कारक प्रकरण: द्वितीया विभक्ति - एक विस्तृत और गहन विश्लेषण
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण में कारक का महत्त्व
संस्कृत साहित्य और भाषा का आधार उसका व्याकरण है, और व्याकरण की आत्मा 'कारक' है। आचार्य पाणिनि ने 'अष्टाध्यायी' में कारकों का जो सूक्ष्म विवेचन किया है, वह संसार की किसी भी भाषा में दुर्लभ है। "क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्" अर्थात् जिसका क्रिया के साथ सीधा अन्वय (सम्बन्ध) हो, उसे कारक कहते हैं।
कारक प्रकरण में द्वितीया विभक्ति का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 'कर्म' (Object) को परिभाषित करती है। कर्म वह आधार है जिस पर कर्ता की क्रिया का फल गिरता है। इस लेख में हम 'सिद्धान्तकौमुदी' और 'अष्टाध्यायी' के आलोक में द्वितीया विभक्ति के समस्त सूत्रों, वार्तिकों और उदाहरणों का सांगोपांग विवेचन करेंगे।
1. अधिकार सूत्र: कारके (1/4/23)
सूत्रम्: कारके।
हिन्दी अर्थ: यह एक 'अधिकार सूत्र' है। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के चतुर्थ पाद के 23वें सूत्र से लेकर उस पाद की समाप्ति तक जो भी संज्ञाएँ की जाएँगी (जैसे अपादान, सम्प्रदान, करण, कर्म, कर्ता), वे 'कारक' संज्ञाएँ कहलाएँगी।
विस्तृत व्याख्या:
इसका अर्थ यह है कि आगे आने वाले सूत्रों में 'कारक' शब्द का स्वतः बोध होगा। जब हम कहते हैं कि "कर्तुरीप्सिततमं कर्म", तो यहाँ 'कारक' का अधिकार होने के कारण यह सिद्ध होता है कि वह 'ईप्सिततम' वस्तु एक 'कारक' होनी चाहिए।
2. कर्म संज्ञा का विधायक सूत्र: कर्तुरीप्सिततमं कर्म (1/4/49)
सूत्रम्: कर्तुरीप्सिततमं कर्म।
वृत्ति: कर्तुः क्रियया आप्तुमिष्टतमं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: कर्ता अपनी क्रिया के माध्यम से जिस वस्तु को सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है (ईप्सिततम), उस कारक की 'कर्म' संज्ञा होती है।
विश्लेषण और उदाहरण:
यहाँ तीन मुख्य शब्द हैं:
कर्तुः (कर्ता): जो क्रिया को स्वतन्त्र रूप से करने वाला हो।
ईप्सिततमम्: यहाँ 'ईप्सित' (चाहना) शब्द के साथ 'तमप्' प्रत्यय लगा है। 'तमप्' अतिशयता (Excellence/Extreme) का बोधक है। अर्थात् कर्ता जिसे सबसे अधिक चाहे।
कर्म: उस पदार्थ का नाम 'कर्म' रख दिया जाता है।
उदाहरण: हरिं भजति।
यहाँ 'भजन' क्रिया के द्वारा भक्त (कर्ता) 'हरि' को प्राप्त करना चाहता है, अतः 'हरि' की कर्म संज्ञा हुई।
शंका और समाधान:
'कर्तुः' क्यों कहा गया?
यदि 'कर्तुः' न कहते तो कर्म के द्वारा चाही गई वस्तु की भी कर्म संज्ञा होने लगती।
उदाहरण: माषेष्वश्वं बध्नाति (उड़द के खेत में घोड़े को बाँधता है)। यहाँ घोड़े को उड़द (माष) प्रिय हैं, कर्ता को नहीं। कर्ता को तो केवल घोड़ा बाँधना है। अतः माष (उड़द) की कर्म संज्ञा नहीं होती, अपितु वह आधार होने से अधिकरण के पास चला जाता है।
'तमप्' (ईप्सिततम) क्यों कहा गया?
