भारतीय आर्यभाषाओं का विकास, अर्थ-विज्ञान और वाक्य संरचना: एक विस्तृत विवेचन
प्रस्तावना
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत इकाई है जो समय के साथ विकसित होती है, बदलती है और परिष्कृत होती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भाषाओं का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। भारतीय आर्यभाषाओं की यात्रा ऋग्वेद की ऋचाओं से शुरू होकर आज की आधुनिक बोलियों तक फैली हुई है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम भारतीय आर्यभाषाओं के कालक्रम, अर्थ-परिवर्तन के सिद्धांतों, वाक्य के लक्षणों, भारोपीय भाषा परिवार और भाषा के सूक्ष्म भेदों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
संस्कृत में कहा गया है:
"न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।"
(अर्थात्, इस संसार में ज्ञान के समान कुछ भी पवित्र नहीं है।) और भाषा इसी ज्ञान की संवाहिका है।
1. भारतीय आर्यभाषाओं का कालक्रमिक वर्गीकरण
भारतीय आर्यभाषाओं के इतिहास को तीन प्रमुख कालखंडों में विभाजित किया गया है। यह विभाजन भाषाई संरचना और ध्वन्यात्मक परिवर्तनों पर आधारित है।
(क) प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएं (2500 ई.पू. से 500 ई.पू.)
इस काल में भाषा का स्वरूप अत्यंत सुव्यवस्थित और शास्त्रीय था। इसे दो भागों में बाँटा गया है:
वैदिक संस्कृत: यह वेदों, उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों की भाषा है। इसकी संरचना अत्यंत जटिल और स्वरों के आरोह-अवरोह (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) पर आधारित थी।
लौकिक संस्कृत: पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' के बाद संस्कृत का जो रूप स्थिर हुआ, उसे लौकिक संस्कृत कहा जाता है। रामायण और महाभारत इसी काल की कृतियाँ हैं।
(ख) मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाएं (500 ई.पू. से 1000 ईस्वी)
इस काल में भाषा जनसाधारण के करीब आई और व्याकरणिक जटिलताएँ कम होने लगीं।
प्राचीन प्राकृत या पालि: इसे प्रथम प्राकृत भी कहा जाता है। भगवान बुद्ध के उपदेश इसी भाषा में हैं।
मध्यकालीन प्राकृत: इसमें क्षेत्रीय विविधताओं के आधार पर कई भेद हुए:
शौरसेनी: मथुरा और आसपास के क्षेत्र की भाषा।
महाराष्ट्री: दक्षिण भारत (वर्तमान महाराष्ट्र) के क्षेत्र में।
मागधी: मगध (बिहार) के क्षेत्र में।
अर्धमागधी: जैन धर्म के ग्रंथों की प्रमुख भाषा।
पैशाची: उत्तर-पश्चिम क्षेत्र की भाषा।
परकालीन प्राकृत या अपभ्रंश: यह प्राकृत और आधुनिक भाषाओं के बीच की कड़ी है।
(ग) आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएं (1000 ईस्वी से अब तक)
अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक भाषाओं का जन्म हुआ। जैसे:
शौरसेनी अपभ्रंश से हिंदी, राजस्थानी, गुजराती।
मागधी अपभ्रंश से बंगाली, बिहारी, उड़िया, असमिया।
पैशाची/ब्राचड से लहंदा, सिंधी, पंजाबी।
2. अर्थ-विज्ञान: अर्थ परिवर्तन की दिशाएं एवं कारण
संसार का नियम है परिवर्तन। जिस प्रकार मनुष्य का शरीर और समाज बदलता है, उसी प्रकार शब्दों के अर्थ भी बदल जाते हैं। इसे 'अर्थविकास' कहा जाता है।
"शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्" - भामह के अनुसार शब्द और अर्थ का मेल ही काव्य है, लेकिन यह मेल स्थिर नहीं रहता।
अर्थ-परिवर्तन के तीन मुख्य प्रकार (बिल के अनुसार):
1. अर्थविस्तार (Expansion of Meaning)
जब कोई शब्द पहले किसी सीमित वस्तु के लिए प्रयुक्त होता था, लेकिन बाद में उसका प्रयोग व्यापक क्षेत्र में होने लगे।
कुशल: पहले इसका अर्थ था "कुश लाने वाला"। चूंकि कुश लाना कठिन कार्य था, अतः धीरे-धीरे चतुर व्यक्ति को 'कुशल' कहा जाने लगा।
तैल: पहले केवल 'तिल' के रस को तैल कहते थे, अब सरसों, मूँगफली या मिट्टी के तेल को भी तैल (तेल) कहते हैं।
प्रवीण: जो वीणा बजाने में निपुण हो, अब किसी भी कार्य में दक्ष व्यक्ति प्रवीण है।
गवेषणा: पहले इसका अर्थ "गायों की खोज" था, अब इसका अर्थ "शोध" (Research) है।
2. अर्थसंकोच (Contraction of Meaning)
जब कोई शब्द पहले व्यापक अर्थ रखता था, पर अब किसी विशेष अर्थ में रूढ़ हो गया है।
मृग: पहले सभी जंगली पशुओं (शेर, हाथी आदि) को मृग कहते थे। अब यह केवल 'हिरण' के लिए प्रयुक्त होता है।
पंकज: कीचड़ में उत्पन्न होने वाली हर वस्तु पंकज है, पर अब यह केवल 'कमल' के लिए रूढ़ है।
मन्दिर: पहले किसी भी घर या स्थान को मंदिर कहते थे, अब यह केवल 'देवस्थान' है।
3. अर्थादेश (Transference of Meaning)
जब शब्द का पुराना अर्थ पूरी तरह लुप्त हो जाए और वह बिल्कुल नए अर्थ में प्रयुक्त होने लगे।
असुर: प्राचीन काल में (वेदों में) यह 'देवता' या 'शक्तिशाली' के लिए था, अब यह 'राक्षस' के लिए है।
मौन: मुनि की अवस्था, अब 'चुप रहने' को मौन कहते हैं।
आकाशवाणी: पहले 'देववाणी' को कहते थे, अब 'रेडियो' के लिए प्रयुक्त होता है।
अर्थोत्कर्ष और अर्थापकर्ष
अर्थोत्कर्ष (Elevation): जब शब्द का अर्थ निम्न से उच्च हो जाए (जैसे: 'मुग्ध' का अर्थ पहले 'मूर्ख' था, अब 'मोहित' है)।
अर्थापकर्ष (Deterioration): जब शब्द का अर्थ उच्च से निम्न हो जाए (जैसे: 'पाषण्ड' पहले एक धार्मिक संप्रदाय था, अब 'ढोंग' है)।
3. वाक्य विज्ञान: लक्षण एवं भेद
वाक्य भाषा की वह इकाई है जो पूर्ण विचार व्यक्त करती है।
महर्षि पतंजलि के अनुसार वाक्य के लक्षण:
पतंजलि ने महाभाष्य में वाक्य को परिभाषित करते हुए 5 मुख्य लक्षण बताए हैं:
एक क्रिया-पद वाक्य है: जैसे "पठति" (वह पढ़ता है)।
विशेषण युक्त क्रिया-पद: जैसे "उच्चैः पठति"।
अव्यय और कारक युक्त क्रिया-पद।
क्रिया-रहित संज्ञा-पद भी वाक्य हो सकता है: जैसे "तर्पणम्" (यहाँ 'करो' छिपा है)।
आचार्य विश्वनाथ की परिभाषा:
"वाक्यं स्याद्योग्यताकाङ्क्षासत्तियुक्तः पदोच्चयः।"
अर्थात् आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति (निकटता) से युक्त पदों का समूह ही वाक्य है।
आचार्य भर्तृहरि का मत (वाक्यपदीय):
भर्तृहरि ने वाक्य को 'स्फोट' माना है। उनके अनुसार वाक्य एक अखण्ड इकाई है। उन्होंने वाक्य के कई दृष्टिकोण दिए हैं, जिसमें 'साकांक्ष पद समूह' और 'बुद्धिगत समन्वय' प्रमुख हैं।
वाक्यों के प्रकार:
आकृति मूलक: भाषा की बनावट के आधार पर।
रचना मूलक: सरल, संयुक्त और मिश्रित वाक्य।
अर्थ-मूलक: विधिवाचक, निषेधवाचक, आज्ञावाचक आदि।
क्रिया-मूलक: सकर्मक, अकर्मक।
शैली मूलक: लेखन की विशिष्ट शैली के आधार पर।
4. भारोपीय भाषा परिवार (Indo-European Family)
