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कारक प्रकरण और प्रथमा विभक्ति की गहन मीमांसा

कारक प्रथमा विभक्ति

संस्कृत व्याकरण की आत्मा: कारक प्रकरण और प्रथमा विभक्ति की गहन मीमांसा

प्रस्तावना: व्याकरण का महत्त्व

संस्कृत वाङ्मय में व्याकरण को 'वेदांग' माना गया है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष—इन छह अंगों में व्याकरण को "मुख" की संज्ञा दी गई है। जैसा कि कहा गया है:

मुखं व्याकरणं स्मृतम्।

अर्थात, व्याकरण वेद पुरुष का मुख है। किसी भी भाषा की शुद्धता और उसके अर्थ की स्पष्टता उसके व्याकरण पर निर्भर करती है। महर्षि पाणिनि ने अपनी 'अष्टाध्यायी' के माध्यम से भाषा को जो अनुशासन दिया, वह अद्वितीय है। व्याकरण शास्त्र में 'कारक' (Karaka) वह धुरी है, जिस पर संपूर्ण वाक्य संरचना टिकी होती है। आज के इस विशेष लेख में हम अष्टाध्यायी के द्वितीय अध्याय के तृतीय पाद में वर्णित "प्रथमा विभक्ति" के सूत्रों की ऐसी व्याख्या करेंगे जो आपने पहले कभी नहीं पढ़ी होगी।


कारक का स्वरूप और परिभाषा

इससे पहले कि हम प्रथमा विभक्ति के सूत्रों में प्रवेश करें, यह समझना आवश्यक है कि 'कारक' क्या है?

"क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्।"
अर्थात्, जिसका क्रिया के साथ सीधा अन्वय (संबंध) होता है, उसे 'कारक' कहते हैं। संस्कृत में छह कारक माने गए हैं: कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान और अधिकरण। यद्यपि सम्बन्ध और संबोधन को साक्षात् कारक नहीं माना जाता (क्योंकि उनका क्रिया से सीधा संबंध नहीं होता), फिर भी व्याकरण की प्रक्रिया में उनका विशेष महत्त्व है।


१. प्रथमा विभक्ति का मुख्य सूत्र: प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा

पाणिनि सूत्र संख्या: २/३/४६

सूत्र का विन्यास:

सूत्र: प्रातिपदिकार्थ-लिङ्ग-परिमाण-वचन-मात्रे प्रथमा।

वृत्ति (संस्कृत): नियतौपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः। मात्रशब्दस्य प्रत्येकं योगः। प्रातिपदिकार्थमात्रे लिङ्गमात्राधिक्ये परिमाणमात्रे सङ्ख्यामात्रे च प्रथमा स्यात्।

सूत्र का हिंदी भावार्थ:

यह सूत्र स्पष्ट करता है कि किन-किन स्थितियों में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग अनिवार्य है। इस सूत्र में 'मात्र' शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसका अन्वय प्रत्येक पद के साथ होता है। इसके अनुसार, निम्नलिखित चार अर्थों की प्रतीति होने पर प्रथमा विभक्ति होती है:

  1. प्रातिपदिकार्थ मात्र में (In the sense of the nominal stem itself)

  2. लिंग मात्र की अधिकता में (In the sense of gender alone)

  3. परिमाण मात्र में (In the sense of measure)

  4. वचन (संख्या) मात्र में (In the sense of number)

आइए, अब प्रत्येक पद की विस्तृत व्याख्या उदाहरणों के साथ करते हैं।


(क) प्रातिपदिकार्थमात्रे (Meaning of the Nominal Stem)

प्रातिपदिक क्या है? पाणिनि के अनुसार "अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्" (१/२/४५)। वह शब्द जिसका एक निश्चित अर्थ हो, जो न धातु हो और न प्रत्यय, वह प्रातिपदिक है।

वृत्ति के अनुसार: "नियतौपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः।"
जिस शब्द का उच्चारण करने पर जिस अर्थ की नियम से (निश्चित रूप से) उपस्थिति या प्रतीति होती है, उसे 'प्रातिपदिकार्थ' कहते हैं।

इसे दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

१. अलिङ्गाः (लिंग रहित या अव्यय)

