भाषा विज्ञान का महासागर: ध्वनियों का वर्गीकरण, वाग्यंत्र और वैश्विक ध्वनि नियम
प्रस्तावना
भारतीय संस्कृति में शब्द को 'ब्रह्म' माना गया है। वेदों में कहा गया है— "शब्दब्रह्मेति चोच्यते"। ध्वनि केवल कान से सुनी जाने वाली तरंग नहीं है, बल्कि यह वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों, संवेदनाओं और ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाता है। शिक्षा शास्त्र और भाषा विज्ञान (Linguistics) में ध्वनियों का अध्ययन अत्यंत सूक्ष्मता से किया गया है।
ऋग्वेद के प्रतिशाख्यों से लेकर आधुनिक भाषा वैज्ञानिकों तक, ध्वनियों के उच्चारण और उनके परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास निरंतर जारी है। आज के इस विशेष लेख में हम ध्वनियों के वैदिक, संस्कृत और हिंदी वर्गीकरण, मानवीय वाग्यंत्र की कार्यप्रणाली और विश्वप्रसिद्ध ध्वनि नियमों (ग्रिम, ग्रासमान, वर्नर आदि) पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
1. ध्वनियों का वर्गीकरण (Classification of Sounds)
ध्वनि विज्ञान में वर्णों को उनकी प्रकृति और उच्चारण के आधार पर विभाजित किया गया है। यहाँ हम तीन मुख्य श्रेणियों का अध्ययन करेंगे:
(क) वैदिक ध्वनियाँ (Vedic Sounds)
वेदों की भाषा अत्यंत समृद्ध है। इसमें कुल 52 ध्वनियाँ मानी गई हैं। इनमें मूलाक्षर (11) मुख्य हैं:
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ॠ, ऋ, ऌ, ए, ओ
वैदिक काल में उच्चारण की शुद्धता पर अत्यधिक बल दिया जाता था। इसके लिए कहा गया है:
"मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।"
(अर्थात्: यदि मंत्र में स्वर या वर्ण की कमी हो, तो वह अपना अर्थ खो देता है।)
(ख) संस्कृत ध्वनियाँ (Sanskrit Sounds)
संस्कृत में मुख्य रूप से 48 ध्वनियाँ मानी गई हैं। इसमें संयुक्त स्वरों और अंतःस्थ व्यंजनों का विशेष महत्व है:
संयुक्त स्वर (2): ऐ, औ
अन्तःस्थ: य, र, ल, व
ऊष्म व्यंजन: श, ष, स, ह (इनमें 'ह' घोष ऊष्म है, जबकि 'श, ष, स' अघोष संघर्षी हैं)
अनुनासिक और विसर्ग: अनुस्वार और विसर्ग (ः) को शुद्ध अनुनासिक ध्वनियों की श्रेणी में रखा जाता है।
(ग) हिन्दी ध्वनियाँ (Hindi Sounds)
हिन्दी में ध्वनियों की संख्या 54 तक पहुँच जाती है। आधुनिक भाषा विज्ञान के अनुसार इनका वर्गीकरण जीभ की स्थिति और मुख द्वार के खुलने के आधार पर किया जाता है:
संवृत स्वर: ई, ऊ (जिनमें मुख बहुत कम खुलता है)
अर्धसंवृत: ए (ऍ), ओ (अॅ)
विवृत: आ, ऑ (जिनमें मुख पूरा खुलता है)
अर्धविवृत: अ
वर्त्स्य ध्वनियाँ: न, न्ह, ल, ल्ह, र
शिथिल स्वर: अ, इ, उ
दृढ़ स्वर: आ, ई, ऊ
जिह्वा की स्थिति के आधार पर:
अग्र स्वर: इ, ई, ए
मध्य स्वर: अ
पश्च स्वर: उ, ऊ, आ
आकृति के आधार पर: वर्तुल स्वर (अ, ओ, औ)
2. प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण
जब हम किसी वर्ण का उच्चारण करते हैं, तो हमारे मुख के अंगों को कुछ 'प्रयत्न' (Effort) करना पड़ता है। पाणिनि ने कहा है— "तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्"।
1. स्पर्श (Plosives)
इन ध्वनियों के उच्चारण में वाग्यन्त्र के दो अवयव (जैसे जीभ और तालु) एक-दूसरे को पूरी तरह स्पर्श करते हैं।
भेद: इनके दो भेद होते हैं— अभिनिधान (अपूर्ण) और अभिनिहित (पूर्ण)।
वर्ग:
कवर्ग: क, ख, ग, घ
