भाषा विज्ञान: उत्पत्ति, स्वरूप और विश्व की भाषाओं का वैज्ञानिक वर्गीकरण | The Ultimate Guide to Linguistics
प्रस्तावना: भाषा और विज्ञान का संगम
संसार के समस्त प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे विधाता ने 'वाक्' (वाणी) की शक्ति प्रदान की है। इसी वाणी के माध्यम से वह अपने विचारों, भावों और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। जब हम 'भाषा-विज्ञान' (Linguistics) शब्द का प्रयोग करते हैं, तो इसमें दो अत्यंत महत्वपूर्ण पद समाहित होते हैं— 'भाषा' और 'विज्ञान'।
भाषा विज्ञान को गहराई से समझने के लिए इन दोनों शब्दों के मर्म को समझना अनिवार्य है।
१. भाषा शब्द की व्युत्पत्ति:
संस्कृत की 'भाषँ व्यक्तायां वाचि' धातु से 'भाषा' शब्द निष्पन्न हुआ है। इसका अर्थ है— ऐसी वाणी जो व्यक्त हो, स्पष्ट हो और अर्थपूर्ण हो। महर्षि पतंजलि के अनुसार:
"व्यक्ता वाचि वर्णा येषां त इमे व्यक्तवाचः।"
अर्थात् जो वर्णों (ध्वनियों) के माध्यम से व्यक्त की जाए, वही भाषा है।
२. विज्ञान शब्द की व्युत्पत्ति:
'विज्ञान' शब्द में 'वि' उपसर्ग और 'ज्ञा' धातु के साथ 'ल्युट्' (अन्) प्रत्यय का प्रयोग हुआ है। सामान्य अर्थ में विज्ञान का तात्पर्य है 'विशेष ज्ञान'। जब हम किसी विषय का क्रमबद्ध, तर्कसंगत और प्रायोगिक अध्ययन करते हैं, तो वह विज्ञान बन जाता है।
अतः, भाषा विज्ञान वह शास्त्र है जिसमें भाषा का वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक और तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। यह मानव सभ्यता और संस्कृति के इतिहास को जानने का सबसे सशक्त माध्यम है।
भाषा विज्ञान की परिभाषा और स्वरूप
भाषा विज्ञान भाषा के अध्ययन की वह शाखा है जिसमें भाषा की उत्पत्ति (Origin), उसके स्वरूप (Nature), उसके विकास (Evolution) और ह्रास का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भाषा के अर्थ, संदर्भ, ध्वनि संरचना और वाक्य विन्यास का सूक्ष्म विश्लेषण करता है।
प्राचीनतम संदर्भ:
भाषा के दस्तावेजीकरण और विवेचन का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक कार्य भारत की पावन धरा पर हुआ। ६ठी शताब्दी ईसा पूर्व में महान भारतीय वैयाकरण महर्षि पाणिनि ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' में भाषा के नियमों को सूत्रबद्ध किया। यह ग्रंथ आज भी आधुनिक भाषा विज्ञानियों के लिए विस्मय और प्रेरणा का केंद्र है।
भाषा विज्ञान और व्याकरण: एक महत्वपूर्ण अंतर
अक्सर लोग व्याकरण और भाषा विज्ञान को एक ही मान लेते हैं, किंतु इनमें सूक्ष्म और मौलिक अंतर है।
व्याकरण (Grammar): व्याकरण किसी विशिष्ट भाषा का कार्यात्मक अध्ययन (Functional Description) है। यह बताता है कि भाषा को शुद्ध रूप में कैसे लिखा और बोला जाए। यह 'नियम' निर्धारित करता है।
भाषा विज्ञान (Linguistics): भाषा विज्ञानी व्याकरण के नियमों से आगे जाकर भाषा का व्यापक अध्ययन करता है। वह यह नहीं बताता कि क्या सही है, बल्कि यह विश्लेषण करता है कि भाषा ऐसी क्यों है? उसका विकास कैसे हुआ? और विभिन्न भाषाओं में क्या अंतर्संबंध हैं?
