवेचना करेंगे।


1. योग दर्शन का उद्भव और परिचय (Introduction to Yoga Philosophy)

योग दर्शन सांख्य दर्शन का पूरक माना जाता है। जहाँ सांख्य दर्शन 'तत्त्वमीमांसा' (Theory of Reality) पर बल देता है, वहीं योग दर्शन उन तत्त्वों को अनुभव करने की 'प्रक्रिया' (Practice) बताता है।

सेश्वर सांख्य (Theistic Samkhya)

सांख्य दर्शन को 'निरीश्वर सांख्य' कहा जाता है क्योंकि वह ईश्वर की सत्ता पर मौन है, जबकि योग दर्शन सांख्य की तत्त्वमीमांसा को स्वीकार करते हुए उसमें 'ईश्वर' को जोड़ देता है। इसीलिए इसे 'सेश्वर सांख्य' कहा जाता है।

योगसूत्र की संरचना

योगसूत्र में कुल 4 पाद (अध्याय) और 195/196 सूत्र हैं:

  1. समाधि पाद (51 सूत्र): योग के स्वरूप और चित्त वृत्तियों का वर्णन।

  2. साधन पाद (55 सूत्र): क्लेश, क्रियायोग और अष्टांग योग के बहिरंग अंगों का वर्णन।

  3. विभूति पाद (55 सूत्र): योग के अंतरंग अंगों और सिद्धियों का वर्णन।

  4. कैवल्य पाद (34 सूत्र): मोक्ष, निर्वाण और चित्त के विलीनीकरण का वर्णन।


2. योग की परिभाषा और व्युत्पत्ति (Definition of Yoga)

'योग' शब्द की निष्पत्ति संस्कृत की 'युज्' धातु से हुई है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार 'युज्' धातु तीन अर्थों में प्रयुक्त होती है:

  1. युज् समाधौ (दिवादिगण): समाधि के अर्थ में।

  2. युजिर योगे (रुधादिगण): जोड़ना या मिलन।

  3. युज संयमने (चुरादिगण): नियंत्रण या संयमन।

पातंजल योग दर्शन में योग का अभीष्ट अर्थ 'समाधि' और 'चित्तवृत्ति निरोध' है।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ (योगसूत्र 1.2)
अर्थ: चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है।

भगवद्गीता (6/23) में भी कहा गया है:

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥
अर्थ: दुःखरूप संसार के संयोग से रहित होना ही योग है।


3. प्रथम अध्याय: समाधि पाद (Samadhi Pada)

समाधि पाद योग के उच्चतम लक्ष्य और मानसिक अवस्थाओं का विश्लेषण करता है।

(A) चित्त की भूमियाँ (States of Mind)

चित्त त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) है। व्यास भाष्य के अनुसार चित्त की 5 भूमियाँ हैं:

  1. क्षिप्त: रजोगुण के कारण अत्यंत चंचल मन (सांसारिक विषयों में भटकना)।

  2. मूढ़: तमोगुण के कारण निद्रा, आलस्य और अज्ञान में डूबा मन।

  3. विक्षिप्त: सत्व की प्रधानता लेकिन कभी-कभी चंचलता (भक्ति या पूजा में मन का थोड़ा टिकना)।

  4. एकाग्र: सत्वगुण की पूर्ण प्रधानता, जहाँ चित्त एक ही विषय पर टिका रहे। यहाँ 'सम्प्रज्ञात समाधि' होती है।

  5. निरुद्ध: सभी वृत्तियों का निरोध। यहाँ 'असम्प्रज्ञात समाधि' घटित होती है।

(B) चित्त की वृत्तियाँ (Fluctuations of Mind)

वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं, जो क्लिष्ट (दुःखदायी) या अक्लिष्ट (कल्याणकारी) हो सकती हैं:

  1. प्रमाण: प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम (सही ज्ञान)।

  2. विपर्यय: मिथ्या ज्ञान (भ्रम)।

  3. विकल्प: शब्द के ज्ञान से होने वाला वस्तुशून्य ज्ञान (कल्पना)।

  4. निद्रा: अभाव के प्रत्यय का अवलंबन करने वाली वृत्ति।

  5. स्मृति: अनुभूत विषयों का पुनः प्रकट होना।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ (1.12)
इन वृत्तियों को रोकने के दो उपाय हैं: अभ्यास (निरंतर प्रयत्न) और वैराग्य (विषयों में तृष्णा का अभाव)।

(C) ईश्वर का स्वरूप (Concept of God)

पतंजलि के अनुसार ईश्वर एक 'विशेष पुरुष' है।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ (1.24)
अर्थात्: जो क्लेश, कर्म, विपाक और वासनाओं से अछूता है, वह 'ईश्वर' है। उसका वाचक शब्द 'प्रणव' (ॐ) है।


4. द्वितीय अध्याय: साधन पाद (Sadhana Pada)

यह पाद साधकों के लिए व्यावहारिक मार्ग प्रशस्त करता है।

(A) क्रियायोग (Kriya Yoga)

साधारण मनुष्यों के लिए पतंजलि ने क्रियायोग बताया है:

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ (2.1)

  1. तप: द्वंद्वों को सहना।

  2. स्वाध्याय: मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन और मंत्र जप।

  3. ईश्वर प्रणिधान: सब कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना।

(B) पञ्च क्लेश (Five Afflictions)

मनुष्य के दुखों के मूल कारण 5 क्लेश हैं:

  1. अविद्या: अनित्य को नित्य समझना (अज्ञान)।

  2. अस्मिता: बुद्धि और आत्मा को एक ही मान लेना (अहंकार)।

  3. राग: सुखद विषयों के प्रति आसक्ति।

  4. द्वेष: दुःखद विषयों के प्रति घृणा।

  5. अभिनिवेश: मृत्यु का भय।

(C) अष्टांग योग (The Eight Limbs of Yoga)

मोक्ष प्राप्ति हेतु पतंजलि ने आठ अंगों का विधान किया है:

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥ (2.29)

1. यम (Social Ethics)

  • अहिंसा: किसी को कष्ट न देना।

  • सत्य: यथार्थ बोलना।

  • अस्तेय: चोरी न करना।

  • ब्रह्मचर्य: इंद्रियों पर संयम।

  • अपरिग्रह: अनावश्यक वस्तुओं का संचय न करना।

2. नियम (Personal Observances)

  • शौच: शुद्धि (आंतरिक और बाह्य)।

  • संतोष: जो प्राप्त है उसमें सुखी रहना।

  • तप: अनुशासन।

  • स्वाध्याय: आत्म-अध्ययन।

  • ईश्वर प्रणिधान: समर्पण।

3. आसन (Posture)

स्थिरसुखमासनम् ॥ (2.46) - जो स्थिर और सुखदायक हो, वही आसन है।

4. प्राणायाम (Breath Control)

श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद करना। इसके भेद हैं: बाह्य वृत्ति (रेचक), आभ्यंतर वृत्ति (पूरक) और स्तम्भ वृत्ति (कुम्भक)।

5. प्रत्याहार (Withdrawal of Senses)

इंद्रियों को उनके विषयों (रूप, रस, गंध आदि) से हटाकर चित्त के स्वरूप में लीन करना।


5. तृतीय अध्याय: विभूति पाद (Vibhuti Pada)

अष्टांग योग के अंतिम तीन अंगों को 'अन्तरंग योग' कहा जाता है।

(A) धारणा, ध्यान और समाधि

  1. धारणा: चित्त को एक स्थान (जैसे हृदय कमल या नासिकाग्र) पर बांधना।

  2. ध्यान: उस स्थान पर ज्ञान की एकतानता (निरंतर प्रवाह)।

  3. समाधि: जब केवल ध्येय वस्तु का ही आभास रहे और अपना स्वरूप शून्य जैसा हो जाए।

इन तीनों के सम्मिलित रूप को 'संयम' कहा जाता है।

त्रयमेकत्र संयमः ॥ (3.4)

(B) सिद्धियाँ (Vibhutis)

