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भाषा विज्ञान - विश्व की भाषाओं का पारिवारिक वर्गीकरण

भाषा विज्ञान - पारिवारिक वर्गीकरण

विश्व की भाषाओं का पारिवारिक वर्गीकरण: एक गहन और शास्त्रीय विश्लेषण

प्रस्तावना: वाग्देवी की वन्दना

भारतीय परम्परा में वाणी को साक्षात् शक्ति माना गया है। ऋग्वेद में वाग्देवी की स्तुति करते हुए कहा गया है:

"देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।"
(देवताओं ने दिव्य वाणी को उत्पन्न किया, जिसे सभी रूपों वाले प्राणी बोलते हैं।)

संसार में हजारों भाषाएँ बोली जाती हैं। इन भाषाओं के मूल, उनके विकास और उनके पारस्परिक सम्बन्धों को समझना भाषाविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। भाषाविज्ञान में इसे 'पारिवारिक वर्गीकरण' (Genealogical Classification) कहा जाता है। आज के इस विस्तृत लेख में हम विश्व की भाषाओं के वर्गीकरण, उनके विभिन्न भूखण्डों और विशेषकर 'भारोपीय परिवार' की गहराई से चर्चा करेंगे।


1. पारिवारिक वर्गीकरण: अर्थ और विद्वानों के मत

पारिवारिक वर्गीकरण वह पद्धति है जिसमें भाषाओं को उनके मूल स्रोत (Parent Language) के आधार पर समूहों में बाँटा जाता है। इसे 'वंशानुक्रमिक वर्गीकरण' (Genealogical Classification) भी कहते हैं, क्योंकि यह 'वंश' (Genera) पर आधारित होता है। साथ ही, भूगोल और इतिहास पर निर्भर होने के कारण इसे 'ऐतिहासिक वर्गीकरण' (Historical Classification) भी कहा जाता है।

विद्वानों के अनुसार भेदों की संख्या

विश्व की भाषाओं के वर्गीकरण को लेकर अलग-अलग विद्वानों ने अपनी शोध प्रस्तुत की है:

  1. विल्हेल्म वॉन हम्बोल्ट (जर्मनी): इन्होंने भाषाओं के 13 भेद माने हैं।

  2. फ्रीड्रिश म्यूलर: इन्होंने व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए 100 परिवारों की कल्पना की है।

  3. भारतीय विद्वान: सामान्यतः 10 से 18 परिवारों को मान्यता देते हैं।

  4. डॉ. देवेन्द्रनाथ शर्मा: इनके अनुसार मुख्य रूप से 18 परिवार स्वीकार किए गए हैं।


2. विश्व के चार प्रमुख भूखण्ड और 18 भाषा परिवार

संपूर्ण विश्व की भाषाओं को भौगोलिक आधार पर चार प्रमुख भूखण्डों में विभाजित किया गया है। आइए, प्रत्येक का सविस्तार वर्णन करें:

(क) यूरेशिया (यूरोप-एशिया) भूखण्ड

यह विश्व का सबसे महत्वपूर्ण भूखण्ड है, जहाँ सर्वाधिक प्रभाव वाली भाषाएँ जन्मीं।

  1. भारोपीय (भारत-यूरोपीय): इसमें हिन्दी, मराठी, गुजराती जैसी भारतीय भाषाएँ और केन्टुम्-शतम् वर्ग की यूरोपीय भाषाएँ आती हैं।

  2. द्रविड़ परिवार: दक्षिण भारत की प्रमुख भाषाएँ—तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम।

  3. बुरुशस्की: अण्डमानी भाषा समूह।

  4. काकेशी:

    • उत्तरी वर्ग: कबर्डिन, सर्कासियन, चेचिनिश, लेगियन।

    • दक्षिणी वर्ग: लामिश, जर्जियन, मिंग्रेलियन, स्वानियन।

  5. यूराल-अल्ताई:

    • यूराल वर्ग: फिनो-उग्री, समोयद।

    • अल्ताई वर्ग: तुर्की, मंगोली, मंचू।

  6. चीनी परिवार: चीनी, तिब्बती, बर्मी (वर्मा), स्यामी, अनामी।

  7. जापानी-कोरियाई: इसमें जापानी और कोरियाई भाषाएँ सम्मिलित हैं।

  8. अत्युत्तरी (हाइपरबोरी): युकगिर, कमचटका, चुकची, अइनू।

  9. बास्क: यह एक विशिष्ट भाषा है जिसमें आठ बोलियाँ आती हैं।

  10. सामी-हामी:

    • सामी: अक्कदियन, अरमाइक, अरबी, एवीसीनियन, कनानित।

    • हामी: हिब्रू, मिश्री, लीबियन, एथियोपिक।

(ख) अफ्रीका भूखण्ड

  1. सूडानी: बुले, मन-फू, कनूरी, नीलोटिक, बन्तूइड, होसा।

  2. बान्तू:

    • पूर्वी वर्ग: जुलू, काफिर, स्वाहिली।

    • मध्य वर्ग: सेसतो।

    • पश्चिमी वर्ग: हेरेसे, कांगो।

  3. होतेन्तोत-बुशमैनी: बुशमैन (सान), होतेन्तो (नामा), दमारा, सन्दवे।

(ग) प्रशान्त महासागरीय भूखण्ड

  1. मलय पोलिनेशियाई परिवार: मलय, जावी, सुन्दियन, दयक, फ़िजीयन, मिक्रोनेशियन, माओरी (मझौरी), हवाइयन।

  2. पापुई: मफोर।

  3. आस्ट्रेलियन: मेक्वारी, कामिलरोई।

  4. दक्षिण पूर्व एशियाई परिवार: मुण्डकाल, मोन, ख्मेर, अनामी, निकोबार, तगल, टोंगन, समोअन।

(घ) अमेरिका भूखण्ड

  1. अमेरिकी परिवार: इस विशाल परिवार में लगभग 1000 भाषाएँ हैं। मुख्य रूप से मय, कुईचुआ, अथपम्कन, करीब, अखक, तुपी गुअर्नी, अल्गोनकिन, अजतेक, चेरोफी और बास्क (अमेरिकी शाखा) आदि।


3. पारिवारिक वर्गीकरण के मुख्य आधार

किसी भी भाषा को एक परिवार में रखने के लिए भाषाविज्ञानी चार मुख्य आधारों का उपयोग करते हैं:

  1. स्थान-सामीप्य: भौगोलिक निकटता के कारण भाषाओं में समानता आती है।

  2. शब्द-साम्य: शब्दावली और अर्थ की समानता (जैसे संस्कृत में 'पितृ', लैटिन में 'Pater')।

  3. व्याकरण-साम्य: पद रचना और वाक्य संरचना की समानता। यह सबसे सशक्त आधार है।

  4. ध्वनि-साम्य: प्रयुक्त ध्वनियों और उच्चारण के नियमों में समानता।


4. भारोपीय परिवार (Indo-European Family): एक विस्तृत परिचय

भारोपीय परिवार विश्व का सबसे बड़ा और समृद्ध भाषा परिवार है। इसे इण्डो-जर्मनिक, आर्य परिवार या भारत-हित्ती परिवार के नाम से भी जाना जाता है।

भारोपीय परिवार की 10 शाखाएँ

विद्वानों ने एक श्लोक के माध्यम से इसकी दस शाखाओं का वर्णन किया है:

"भारोपीय-परीवारे ईरानी-भारती द्वयी, बाल्टो-स्लाविकी चैव, आर्मीनी ग्रीक केल्टिकी॥
जर्मनिकी च तोखारी, हित्ती अल्बानिकी तथा, इटालिकी च दशमी, शाखाश्चैताः प्रकीर्तिताः"॥

ये शाखाएँ निम्नलिखित हैं:

  1. भारत-ईरानी (आर्य) 2. बाल्टो-स्लाविक 3. आर्मीनी 4. अल्बानी 5. ग्रीक 6. केल्टिक 7. जर्मानिक 8. इटालिक 9. हिटाइट (हित्ती) 10. तोखारी।

रचना की दृष्टि से यह परिवार "श्लिष्टयोगात्मक" (Inflexional) है।


5. केन्टुम् (Centum) और शतम् (Satem) वर्ग

प्रो. अस्कोली ने ध्वनि के आधार पर भारोपीय परिवार को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया है। यह विभाजन मूल 'क्' (k) ध्वनि के उच्चारण पर आधारित है।

भाषाशतम् (Satem) वर्गकेन्टुम् (Centum) वर्ग
संस्कृतशतम्-
अवेस्तासतम्-
फारसी/हिन्दीसौ (सद)-
लैटिन-केन्टुम् (Centum)
ग्रीक-हेक्टोन (Hekaton)
जर्मन-हुन्डर्ट (Hundert)

शतम् वर्ग की शाखाएँ: (श्लोक के अनुसार)

"ईरानी-भारती चैव बाल्टी- सुस्लाविकी तथा। आर्मीनी अल्बनी चैताः, शतम्-वर्गे समाश्रिताः॥"

  1. भारत-ईरानी 2. बाल्टो-स्लाविक 3. आर्मीनी 4. अल्बानी।

केन्टुम् वर्ग की शाखाएँ:

"इटालिकी च ग्रीकी च, जर्मानिक् केल्टिकी तथा। हित्ती तोखारिकी चैताः केन्टुम् - वर्गे प्रकीर्तिताः॥"

  1. ग्रीक 2. केल्टिक 3. जर्मानिक 4. इटालिक 5. हिटाइट 6. तोखारी।


6. भारोपीय परिवार की 10 प्रमुख विशेषताएँ

भारोपीय परिवार की विलक्षणताओं को इस श्लोक में पिरोया गया है:

"भारोपीय-परिवार - वैशिष्टयं दशकं मतम्।
श्लिष्टयोगात्मकत्वं तु प्रकृति-प्रत्ययात्मता॥
एकाक्षरत्वं धातूनां, सुप् तिङौ कृच्च तद्धिता।
स्वातत्र्यमुपसर्गाणां पदमूला च वाक्यता॥
प्रत्ययार्थानभिव्यक्ति: समासाभिरुचिस्तथा।
अपश्रुतेः प्रयोगश्च, प्रत्ययाधिक्यमेव च॥"