वे शब्द जिनका कोई निश्चित लिंग नहीं होता अर्थात् जो अव्यय होते हैं। जब हम इन शब्दों का उच्चारण करते हैं, तो केवल उनके अर्थ की प्रतीति होती है, लिंग की नहीं।

  • उदाहरण:

    • उच्चैः (ऊँचा)

    • नीचैः (नीचा)

    • अव्यय शब्द: यथा, तथा, अपि, च।

२. नियतलिङ्गाः (निश्चित लिंग वाले)

वे शब्द जिनका लिंग व्याकरण के नियमों के अनुसार सदैव स्थिर रहता है। इन शब्दों के उच्चारण से अर्थ के साथ-साथ लिंग की भी निश्चित प्रतीति होती है।

  • उदाहरण:

    • कृष्णः (पुल्लिंग - भगवान श्रीकृष्ण का वाचक)

    • श्रीः (स्त्रीलिंग - लक्ष्मी या शोभा)

    • ज्ञानम् (नपुंसक लिंग - बोध या जानकारी)

इन सभी उदाहरणों में केवल 'प्रातिपदिक के अर्थ' को प्रकट करने के लिए प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया गया है। यहाँ सु, औ, जस् प्रत्ययों का विधान केवल पदत्व की सिद्धि के लिए होता है।


(ख) लिङ्गमात्राधिक्ये (Gender in Excess)

कुछ शब्द 'अनियतलिंग' होते हैं, अर्थात् उनके अर्थ के साथ-साथ लिंग निश्चित नहीं होता। एक ही शब्द भिन्न-भिन्न लिंगों में प्रयुक्त हो सकता है। ऐसे शब्दों में जब लिंग का बोध कराना हो, तब भी प्रथमा विभक्ति होती है।

  • उदाहरण: तटः, तटी, तटम् (किनारा)
    यहाँ 'तट' शब्द पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग—तीनों में आता है। जब हमें केवल यह बताना हो कि 'तट' का लिंग क्या है, तब हम प्रथमा का प्रयोग करते हैं। यहाँ प्रातिपदिकार्थ तो है ही, साथ ही 'लिंग' की अधिकता (extra information) भी है।


(ग) परिमाणमात्रे (Measurement)

जब किसी शब्द से केवल माप या तौल (Quantity) का बोध कराना हो, तब उस मापवाची शब्द में प्रथमा विभक्ति होती है।

  • मुख्य उदाहरण: द्रोणो व्रीहिः (द्रोण भर धान)

व्याख्या: यहाँ 'द्रोण' प्राचीन काल का एक पात्र (मापने का बर्तन) है। व्रीहि का अर्थ है 'धान'।

  • अर्थ: द्रोण रूपी परिमाण से मापा हुआ धान।

  • तर्क: यहाँ 'द्रोण' प्रातिपदिक है। जब हम द्रोण के साथ प्रथमा (सु प्रत्यय) लगाते हैं, तो वह 'परिमाण' (माप) को दर्शाता है।

शास्त्रीय विवेचन: "द्रोणरूपं यत्परिमाणं तत्परिच्छिन्नो व्रीहिरित्यर्थः।"
यहाँ प्रत्ययार्थ (विभक्ति का अर्थ) जो 'परिमाण' है, उसमें प्रकृत्यर्थ (द्रोण) अभेद संबंध से विशेषण है। धान (व्रीहि) और परिमाण के बीच 'परिच्छेद्य-परिच्छेदक' भाव संबंध है। सरल शब्दों में, धान वह वस्तु है जिसे मापा जा रहा है (परिच्छेद्य) और द्रोण वह पैमाना है जिससे मापा जा रहा है (परिच्छेदक)।


(घ) वचनमात्रे (Number Only)

'वचन' का अर्थ यहाँ 'संख्या' (Number) है। यद्यपि सु-औ-जस् आदि प्रत्यय स्वयं संख्या (एकत्व, द्वित्व, बहुत्व) का बोध कराते हैं, फिर भी पाणिनि ने सूत्र में 'वचन' शब्द का उल्लेख किया है ताकि जहाँ केवल संख्या बतानी हो, वहाँ प्रथमा हो सके।

  • उदाहरण:

    • एकः (One)

    • द्वौ (Two)

    • बहवः (Many)