संयम के माध्यम से योगी को विभिन्न सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  • अतीत और अनागत का ज्ञान।

  • पशु-पक्षियों की वाणी का ज्ञान।

  • अदृश्य होने की शक्ति (कायारूप संयम)।

  • अणिमा, महिमा, लघिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ।

  • सावधानी: पतंजलि चेतावनी देते हैं कि ये सिद्धियाँ समाधि में बाधक हैं (ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः)।


6. चतुर्थ अध्याय: कैवल्य पाद (Kaivalya Pada)

यह अध्याय योग दर्शन की पराकाष्ठा है। यहाँ मोक्ष के सूक्ष्म रहस्यों को उजागर किया गया है।

(A) सिद्धियों के स्रोत

सिद्धियाँ पाँच प्रकार से प्राप्त हो सकती हैं: जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि। इनमें समाधि से उत्पन्न सिद्धि ही निर्दोष और स्थायी होती है।

(B) कर्म के प्रकार

सामान्य मनुष्यों के कर्म शुक्ल (अच्छे), कृष्ण (बुरे) या मिश्रित होते हैं, लेकिन योगी के कर्म 'अशुक्ल-अकृष्ण' होते हैं।

(C) कैवल्य का स्वरूप

जब बुद्धि (सत्व) और पुरुष (आत्मा) की शुद्धि समान हो जाती है, तब कैवल्य प्राप्त होता है।

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥ (4.34)
अर्थात्: गुणों का अपने मूल (प्रकृति) में विलीन हो जाना और पुरुष का अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होना ही कैवल्य है।


7. चित्त के विक्षेप और अन्तराय (Obstacles in Yoga)

योग मार्ग में सफलता के मार्ग में 9 मुख्य बाधाएँ (अन्तराय) आती हैं:

  1. व्याधि: शारीरिक रोग।

  2. स्त्यान: मानसिक अकर्मण्यता।

  3. संशय: दुविधा।

  4. प्रमाद: सावधानी की कमी।

  5. आलस्य: भारीपन।

  6. अविरति: विषयों के प्रति वैराग्य का अभाव।

  7. भ्रान्तिदर्शन: गलत धारणा।

  8. अलब्धभूमिकत्व: समाधि की स्थिति प्राप्त न होना।

  9. अनवस्थितत्व: प्राप्त स्थिति में टिक न पाना।

इनके साथ दुःख, दौर्मनस्य (मानसिक अशांति), अंगमेजयत्व (शरीर का कांपना) और श्वास-प्रश्वास की अनियमितता भी होती है। इनका निवारण 'एकतत्त्वाभ्यास' और 'मैत्री-करुणा-मुदितोपेक्षा' के भाव से होता है।


8. योग दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ और व्याख्याकार

योग दर्शन को समझने के लिए निम्नलिखित साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  1. योगसूत्र: महर्षि पतंजलि (मूल ग्रन्थ)।

  2. व्यासभाष्य: महर्षि वेदव्यास (सर्वश्रेष्ठ व्याख्या)।

  3. तत्त्ववैशारदी: वाचस्पति मिश्र।

  4. भोजवृत्ति: राजा भोज।

  5. योगवार्तिक: विज्ञानभिक्षु।

  6. योगमणिप्रभा: रामानन्द सरस्वती।


9. निष्कर्ष (Conclusion)

पतंजलि का योग दर्शन केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता का उच्चतम शिखर है। यह हमें 'चतुर्व्यूहवाद' (हेय, हेय-हेतु, हान, हानोपाय) के माध्यम से दुखों से मुक्ति का वैज्ञानिक मार्ग बताता है।

चाहे आप एक विद्यार्थी हों, जिज्ञासु हों या साधक, योग दर्शन के सिद्धांतों (जैसे यम-नियम और चित्त वृत्ति निरोध) को अपनाकर आप जीवन में पुरूषार्थशून्यता और परम आनंद (कैवल्य) की प्राप्ति कर सकते हैं।

"चित्तस्य शुद्धये योगः" - चित्त की शुद्धि के लिए ही योग है।



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(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-

योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )


(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-

दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-



मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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