टवर्ग: ट, ठ, ड, ढ
तवर्ग: त, थ, द, ध
पवर्ग: प, फ, ब, भ
2. स्पर्श-संघर्षी (Affricates)
इनका उच्चारण स्पर्श से शुरू होता है, लेकिन इनका विमोचन झटके से न होकर धीरे-धीरे रगड़ (संघर्ष) के साथ होता है।
उदाहरण: चवर्ग (च, छ, ज, झ)
3. संघर्षी (Fricatives)
इनमें वायु न तो पूरी तरह रुकती है और न ही बिना बाधा के बाहर निकलती है, बल्कि एक संकरी जगह से रगड़ खाकर निकलती है।
उदाहरण: ह, विसर्ग (ः), ख, ग, स, ष, श, ज, फ, व।
4. अन्य प्रमुख ध्वनियाँ:
अनुनासिक: ड, ञ, ण, न, म (पंचमाक्षर)।
पार्श्विक: ल (ल्ह)।
लुठित: र (र्ह)।
उत्क्षिप्त: ड़, ढ़।
अर्धस्वर: य, व (इनका उच्चारण स्वरों और व्यंजनों के बीच का होता है)।
3. मानवीय वाग्यन्त्र (The Human Vocal Apparatus)
ध्वनि विज्ञान की शिक्षा के लिए मानवीय वाग्यंत्र का ज्ञान अनिवार्य है। वाग्यंत्र की तुलना एक संगीत वाद्ययंत्र 'वीणा' या 'बाँसुरी' से की जा सकती है।
"आत्मा बुद्ध्या समर्थ्यार्थान् मनो युङ्क्ते विवक्षया।
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्॥"
(पाणिनीय शिक्षा)
कार्यप्रणाली:
फेफड़े: यहाँ से वायु (निःश्वास) बाहर आती है।
स्वरतंत्रियाँ: वायु यहाँ कंपन पैदा करती है जिससे 'घोष' या 'अघोष' ध्वनियाँ बनती हैं।
मुख विवर: कोमल तालु, कठोर तालु, दन्त और ओष्ठ वायु के मार्ग को नियंत्रित करते हैं।
जैसे बाँसुरी में अलग-अलग छेदों को दबाकर संगीत निकलता है, वैसे ही वाग्यंत्र के अंगों द्वारा वायु को रोककर या रगड़कर 'स रे ग म' और विभिन्न भाषा-ध्वनियाँ उत्पन्न की जाती हैं।
4. ध्वनि परिवर्तन: कारण और स्वरूप (Sound Change)
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। ऋषियों ने कहा है— "यत् किं च जगत्यां जगत्" (यजुर्वेद 40.1), अर्थात् संसार की हर वस्तु गतिशील और परिवर्तनशील है। पतंजलि ने महाभाष्य में लिखा है:
"एकैकस्य हि शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः"
(एक ही शब्द के कई अपभ्रंश रूप हो जाते हैं, जैसे: मनुष्य > मानुष > मानस > मनुस)
ध्वनि परिवर्तन के प्रमुख कारण:
ध्वनि परिवर्तन को दो मुख्य भागों में बांटा गया है:
(क) आभ्यन्तर कारण (Internal Causes):
प्रयत्नलाघव (Economy of Effort): मनुष्य स्वभाव से आलसी होता है, वह कम मेहनत में अधिक बोलना चाहता है। इसे 'मुखसुख' भी कहते हैं। यह सबसे प्रमुख कारण है।
लघुकरण: शब्दों को छोटा करना।
अज्ञान और अशिक्षा: शुद्ध उच्चारण का ज्ञान न होना।
शीघ्र भाषण: जल्दी बोलने में वर्णों का लोप हो जाना।
भावावेश: अत्यधिक क्रोध या प्रेम में शब्दों का स्वरूप बदल जाना।
साहचर्य और सादृश्य: दूसरे शब्दों के प्रभाव में आकर रूप बदलना।
(ख) बाह्य कारण (External Causes):
भौगोलिक प्रभाव: जलवायु का प्रभाव (पहाड़ी लोगों और मैदानी लोगों की ध्वनियों में अंतर)।
सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ: युद्ध, प्रवास और शासन का प्रभाव।
लिपि दोष: लिखने की गलतियों के कारण उच्चारण बदल जाना।
अन्य भाषाओं का प्रभाव: विदेशी शब्दों का अपनी भाषा में समाहित होना।
5. वैश्विक ध्वनि नियम (Major Phonetic Laws)
भाषा विज्ञान के क्षेत्र में ध्वनियों के क्रमिक विकास को समझने के लिए कुछ विशिष्ट नियम प्रतिपादित किए गए हैं। ये नियम मुख्य रूप से भारोपीय भाषा परिवार (Indo-European) से संबंधित हैं।