प्रमुख विशेषताएँ:

  1. श्लिष्टयोगात्मक प्रकृति। 2. प्रकृति-प्रत्यय का संयोग। 3. धातुओं का एकाक्षरी होना। 4. सुप्-तिङ् और कृत्-तद्धित प्रत्ययों का प्रयोग। 5. उपसर्गों की स्वतन्त्रता। 6. पद-आधारित वाक्य रचना। 7. प्रत्ययों द्वारा अर्थ की अभिव्यक्ति। 8. समास के प्रति रुचि। 9. अपश्रुति (Ablaut) का प्रयोग। 10. प्रत्ययों की अधिकता।


7. शाखाओं का गहन विश्लेषण

1. भारत-ईरानी (Indo-Iranian)

संस्कृत और अवेस्ता (ईरान की प्राचीन भाषा) में इतनी अधिक समानता है कि इन्हें एक ही शाखा माना जाता है। 'ईरान' शब्द स्वयं 'आर्याणाम्' का अपभ्रंश है। जैसे 'ब्राह्मणानाम्' का 'बंभनान' हो गया, वैसे ही 'आर्याणाम्' से 'ईरान' बना।

2. बाल्टो-स्लाविक (Balto-Slavic)

इसे 'लेट्टो-स्लाविक' भी कहते हैं। इसकी दो उपशाखाएँ हैं:

  • बाल्टिक: लिथुआनियन, लेट्टिक।

  • स्लाविक: इसमें रूसी (महारूसी, श्वेतरूसी), पोलिश, चेक और बल्गेरी भाषाएँ आती हैं।

3. आर्मीनी और अल्बानी

  • आर्मीनी: इसके दो रूप हैं— स्तम्बूल (यूरोप) और अरारट (एशिया)।

  • अल्बानी: यह प्राचीन 'इलीरी' भाषा का आधुनिक रूप है।

4. ग्रीक (Hellenic)

प्राचीन ग्रीक में 'एट्टिक' और 'डोरिक' बोलियाँ मुख्य थीं। विश्व प्रसिद्ध महाकवि होमर के महाकाव्य 'इलियड' और 'ओडिसी' इसी भाषा की अमूल्य निधि हैं। जनभाषा को यहाँ 'कोइने' कहा जाता था।

5. केल्टिक (Celtic)

इसके दो मुख्य वर्ग हैं:

  • क-वर्ग (Goidelic): जैसे आयरिश।

  • प-वर्ग (Brythonic): जैसे वेल्श और ब्रिटन।
    (उदाहरण: भारोपीय 'पेंक्व' के लिए वेल्श में 'पम्प' और आयरिश में 'कोइक' शब्द है)।

6. जर्मानिक (Teutonic)

यह सबसे विस्तृत क्षेत्र में फैली शाखा है।

  • क्षेत्रीय विभाजन:

    • पूर्वी: गाथिक।

    • पश्चिमी: अंग्रेजी, जर्मन, डच।

    • उत्तरी: नार्वेजियन, स्वीडिश, डेनिश।

7. इटालिक (Romance)

इसकी जननी 'लैटिन' है। इसी से फ्रेंच, इटालियन, स्पेनिश, पुर्तगाली और रुमानियन भाषाओं का विकास हुआ।

8. हिटाइट/हित्ती (Hittite)

प्रो. स्टुर्टवेंट ने इसे भारोपीय परिवार की 'पुत्री' न मानकर 'बहन' माना है। इसमें स्त्रीलिंग नहीं होता (केवल पुल्लिंग और नपुंसक लिंग)। इसमें 6 कारक होते हैं (सप्तमी/अधिकरण नहीं होता)।
तुलना:

  • हित्ती: एगो (Ego) | संस्कृत: अहम्

  • हित्ती: क्विसा (Kwisa) | संस्कृत: कश्चिद

9. तोखारी (Tocharian)

महाभारत में 'तोखर' लोगों को 'तुषारा:' कहा गया है। यह केन्टुम् वर्ग की भाषा है (100 के लिए 'कन्ध' शब्द)। इसमें 9 कारक होते हैं और द्विवचन का प्रयोग मिलता है। इसे हूणों के आक्रमण ने नष्ट कर दिया था।


उपसंहार

भाषाओं का यह पारिवारिक वर्गीकरण हमें यह सिखाता है कि भले ही आज हम भौगोलिक सीमाओं में बँधे हों, लेकिन हमारी वाणी के तार एक ही मूल स्रोत से जुड़े हैं। जैसा कि भारतीय दर्शन कहता है:

"एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति"

अर्थात् सत्य एक ही है, विद्वान उसे अलग-अलग प्रकार से कहते हैं। उसी प्रकार, आदि-भाषा एक ही थी, जिसने समय और भूगोल के साथ हजारों रूपों को धारण कर लिया।


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आशा है कि यह विस्तृत लेख भाषाविज्ञान के जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।

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मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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