महर्षि कात्यायन (वररुचि): पाणिनीय व्याकरण के महान वार्तिककार और 'त्रिमूनि' परंपरा के स्तंभ
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण की दिव्य त्रिमूर्ति
संस्कृत भाषा केवल एक संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह 'देववाणी' है। इस भाषा को परिष्कृत और वैज्ञानिक रूप देने का श्रेय 'व्याकरण शास्त्र' को जाता है। संस्कृत व्याकरण के इतिहास में तीन ऋषियों का स्थान सर्वोच्च है, जिन्हें 'त्रिमूनि' कहा जाता है:
महर्षि पाणिनि (अष्टाध्यायी के रचयिता)
महर्षि कात्यायन (वार्तिककार)
महर्षि पतंजलि (महाभाष्यकार)
आज के इस विशेष लेख में हम 'त्रिमूनि' के द्वितीय स्तंभ महर्षि कात्यायन (300 ई. पू.) के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। कात्यायन न केवल एक महान व्याकरणवेत्ता थे, बल्कि वे एक कुशल कवि, स्मृतिशार और दार्शनिक भी थे।
संस्कृत जगत में उनके महत्व को इस श्लोक से समझा जा सकता है:
वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम्।
पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम्॥
(अर्थ: वाक्यों/वार्तिकों के रचयिता वररुचि (कात्यायन), भाष्यों के रचयिता पतंजलि और सूत्रों के रचयिता पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ।)
कात्यायन का परिचय और विभिन्न नाम
ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्यों के अनुसार, कात्यायन का समय लगभग 300 ईसा पूर्व माना जाता है। विद्वानों ने उनके व्यक्तित्व को विभिन्न नामों से अलंकृत किया है। पुरुषोत्तमदेव ने अपने प्रसिद्ध कोष 'त्रिकांडशेष अभिधानकोश' में कात्यायन के निम्नलिखित नामों का उल्लेख किया है:
कात्य: यह उनका गोत्र-नाम है। महर्षि पतंजलि ने 'महाभाष्य' में इस नाम का स्पष्ट उल्लेख किया है।
पुनर्वसु: यह नाम उनके जन्म नक्षत्र से संबंधित है। 'भाषावृत्ति' नामक ग्रंथ में 'पुनर्वसु' को वररुचि का ही पर्याय माना गया है।
मेधाजित्: यद्यपि इस नाम का उल्लेख अन्यत्र दुर्लभ है, किंतु कोष ग्रंथों में इसे कात्यायन का ही एक नाम माना गया है, जो उनकी प्रखर बुद्धि (मेधा) का परिचायक है।
वररुचि: यह उनका सबसे लोकप्रिय नाम है। 'हेमचंद्र' और 'मेदिनी' कोषों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कात्यायन और वररुचि एक ही व्यक्ति हैं।
श्रुतधर: 'कथासरित्सागर' और 'बृहत्कथामंजरी' जैसे कथा ग्रंथों में कात्यायन को 'श्रुतधर' भी कहा गया है। इसका अर्थ है—वह व्यक्ति जिसे केवल एक बार सुनने मात्र से सब कुछ याद हो जाए।
कात्यायन की भौगोलिक पृष्ठभूमि: दाक्षिणात्य संबंध
महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में कात्यायन के विषय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत दिया है:
"प्रियतद्धिताः हि दाक्षिणात्याः"
इसका अर्थ है कि 'दक्षिण भारत के लोग तद्धित प्रत्ययों के प्रेमी होते हैं।' चूंकि कात्यायन ने अपने वार्तिकों में तद्धित प्रत्ययों का प्रचुर और सुंदर प्रयोग किया है, इसलिए पतंजलि उन्हें 'दाक्षिणात्य' (दक्षिण भारत का निवासी) मानते हैं। यह तथ्य भारतीय इतिहास में उत्तर और दक्षिण के भाषाई और सांस्कृतिक एकीकरण का एक सुंदर उदाहरण है।
वार्तिककार के रूप में कात्यायन का योगदान
कात्यायन की कीर्ति का मुख्य आधार उनके द्वारा रचित 'वार्तिक' हैं। लेकिन वार्तिक क्या होते हैं? व्याकरण शास्त्र में वार्तिक की परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते।
तं ग्रन्थं वार्तिकं प्राहुर्वार्तिकज्ञा मनीषिणः॥
अर्थ: जहाँ (सूत्रों द्वारा) कही गई (उक्त), न कही गई (अनुक्त) और त्रुटिपूर्ण ढंग से कही गई (दुरुक्त) बातों पर विचार किया जाता है, विद्वान उसे 'वार्तिक' कहते हैं।
वार्तिकों की आवश्यकता क्यों पड़ी?