यह विश्व का सबसे बड़ा और प्रभावशाली भाषा परिवार है।
प्रमुख भाषाएँ: संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, ग्रीक, लैटिन, रूसी, जर्मन।
भारत में स्थिति: भारत की 73% जनसंख्या भारोपीय परिवार की भाषाएँ बोलती है। इसके बाद द्रविड़ (25%), आस्ट्रिक (1.3%) और चीनी-तिब्बती (0.7%) का स्थान है।
जनजातीय संदर्भ:
भारत के आदिवासी क्षेत्रों में भी भारोपीय भाषाएँ बोली जाती हैं। 'भीली' इस परिवार की सबसे अधिक बोली जाने वाली आदिवासी भाषा है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ी, हल्वा, और असमिया का प्रयोग भी विभिन्न जनजातियों द्वारा किया जाता है।
विशेषताएँ:
यह विश्व के सर्वाधिक भू-भाग पर विस्तृत है।
इसका साहित्य अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है।
पाणिनी और भर्तृहरि जैसे महान वैयाकरणों ने इसी परिवार की भाषा (संस्कृत) पर कार्य किया।
5. वैदिक संस्कृत बनाम लौकिक संस्कृत
दोनों में मूलभूत अंतर हैं:
वैदिक संस्कृत: यह अधिक लचीली थी। इसमें 'लेट्' लकार का प्रयोग होता था जो बाद में लुप्त हो गया। इसमें 'ऋ' और 'ऌ' के दीर्घ रूप मिलते थे। वेदों में एक शब्द के अनेक अर्थ होते थे (जैसे 'गौ' के लिए किरण, पृथ्वी आदि)।
लौकिक संस्कृत: पाणिनि के नियमों में बंधी होने के कारण यह अधिक स्थिर है। रामायण और महाभारत इसी में लिखे गए हैं। इसमें शब्द अर्थ में अधिक निश्चितता आ गई।
6. भाषा और वाक् (Language vs. Speech)
भाषा विज्ञान में इन दोनों के बीच सूक्ष्म अंतर है:
भाषा (Language): यह एक सूक्ष्म, स्थायी और मानसिक संरचना है। यह 'साध्य' है। यह ज्ञान की समष्टि है।
वाक् (Speech): यह भाषा की भौतिक अभिव्यक्ति है। यह नश्वर और अस्थायी है। इसे 'नाद' कहा जा सकता है, जबकि भाषा 'स्फोट' है।
7. भाषा और बोली (Language vs. Dialect)
"कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।"
भाषा: जिसका अपना व्याकरण हो, विस्तृत साहित्य हो और जो शिक्षा/शासन का माध्यम हो। इसकी लिपि होती है (जैसे हिंदी की देवनागरी)।
बोली: यह एक सीमित क्षेत्र में बोली जाती है। इसका व्याकरण मानकीकृत नहीं होता। प्रायः बोलियाँ ही विकसित होकर भाषा बनती हैं (जैसे खड़ी बोली से आधुनिक हिंदी बनी)।
8. भाषा विज्ञान के महत्वपूर्ण तथ्य
अर्थपरिवर्तन का मुख्य कारण: सादृश्यता।
ध्वनि वर्गीकरण के आधार: स्थान, प्रयत्न और करण।
सिन्धी भाषा का विकास: पैशाची प्राकृत से हुआ।
अवेस्ता और संस्कृत का संबंध: संस्कृत का 'अश्व' अवेस्ता में 'अस्प' हो जाता है, और 'भस्म' 'बरहि' बन जाता है।
मानस्वर चतुर्भुज: प्रो. डेनियल जोन्स द्वारा कल्पित।
निष्कर्ष
भारतीय आर्यभाषाओं का इतिहास मानवीय चेतना के विकास का इतिहास है। संस्कृत से शुरू होकर अपभ्रंश और फिर आधुनिक बोलियों तक की यह यात्रा सिद्ध करती है कि भाषा कभी स्थिर नहीं रहती, वह सदैव प्रवाहमान रहती है। भाषा विज्ञान का अध्ययन हमें अपनी जड़ों को समझने और वैश्विक संचार के तंत्र को पहचानने में मदद करता है।
"वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥"
(शब्द और अर्थ की भाँति मिले हुए, जगत के माता-पिता पार्वती और शिव को मैं शब्द और अर्थ के ज्ञान के लिए प्रणाम करता हूँ।)
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।