1. ग्रिम का नियम (Grimm’s Law)
यह नियम प्रो० याकोब ग्रिम (Jacob Grimm) के नाम पर है। इन्होंने 1822 में इसका विस्तृत वर्णन किया। इसे 'प्रथम वर्ण परिवर्तन' और 'द्वितीय वर्ण परिवर्तन' के रूप में जाना जाता है।
परिवर्तन का सूत्र (त्रिकोण):
1 को 2: अघोष अल्पप्राण (क, त, प) का अघोष महाप्राण (ह/ख, थ, फ) में बदलना।
4 को 3: घोष महाप्राण (घ, ध, भ) का घोष अल्पप्राण (ग, द, ब) में बदलना।
3 को 1: घोष अल्पप्राण (ग, द, ब) का अघोष अल्पप्राण (क, त, प) में बदलना।
उदाहरण के लिए, संस्कृत के 'भ' (4) और 'ध' (4) अंग्रेजी और लैटिन में 'ब' (3) और 'द' (3) बन जाते हैं।
2. ग्रासमान का नियम (Grassmann’s Law)
हेर्मान ग्रासमान ने ग्रिम के नियम की त्रुटियों को सुधारा। उन्होंने पाया कि यदि किसी धातु में दो महाप्राण ध्वनियाँ (Aspirated sounds) हों, तो पहली ध्वनि अपनी 'ह' की गूँज खो देती है।
उदाहरण: संस्कृत में 'धधामि' न होकर 'दधामि' (प्रथम ध् > द) होता है।
बुध > भुत: यहाँ द्वितीय वर्ण से ऊष्म ध्वनि हटने पर वह प्रथम वर्ण में लौट आती है।
3. वर्नर का नियम (Verner’s Law)
कार्ल वर्नर ने बताया कि ध्वनि परिवर्तन केवल वर्णों पर नहीं, बल्कि उदात्त स्वर (Accent) पर निर्भर करता है।
यदि 'क, त, प' से पहले उदात्त स्वर है, तो वे ग्रिम के नियमानुसार बदलेंगे।
यदि उदात्त स्वर 'क, त, प' के बाद है, तो वे 'ग, द, ब' में बदल जाएंगे।
उदाहरण: संस्कृत 'सप्तन्' (Saptan) में उदात्त 'प' के बाद है, इसलिए अंग्रेजी में यह 'Seven' (व) बना।
4. तालव्य नियम (Palatal Law)
यह नियम विल्हेम थामसन द्वारा दिया गया। इसके अनुसार, मूल भारोपीय भाषा की कण्ठ्य ध्वनियाँ (क, ग) यदि किसी तालव्य स्वर (इ, ई, ए) के संपर्क में आती हैं, तो वे तालव्य ध्वनियों (च, ज) में बदल जाती हैं।
उदाहरण: भारोपीय 'e' और 'o' संस्कृत में प्रायः 'अ' बन जाते हैं (जैसे: लैटिन Ego > संस्कृत अहम्)।
5. मूर्धन्य नियम (Cerebral Law)
यह नियम संस्कृत के 'णत्व विधान' से मिलता-जुलता है। पाणिनि के अनुसार 'र्' और 'ष्' के बाद 'न्' को 'ण्' हो जाता है।
उदाहरण: विष् + नु = विष्णु, राम + इन = रामेण।
यदि मूल भाषा में 'ऋ' का लोप होता है, तो उसके बाद आने वाला 'तवर्ग' (त, थ, द, ध) 'टवर्ग' (ट, ठ, ड, ढ) में बदल जाता है। जैसे: कृत > कट, पृथति > पठति।
निष्कर्ष
ध्वनि विज्ञान केवल अक्षरों का खेल नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के विकास की कहानी है। जिस प्रकार वैदिक ऋषियों ने ध्वनियों की पवित्रता को संरक्षित किया, उसी प्रकार आधुनिक भाषा वैज्ञानिकों ने वैश्विक स्तर पर भाषाओं के संबंधों को उजागर किया। चाहे वह ग्रिम का नियम हो या पाणिनीय शिक्षा, सभी इस सत्य की पुष्टि करते हैं कि शब्द अनश्वर हैं, वे केवल अपना रूप बदलते हैं।
"वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥"
(अर्थात्: शब्द और अर्थ पार्वती और शिव की तरह अविभाज्य हैं। उन्हें समझने के लिए हम आदि माता-पिता की वंदना करते हैं।)
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यह लेख भाषा विज्ञान के छात्रों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं के लिए एक व्यापक संदर्भ ग्रंथ की तरह है। आशा है कि यह आपके ज्ञानार्जन में सहायक सिद्ध होगा।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।