महर्षि पाणिनि ने 'अष्टाध्यायी' की रचना लगभग 500 ई. पू. में की थी। कात्यायन का समय उनके लगभग 200 वर्ष बाद का है। इस समयांतराल में संस्कृत भाषा में कई परिवर्तन आए। कुछ पुराने शब्द अप्रचलित हो गए और कुछ नए शब्द लोकभाषा में जुड़ गए।
कात्यायन ने पाणिनि के सूत्रों की समीक्षा की और जहाँ सुधार या विस्तार की आवश्यकता थी, वहाँ उन्होंने वार्तिक लिखे।
उन्होंने पाणिनि के लगभग 1500 सूत्रों पर विचार किया।
कुल 4000 से 5000 वार्तिकों की रचना की।
कात्यायन का उद्देश्य पाणिनि का विरोध करना नहीं, बल्कि व्याकरण को समसामयिक और पूर्ण बनाना था।
इसी आधार पर बाद में महर्षि पतंजलि ने 'महाभाष्य' की रचना की, जिसमें उन्होंने पाणिनि के सूत्रों और कात्यायन के वार्तिकों की विस्तृत व्याख्या की।
कात्यायन की प्रमुख रचनाएं
कात्यायन केवल व्याकरण तक सीमित नहीं थे। उनकी मेधा बहुमुखी थी। उनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण निम्नलिखित है:
1. कात्यायन स्मृति
यह एक धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है। इसमें हिंदू धर्म के आचार-विचार, नियमों और कर्तव्यों का वर्णन है। न्याय व्यवस्था और व्यवहार (कानून) के क्षेत्र में 'कात्यायन स्मृति' का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. स्वर्गारोहण काव्य
महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य में 'वाररुचं काव्यम्' कहकर कात्यायन के काव्य कौशल की प्रशंसा की है। 'स्वर्गारोहण' उनका एक प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ माना जाता है, जिसमें उनकी साहित्यिक प्रतिभा के दर्शन होते हैं।
3. उभयसारिका भाण
यह एक प्रकार का नाटक (भाण) है। संस्कृत साहित्य में 'भाण' उसे कहते हैं जहाँ एक ही पात्र पूरी कथा सुनाता है। 'उभयसारिका' अपनी व्यंग्यात्मक शैली और सजीव चित्रण के लिए जानी जाती है।
4. भ्राज श्लोक
महाभाष्य में कुछ विशेष श्लोकों की चर्चा है जिन्हें 'भ्राज' कहा गया है। टीकाकार कैयट और नागेश भट्ट के अनुसार, ये भ्राज संज्ञक श्लोक स्वयं वार्तिककार कात्यायन द्वारा रचित हैं। ये श्लोक व्याकरण के गूढ़ सिद्धांतों को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
5. वेदसर्वानुक्रमणी और प्रातिशाख्य
संभवतः वररुचि कात्यायन ने ही 'शुक्ल यजुर्वेद' से संबंधित 'वाजसनेयि प्रातिशाख्य' की रचना की थी। इसके अतिरिक्त वेदों के सूक्तों और ऋषियों की सूची के रूप में 'वेदसर्वानुक्रमणी' का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
कात्यायन का व्याकरणिक दर्शन: शब्द और अर्थ का संबंध
कात्यायन ने व्याकरण को केवल शब्दों की सिद्धि तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने इसके दार्शनिक पक्ष को भी छुआ। उन्होंने 'सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे' जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर विचार किया।
व्याकरण की महत्ता बताते हुए एक प्राचीन मंत्र स्मरणीय है:
मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
अर्थात, वेदों के छह अंगों (वेदांग) में व्याकरण को 'मुख' माना गया है। कात्यायन ने इस मुख की शुद्धि का कार्य बखूबी निभाया।
पाणिनि और पतंजलि के बीच की कड़ी
कात्यायन को पाणिनि और पतंजलि के मध्य की 'सेतु' या 'श्रृंखला' माना जाता है। यदि कात्यायन ने वार्तिक न लिखे होते, तो पाणिनि के कई सूत्र बदलते समय के साथ कठिन या अप्रासंगिक हो सकते थे। कात्यायन ने भाषा के विकास को पहचाना और उसे नियमों में बांधा।
पतंजलि ने जब महाभाष्य लिखा, तो उन्होंने कात्यायन के प्रति अत्यंत सम्मान व्यक्त किया, भले ही कई स्थानों पर उन्होंने कात्यायन के मत का खंडन भी किया हो। यह भारतीय शास्त्रार्थ परंपरा की सुंदरता है जहाँ गुरु-शिष्य या पूर्ववर्ती-उत्तरवर्ती विद्वान एक-दूसरे के विचारों का विश्लेषण तर्कपूर्ण ढंग से करते हैं।
कात्यायन से जुड़ी पौराणिक कथाएँ
'कथासरित्सागर' के अनुसार, कात्यायन (वररुचि) भगवान शिव के गण 'पुष्पदंत' के अवतार थे। कथा के अनुसार, माता पार्वती को भगवान शिव द्वारा सुनाई गई 'गुणाढ्य की कथा' को पुष्पदंत ने सुन लिया था, जिसके कारण उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप मिला। पृथ्वी पर वे वररुचि के नाम से प्रसिद्ध हुए और उन्होंने अपनी अद्भुत स्मरण शक्ति (श्रुतधर) से शास्त्रों का संरक्षण किया।
निष्कर्ष: कात्यायन की अमर विरासत
महर्षि कात्यायन का व्यक्तित्व एक शोधकर्ता, एक संशोधक और एक सृजक का मिश्रण है। उन्होंने पाणिनीय व्याकरण को जो विस्तार दिया, उसी के कारण आज संस्कृत व्याकरण विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा प्रणाली मानी जाती है।
उनके द्वारा स्थापित मानक आज भी संस्कृत के छात्रों और विद्वानों के लिए मार्गदर्शक हैं। कात्यायन हमें सिखाते हैं कि परंपरा का सम्मान करते हुए भी समय के साथ उसमें आवश्यक सुधार (Update) करना प्रगतिशीलता का लक्षण है।
अंतिम प्रार्थना:
येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः॥
(एवं तदनुगामी वार्तिककाराय कात्यायनाय नमः)
SEO के लिए मुख्य बिंदु (Key Takeaways):
पूरा नाम: वररुचि कात्यायन।
समय: 300 ईसा पूर्व।
मुख्य योगदान: पाणिनीय सूत्रों पर वार्तिकों की रचना।
उपाधि: वार्तिककार।
प्रमुख ग्रंथ: कात्यायन स्मृति, स्वर्गारोहणकाव्य, वाजसनेयि प्रातिशाख्य।
त्रिमूनि में स्थान: पाणिनि और पतंजलि के मध्य की महत्वपूर्ण कड़ी।
आशा है कि यह विस्तृत लेख आपको महर्षि कात्यायन के गौरवशाली इतिहास और उनके योगदान को समझने में सहायक सिद्ध होगा। संस्कृत और भारतीय संस्कृति से जुड़ी ऐसी ही जानकारियों के लिए हमारे ब्लॉग को पढ़ते रहें।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
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- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
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- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।