यदि केवल 'ईप्सित' कहते, तो उन वस्तुओं की भी कर्म संज्ञा होने लगती जो क्रिया में सहायक तो हैं पर मुख्य उद्देश्य नहीं हैं।
उदाहरण: पयसा ओदनं भुङ्क्ते (दूध के साथ भात खाता है)। यहाँ कर्ता का मुख्य उद्देश्य 'ओदन' (भात) खाना है, दूध केवल उसका सहायक है। अतः 'ओदन' की कर्म संज्ञा होगी, दूध की 'करण' संज्ञा होगी।
3. विभक्ति विधायक सूत्र: कर्मणि द्वितीया (2/3/2)
सूत्रम्: कर्मणि द्वितीया।
वृत्ति: अनुक्ते कर्मणि द्वितीया स्यात्।
हिन्दी अर्थ: 'अनुक्त' (अनभिहित) कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।
'उक्त' और 'अनुक्त' का रहस्य:
यह संस्कृत व्याकरण का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। इसे समझने के लिए 'अभिधान' प्रक्रिया को समझना होगा।
सूत्रम्: अनभिहिते (2/3/1)।
यह एक अधिकार सूत्र है। इसका अर्थ है कि यदि कारक किसी अन्य प्रत्यय (तिङ्, कृत्, तद्धित, समास) द्वारा पहले ही नहीं कहा गया है (अनुक्त है), तभी उसमें विभक्ति लगेगी।
अनुक्त कर्म: जब क्रिया के द्वारा कर्म नहीं कहा जाता (जैसे कर्तृवाच्य में), तब द्वितीया होती है।
यथा: हरिं भजति। (यहाँ क्रिया कर्ता के अनुसार है, कर्म अनुक्त है, अतः हरि में द्वितीया हुई)।
उक्त कर्म: जब कर्म क्रिया द्वारा पहले ही कह दिया जाता है (जैसे कर्मवाच्य में), तब वहाँ प्रथमा विभक्ति होती है।
यथा: हरिः सेव्यते। (यहाँ 'ते' प्रत्यय द्वारा हरि 'उक्त' हो गया, अतः प्रथमा हुई)।
अभिधान (कहने) के प्रकार:
अभिधान मुख्य रूप से चार प्रकार से होता है:
तिङ्: हरिः सेव्यते। (यहाँ तिङ् प्रत्यय द्वारा कर्म उक्त है)।
कृत्: लक्ष्म्या सेवितः। (यहाँ 'क्त' प्रत्यय द्वारा कर्म उक्त है)।
तद्धित: शतेन क्रीतः शत्यः। (सौ में खरीदा हुआ)।
समास: प्राप्तः आनन्दो यं स प्राप्तानन्दः। (जिसे आनंद प्राप्त हो चुका है)।
4. अनीप्सित कर्म: तथायुक्तं चानीप्सितम् (1/4/50)
सूत्रम्: तथायुक्तं चानीप्सितम्।
वृत्ति: ईप्सिततमवत्क्रियया युक्तमनीप्सितमपि कारकं कर्मसंज्ञं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिन्हें कर्ता चाहता तो नहीं है, परंतु वे क्रिया के साथ वैसे ही जुड़े होते हैं जैसे 'ईप्सिततम' पदार्थ। ऐसे 'अनीप्सित' (न चाहे गए) कारकों की भी कर्म संज्ञा होती है।
उदाहरण:
ग्रामं गच्छन् तृण स्पृशति: (गाँव जाते हुए तिनके को छूता है)। यहाँ कर्ता का उद्देश्य गाँव पहुँचना है (ईप्सित), तिनका छूना नहीं (अनीप्सित)। फिर भी स्पर्श क्रिया के साथ तिनके का संबंध होने से उसमें द्वितीया हुई।
ओदनं भुञ्जानो विषं भुङ्क्ते: (भात खाता हुआ विष खा लेता है)। यहाँ विष खाना अनिष्ट है (अनीप्सित), फिर भी उसकी कर्म संज्ञा होती है।
5. गौण कर्म का विवेचन: अकथितं च (1/4/51)
यह सूत्र अत्यंत विस्तृत है और द्वितीया विभक्ति की रीढ़ है।
सूत्रम्: अकथितं च।
वृत्ति: अपादानादिविशेषैरविवक्षितं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: जहाँ अपादान, सम्प्रदान, करण या अधिकरण की विशेष संज्ञा करने की इच्छा न हो (अविवक्षा हो), वहाँ उस कारक की 'कर्म' संज्ञा होती है। इन्हें 'अकथित' या 'गौण कर्म' (Secondary Object) कहते हैं।