यहाँ संख्या ही प्रातिपदिक का अर्थ है, अतः संख्या का ज्ञान कराने के लिए प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसा कि कहा गया है: "इहोक्तार्थत्वाद् विभक्तेरप्राप्तौ वचनम्।" यदि वचन का उल्लेख न होता, तो यहाँ प्रथमा की प्राप्ति कठिन होती।


२. संबोधन में प्रथमा: संबोधने च

पाणिनि सूत्र संख्या: २/३/४७

वृत्ति: इह प्रथमा स्यात्।

हिंदी व्याख्या:

यह सूत्र अत्यंत लघु है किंतु बहुत महत्वपूर्ण है। यह कहता है कि 'संबोधन' (Addressing someone) में भी प्रथमा विभक्ति होती है। जब हम किसी को पुकारते हैं या अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तो वह संबोधन कहलाता है।

  • उदाहरण: हे राम!भो छात्राः!

गहन विश्लेषण: संबोधन में प्रातिपदिकार्थ के साथ-साथ 'अभिमुखीकरण' (सामने वाले को पुकारना) का अर्थ जुड़ जाता है। चूँकि संबोधन में प्रथमा होती है, इसलिए इसे अलग से 'आठवीं विभक्ति' नहीं माना जाता, अपितु यह प्रथमा का ही एक विशिष्ट रूप है। केवल एकवचन के रूपों में कुछ परिवर्तन होता है (जैसे रामः के स्थान पर हे राम)।


दार्शनिक और आध्यात्मिक संदर्भ: श्लोक एवं मंत्र

संस्कृत व्याकरण केवल नियमों का समूह नहीं है, यह ब्रह्म विद्या का सोपान है। जैसा कि भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीयम्' में लिखा है:

तद्द्वारमपवर्गस्य वाङ्मलानां चिकित्सितम्।
पवित्रं सर्वविद्यानामधिविद्यं प्रकाशते॥

अर्थात, यह व्याकरण मोक्ष का द्वार है, वाणी के दोषों की चिकित्सा है और समस्त विद्याओं में परम पवित्र विद्या है।

जब हम प्रथमा विभक्ति के उदाहरणों में "कृष्णः" और "श्रीः" का प्रयोग करते हैं, तो यह मात्र व्याकरण का उदाहरण नहीं है।

  • कृष्णः प्रातिपदिक है जो 'आकर्षण' और 'परमानंद' का बोध कराता है।

  • श्रीः वह है जो ऐश्वर्य और कल्याण की अधिष्ठात्री है।

अतः इन शब्दों में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि अस्तित्व की 'प्रथम' सत्ता ही ईश्वर है।


व्यावहारिक उदाहरण और अभ्यास (Extensive Examples)

पाठकों की स्पष्टता के लिए यहाँ विभिन्न श्रेणियों के अनेक उदाहरण दिए जा रहे हैं:

१. प्रातिपदिकार्थ मात्र (Fixed Meaning) के उदाहरण:

  1. वृक्षः (पेड़) - नियत पुल्लिंग।

  2. धेनुः (गाय) - नियत स्त्रीलिंग।

  3. पुष्पम् (फूल) - नियत नपुंसक लिंग।

  4. प्रातः (सुबह) - अव्यय (अलिङ्ग)।

  5. खलु (निश्चय ही) - अव्यय।

  6. अग्निः (आग) - पुल्लिंग।

  7. वायुः (हवा) - पुल्लिंग।

२. लिंगमात्राधिक्य (Variable Gender) के उदाहरण:

  1. तटः/तटी/तटम् (तट के तीन लिंग)।

  2. शुक्लः/शुक्ला/शुक्लम् (सफेद रंग - विशेषण होने के कारण तीनों लिंगों में)।

  3. सुन्दरः/सुन्दरी/सुन्दरम् (सुंदर)।

  4. स्थूलः/स्थूला/स्थूलम् (मोटा/मोटी)।

३. परिमाण (Measurement) के उदाहरण:

  1. खारी व्रीहिः (खारी भर धान - खारी भी एक माप है)।

  2. अञ्जलिना जलम् (अंजलि भर जल - यहाँ अंजलि परिमाण है)।

  3. प्रस्थो यवः (प्रस्थ भर जौ)।

  4. हस्तः वस्त्रम् (एक हाथ कपड़ा)।

४. वचन (Number) के उदाहरण:

  1. त्रयः (तीन)।

  2. चत्वारः (चार)।

  3. शतम् (सौ)।

  4. सहस्रम् (हजार)।


प्रथमा विभक्ति का विशेष प्रयोग: "अभिहिते प्रथमा"

व्याकरण शास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है— "अभिहिते प्रथमा"
जब कर्ता या कर्म 'उक्त' (कहे गए) हों, तब उनमें प्रथमा विभक्ति होती है।

  1. कर्तृवाच्य (Active Voice) में: "रामः पुस्तकं पठति।" यहाँ 'पठति' क्रिया द्वारा कर्ता (राम) 'उक्त' है, अतः राम में प्रथमा हुई।

  2. कर्मवाच्य (Passive Voice) में: "रामेण ग्रन्थः पठ्यते।" यहाँ 'पठ्यते' क्रिया द्वारा कर्म (ग्रन्थ) 'उक्त' है, अतः ग्रन्थ में प्रथमा हुई।

यह नियम बहुत गहरा है। इसका अर्थ है कि प्रथमा विभक्ति केवल स्वतंत्र रूप से नहीं आती, बल्कि वह 'उक्त' अर्थ को अभिहित करने के लिए भी प्रयुक्त होती है।


प्रश्नोत्तरी (FAQ) - विषय को और स्पष्ट करने के लिए

प्रश्न १: क्या संबोधन को अलग विभक्ति माना जाना चाहिए?
उत्तर: नहीं, पाणिनि के अनुसार "संबोधने च" सूत्र द्वारा संबोधन में प्रथमा विभक्ति ही होती है। इसलिए इसे अलग विभक्ति नहीं, बल्कि प्रथमा का ही एक अर्थ-भेद माना जाता है।

प्रश्न २: 'द्रोणो व्रीहिः' में द्रोण और व्रीहि में क्या संबंध है?
उत्तर: यहाँ 'परिच्छेद्य-परिच्छेदक' भाव संबंध है। द्रोण परिच्छेदक (मापने वाला) है और व्रीहि परिच्छेद्य (मापा जाने वाला) है।

प्रश्न ३: 'मात्र' शब्द का क्या महत्व है?
उत्तर: 'मात्र' शब्द यह सुनिश्चित करता है कि प्रथमा केवल इन्हीं अर्थों (प्रातिपदिकार्थ, लिंग, परिमाण, संख्या) में हो। यदि ये अर्थ न हों, तो अन्य विभक्तियों (द्वितीया आदि) का मार्ग प्रशस्त होता है।

प्रश्न ४: क्या अव्यय शब्दों में भी प्रथमा होती है?
उत्तर: हाँ, व्याकरण की प्रक्रिया पूरी करने के लिए अव्ययों (जैसे उच्चैः, नीचैः) के बाद भी सु-प्रत्यय आता है, जिसका बाद में लोप हो जाता है। अतः वे भी प्रथमा के अंतर्गत 'अलिङ्ग' उदाहरण माने जाते हैं।


निष्कर्ष

संस्कृत व्याकरण का 'प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा' सूत्र केवल एक नियम नहीं है, बल्कि यह शब्दों के अस्तित्व और उनके अर्थ के प्रकटीकरण की वैज्ञानिक पद्धति है। यह सूत्र हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक शब्द अपने मूल रूप (प्रातिपदिक) से पद (विभक्ति युक्त) बनता है और वाक्य में अपना स्थान ग्रहण करता है।

चाहे वह "उच्चैः" जैसा अव्यय हो, "कृष्णः" जैसा नियत लिंग शब्द हो, या "द्रोणः" जैसा परिमाण—प्रथमा विभक्ति ही वह प्रथम सोपान है जो निराकार शब्द को साकार अर्थ प्रदान करती है।

आशा है कि यह विस्तृत लेख 'प्रथमा विभक्ति' और 'कारक' प्रकरण के इस महत्वपूर्ण सूत्र को समझने में आपके लिए मील का पत्थर साबित होगा।

"वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥"

(वाणी और अर्थ की सिद्धि के लिए, मैं वाणी और अर्थ के समान संयुक्त जगत के माता-पिता पार्वती और शिव की वंदना करता हूँ।)


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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