यह नियम केवल 16 धातुओं पर लागू होता है, जिन्हें 'द्विकर्मक धातु' कहा जाता है।
द्विकर्मक धातुओं की कारिका (श्लोक):
दुह्याच्पच्दण्डुधिप्रच्छिचिब्रूशासुजिमथ्मुषाम् ।
कर्मयुक् स्यादकथितं तथा स्यान्नीहृकृष्वहाम् ॥
इन 16 धातुओं के उदाहरण और विश्लेषण:
दुह् (दुहना): गां दोग्धि पयः। (गाय से दूध दुहता है)। यहाँ 'गाय' वास्तव में अपादान है, पर उसकी अविवक्षा करके उसे 'गां' (कर्म) बना दिया गया। 'पयः' प्रधान कर्म है।
याच् (माँगना): बलिं याचते वसुधाम्। (बलि से पृथ्वी माँगता है)। बलि अपादान था, पर कर्म बना दिया गया।
पच् (पकाना): तण्डुलान् ओदनं पचति। (चावलों से भात पकाता है)। यहाँ चावल करण थे, पर कर्म बन गए।
दण्ड् (दण्ड देना): गर्गान् शतं दण्डयति। (गर्गों पर सौ का जुर्माना करता है)।
रुध् (रोकना): व्रजमवरुणद्धि गाम्। (बाड़े में गाय को रोकता है)।
प्रच्छ् (पूछना): माणवकं पन्थानं पृच्छति। (बालक से रास्ता पूछता है)।
चि (चुनना): वृक्षम् अवचिनोति फलानि। (वृक्ष से फल चुनता है)।
ब्रू (बोलना): माणवकं धर्मं ब्रूते। (बालक से धर्म कहता है)।
शास् (उपदेश): माणवकं धर्मं शास्ति। (बालक को धर्म का उपदेश देता है)।
जि (जीतना): शतं जयति देवदत्तम्। (देवदत्त से सौ रुपये जीतता है)।
मथ् (मथना): सुधां क्षीरनिधिं मध्नाति। (क्षीरसागर से अमृत मथता है)।
मुष् (चुराना): देवदत्तं शतं मुष्णाति। (देवदत्त के सौ रुपये चुराता है)।
नी (ले जाना): ग्रामम् अजां नयति। (गाँव बकरी ले जाता है)।
हृ (हरना): ग्रामम् अजां हरति।
कृष् (खींचना): ग्रामम् अजां कर्षति।
वह् (पहुँचाना): ग्रामम् अजां वहति।
महत्वपूर्ण वार्तिक:
"अकर्मकधातुभिर्योगे देशः कालो भावो गन्तव्योऽध्वा च कर्मसंज्ञक इति वाच्यम्"
अकर्मक धातुओं के योग में देश, काल, भाव और मार्गवाची शब्दों की कर्म संज्ञा होती है।
देश: कुरून् स्वपिति (कुरु देश में सोता है)।
काल: मासमधीते (महीने भर पढ़ता है)।
भाव: गोदोहमास्ते (गाय दुहने के समय तक बैठता है)।
मार्ग: क्रोशं गच्छति (कोस भर जाता है)।
6. ण्यन्त (Causative) अवस्था में कर्म संज्ञा (1/4/52)
सूत्रम्: गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ।
वृत्ति: गत्याद्यर्थानां शब्दकर्मणामकर्मकाणां चाणौ यः कर्ता स णौ कर्म स्यात्।
हिन्दी अर्थ:
गति (जाना), 2. बुद्धि (जानना), 3. प्रत्यवसान (खाना), 4. शब्दकर्मक (पढ़ना/बोलना) और 5. अकर्मक धातुओं का जो 'अण्यन्त' (साधारण) अवस्था का कर्ता होता है, वह 'ण्यन्त' (प्रेरणार्थक/Causative) अवस्था में 'कर्म' बन जाता है।
भगवान विष्णु की स्तुति में उदाहरण:
शत्रूनगमयत्स्वर्गं वेदार्थं स्वानवेदयत् ।
आशयच्चामृतं देवान्वेदमध्यापयद्विधिम् ॥
आसयत्सलिले पृथ्वीं यः स मे श्रीहरिर्गतिः ॥
गति: शत्रुः स्वर्गं अगच्छन् -> हरिः शत्रून् स्वर्गं अगमयत्। (शत्रुओं को स्वर्ग भेजा)।
बुद्धि: स्वाः वेदार्थं विदुः -> हरिः स्वान् वेदार्थं अवेदयत्। (अपनों को वेद का ज्ञान कराया)।
प्रत्यवसान (भक्षण): देवाः अमृतं आशन् -> हरिः देवान् अमृतं आशयत्। (देवताओं को अमृत खिलाया)।
शब्दकर्मक: विधिः वेदं अध्यैत -> विधिं वेदं अध्यापयत्। (ब्रह्मा को वेद पढ़ाया)।
अकर्मक: पृथ्वी सलिले अतिष्ठत् -> पृथ्वीं सलिले आसयत्। (पृथ्वी को जल में स्थित किया)।
अपवाद (Exceptions):
नी-वह्योर्न: 'नी' और 'वह' धातु के कर्ता ण्यन्त में कर्म नहीं बनते, बल्कि 'करण' (तृतीया) रहते हैं। यथा: वाहयति भारं भृत्येन।
आदि-खाद्योर्न: खाने के अर्थ में भी 'अद्' और 'खाद्' धातुओं में तृतीया होती है। यथा: आदयति अन्नं बटुना।
हृक्रोरन्यतरस्याम् (1/4/53): 'हृ' और 'कृ' धातु के कर्ता विकल्प से कर्म बनते हैं। यथा: हारयति भृत्यं/भृत्येन वा।
7. आधार की कर्म संज्ञा (अधि उपसर्ग के साथ)
पाणिनि ने कुछ विशिष्ट स्थितियों में 'आधार' (जो कि अधिकरण होना चाहिए) को 'कर्म' बनाने के नियम दिए हैं:
1. अधि-शीङ्-स्था-आसां कर्म (1/4/46):
यदि शीङ् (सोना), स्था (ठहरना) और आस् (बैठना) धातुओं के पहले 'अधि' उपसर्ग लगा हो, तो आधार की कर्म संज्ञा होती है।
शीङ्: हरिः वैकुण्ठं अधिशेते। (हरि वैकुण्ठ में सोते हैं)।
स्था: हरिः वैकुण्ठं अधितिष्ठति। (हरि वैकुण्ठ में रहते हैं)।
आस्: हरिः वैकुण्ठं अध्यास्ते। (हरि वैकुण्ठ में बैठते हैं)।
2. अभिनिविशश्च (1/4/47):
यदि 'विश' धातु के पहले 'अभि' और 'नि' दोनों उपसर्ग एक साथ आएँ, तो आधार कर्म होता है।
यथा: अभिनिविशते सन्मार्गम्। (वह अच्छे मार्ग पर चलता है)।
3. उपान्वध्याङ्घसः (1/4/48):
यदि 'वस' (रहना) धातु के पहले उप, अनु, अधि, या आ उपसर्ग लगा हो, तो आधार कर्म होता है।
यथा: विष्णुः वैकुण्ठम् उपवसति/अनुवसति/अधिवसति/आवसति।
अपवाद (अभुक्त्यर्थस्य न): यदि 'उप' + 'वस' का अर्थ 'उपवास करना' (भूखा रहना) हो, तो द्वितीया नहीं होती, सप्तमी ही रहती है।
यथा: वने उपवसति। (वह वन में उपवास करता है)।
8. उपपद द्वितीया और वार्तिक विवेचन
विभक्तियाँ दो प्रकार की होती हैं—कारक विभक्ति और उपपद विभक्ति। जब किसी पद विशेष के कारण विभक्ति लगे, उसे 'उपपद' कहते हैं।
कारिका:
उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु ।
द्वितीयाम्रेडितान्तेषु ततोऽन्यत्रापि दृश्यते ॥
उभयतः (दोनों ओर): उभयतः कृष्णं गोपाः।
सर्वतः (चारों ओर): सर्वतः कृष्णं गोपाः।
धिक् (धिक्कार): धिक् कृष्णाभक्तम्!
उपर्युपरि (ठीक ऊपर): उपर्युपरि लोकं हरिः।
अधोऽधः (ठीक नीचे): अधोऽधः लोकं पातालः।
अध्यधि (अंदर-अंदर): अध्यधि लोकं पातालः।
अन्य प्रमुख शब्द (वार्तिक - अभितः परितः...):
अभितः (सामने/दोनों ओर): अभितः कृष्णम्।
परितः (सब ओर): परितः कृष्णम्।
समया / निकषा (निकट): ग्रामं समया, निकषा लङ्काम्।
हा (शोक): हा कृष्णाभक्तम्! (बड़ा कष्ट है कि वह कृष्ण का भक्त नहीं है)।
प्रति (की ओर): बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित्। (भूखे को कुछ भी अच्छा नहीं लगता)।
अन्तरा-अन्तरेण युक्ते (2/3/4):
अन्तरा (बीच में): अन्तरा त्वां मां हरिः। (तुम्हारे और मेरे बीच में हरि हैं)।
अन्तरेण (बिना/विषय में): अन्तरेण हरिं न सुखम्। (हरि के बिना सुख नहीं है)।
9. कर्मप्रवचनीय संज्ञा और द्वितीया
जब 'अनु', 'उप', 'प्रति' आदि शब्द उपसर्ग न रहकर स्वतंत्र रूप से संबंध बताते हैं, तो उन्हें 'कर्मप्रवचनीय' कहते हैं।
अनुर्लक्षणे (1/4/84): जब 'अनु' किसी लक्षण को बताए।
यथा: जपमनु प्रावर्षत्। (जप के बाद वर्षा हुई)। यहाँ जप वर्षा का कारण/लक्षण है।
तृतीयार्थे: जहाँ 'अनु' का अर्थ 'साथ' (सह) हो।
यथा: नदीमन्ववसिता सेना। (नदी के साथ-साथ सेना लगी हुई है)।
हीने (1/4/86): 'हीन' (नीचे) बताने के लिए।
यथा: अनु हरिं सुराः। (देवता हरि से नीचे/न्यून हैं)।
उपोऽधिके च (1/4/87): 'उप' का प्रयोग हीन या अधिक के लिए।
हीन अर्थ: उप हरिं सुराः। (द्वितीया)।
अधिक अर्थ: उप परार्धे हरे गुणाः। (सप्तमी)।
लक्षणेत्थंभूताख्यान... (1/4/90): प्रति, परि, और अनु का प्रयोग जब लक्षण, भाग, या वीप्सा (दोहराव) के लिए हो।
वीप्सा: वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति। (प्रत्येक वृक्ष को सींचता है)।
अभिरभागे (1/4/91): 'अभि' जब 'हिस्सा' (भाग) न बताकर अन्य अर्थ दे।
यथा: हरिमभि वर्तते। (हरि की ओर है)।
सुः पूजायाम् (1/4/94): 'सु' जब प्रशंसा के लिए हो।
यथा: सुसिक्तं भवता। (आपने बहुत सुंदर सींचा है)।
अतिरतिक्रमणे च (1/4/95): 'अति' जब श्रेष्ठता बताए।
यथा: अति देवान् कृष्णः। (कृष्ण देवताओं से बढ़कर हैं)।
अपिः पदार्थसंभावना... (1/4/96):
'अपि' का प्रयोग संभावना, निंदा या समुच्चय के लिए होता है।
संभावना: अपि स्तुयाद् विष्णुम्। (शायद वह विष्णु की स्तुति करे)।
गर्हा (निंदा): धिक् देवदत्तम् अपि स्तुयाद् वृषलम्। (धिक्कार है देवदत्त को, वह नीच की स्तुति करता है)।
10. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे (2/3/5)
यह सूत्र अत्यंत व्यावहारिक है।
सूत्रम्: कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे।
हिन्दी अर्थ: समयवाची (काल) और मार्गवाची (अध्वन्) शब्दों में यदि क्रिया का 'निरंतर' (Continuous) संबंध हो, तो द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
काल (समय):
मासं कल्याणी: (पूरे महीने कल्याणकारी रहा)।
मासमधीते: (महीने भर निरंतर पढ़ता है)।
अध्वन् (मार्ग):
क्रोशं कुटिला नदी: (नदी कोस भर तक टेढ़ी है)।
क्रोशं गिरिः: (पहाड़ कोस भर तक फैला है)।
सावधानी: यदि निरंतरता (अत्यन्त संयोग) न हो, तो षष्ठी होती है।
यथा: मासस्य द्विरधीते। (महीने में केवल दो बार पढ़ता है - यहाँ निरंतरता नहीं है)।
निष्कर्ष
द्वितीया विभक्ति केवल एक व्याकरणिक नियम नहीं है, बल्कि यह वाक्य में कर्ता की इच्छा, क्रिया की दिशा और अर्थ की स्पष्टता को सुनिश्चित करने वाला एक वैज्ञानिक उपकरण है। 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म' से शुरू होकर 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे' तक की यह यात्रा हमें संस्कृत भाषा की सूक्ष्मता से परिचित कराती है।
चाहे वह द्विकर्मक धातुओं का प्रयोग हो या ण्यन्त अवस्था के कर्ता का कर्म में परिवर्तन, पाणिनि के सूत्र गणितीय सटीकता के साथ कार्य करते हैं। एक विद्यार्थी के लिए इन सूत्रों का अभ्यास न केवल भाषा को शुद्ध बनाता है, बल्कि प्राचीन भारतीय मेधा (Intelligence) के प्रति गौरव का भाव भी जागृत करता है।
"इति द्वितीया विभक्ति प्रकरणम्"
यह लेख संस्कृत व्याकरण के जिज्ञासुओं, छात्रों और शिक्षकों के लिए एक संपूर्ण संदर्भ ग्रंथ की भांति है। इसमें समाहित उदाहरण और सूत्र 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' के क्रम के अनुसार दिए गए हैं।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।