'भाषा विज्ञान' के विभिन्न नाम: एक ऐतिहासिक यात्रा
भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन को इतिहास में विभिन्न नामों से जाना गया है। विशेषकर यूरोप और भारत में इसके नामकरण की एक लंबी परंपरा रही है:
फिलोलॉजी (Philology): प्राचीन काल में यूरोप में इसे फिलोलॉजी कहा जाता था, जिसका अर्थ है 'शब्दों के प्रति प्रेम'।
कम्पैरेटिव फिलोलॉजी (Comparative Philology): जब विद्वानों ने भाषाओं की तुलना करना शुरू किया, तो इसे 'तुलनात्मक फिलोलॉजी' कहा जाने लगा।
कम्पैरेटिव ग्रामर (Comparative Grammar): १९वीं शताब्दी तक व्याकरण और भाषा के अध्ययन को एक ही माना जाता था, अतः इसे यह नाम भी दिया गया।
लिंग्विस्टिक्स (Linguistics): फ्रांस में इसे 'लैंगिस्तीक्' (Linguistique) कहा गया। १९वीं सदी में यह शब्द पूरे यूरोप में प्रचलित हुआ और आज वैश्विक स्तर पर 'Linguistics' ही सर्वमान्य है।
अन्य नाम: साइंस ऑफ लैंग्वेज (Science of Language) और ग्लौटोलेजी (Glottology) भी कुछ समय तक चर्चा में रहे।
भारत में नामकरण:
भारत में इसके लिए 'भाषा-शास्त्र', 'भाषा-तत्त्व' और 'तुलनात्मक भाषा-विज्ञान' जैसे शब्द प्रयोग किए गए, किंतु वर्तमान में 'भाषा-विज्ञान' ही सबसे प्रचलित और उपयुक्त नाम है।
भाषा विज्ञान का गौरवशाली इतिहास
भाषा विज्ञान का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। यद्यपि आधुनिक जगत में इसे पश्चिमी विद्वानों की देन माना जाता है, किंतु इसकी जड़ें भारत के वैदिक साहित्य में बहुत गहरी हैं।
१. भारतीय परंपरा और ऋषि-मनीषियों का योगदान
प्राचीन काल से ही संस्कृत साहित्य में भाषा संबंधी सूक्ष्म चर्चा मिलती है।
शिक्षा (Vedanga): वेदों के छह अंगों में 'शिक्षा' प्रथम है, जिसे 'वेद की नासिका' कहा जाता है। इसमें ध्वनियों के उच्चारण, स्थान, प्रयत्न और अवयवों का विस्तृत वर्णन है।
प्रातिशाख्य और निरुक्त: महर्षि यास्क का 'निरुक्त' शब्दों की व्युत्पत्ति (Etymology) का विश्व का प्रथम ग्रंथ है। इसमें धातु, उपसर्ग और प्रत्यय का वैज्ञानिक विश्लेषण मिलता है।
वाक्यपदीय (भर्तृहरि): महान दार्शनिक भर्तृहरि ने अपने ग्रंथ 'वाक्यपदीय' में 'शब्द' के स्वरूप का अत्यंत गहन चिंतन किया है। उन्होंने शब्द को 'ब्रह्म' माना है:
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥
(वह ब्रह्म अनादि और अनंत है, जिसका तत्व 'शब्द' है। वही अक्षर ब्रह्म अर्थ के रूप में विवर्तित होकर जगत की प्रक्रिया को चलाता है।)
२. आधुनिक भाषा विज्ञान का उदय (पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य)
आधुनिक भाषा विज्ञान का सूत्रपात सन् 1786 ई. में हुआ, जब सर विलियम जोन्स ने रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता में अपना प्रसिद्ध व्याख्यान दिया। उन्होंने संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषा के बीच अद्भुत समानताएं देखीं और यह संभावना व्यक्त की कि ये तीनों भाषाएं एक ही मूल स्रोत (Proto-Language) से निकली हैं। यहीं से 'तुलनात्मक भाषा विज्ञान' की नींव पड़ी।
विश्व की भाषाओं का वर्गीकरण (Classification of Languages)
विश्व में कितनी भाषाएं बोली जाती हैं, यह आज भी एक शोध का विषय है। अनुमानतः विश्व में लगभग ३००० भाषाएं और बोलियां प्रचलित हैं (कुछ विद्वान इसे २७९६ मानते हैं)।
इन भाषाओं को दो प्रमुख आधारों पर वर्गीकृत किया गया है:
आकृतिमूलक वर्गीकरण (Morphological Classification)
पारिवारिक वर्गीकरण (Genealogical/Family Classification)
वर्गीकरण के प्रणेता:
सर्वप्रथम प्रो. लेगल ने भाषाओं को दो भागों में बांटा। इसके बाद प्रो. बोप, ग्रिम और श्लायर ने इसे तीन वर्गों में विभाजित किया। पॉट ने ४ वर्ग बनाए। परंतु वास्तविक रूप में भाषाओं के दो मुख्य वर्ग हैं— अयोगात्मक और योगात्मक।
१. आकृतिमूलक वर्गीकरण (Morphological Classification)
यह वर्गीकरण शब्द की रचना, प्रकृति (Base) और प्रत्यय (Affix) के संबंध पर आधारित है। इसे 'रचना-तत्व' प्रधान वर्गीकरण भी कहते हैं।
(A) अयोगात्मक भाषाएं (Isolating Languages)
इन भाषाओं में प्रकृति और प्रत्यय का कोई मेल नहीं होता। प्रत्येक शब्द स्वतंत्र होता है और अपना अर्थ स्वयं स्पष्ट करता है। इसमें शब्दों के रूप नहीं बदलते।
प्रतिनिधि भाषा: चीनी (Chinese)।
अन्य उदाहरण: स्यामी, तिब्बती, बर्मी, अनामी और सूडानी।
(B) योगात्मक भाषाएं (Agglutinating/Inflectional)
जिन भाषाओं में प्रकृति (अर्थतत्व) और प्रत्यय (संबंधतत्व) का संयोग होता है, उन्हें योगात्मक कहते हैं। इसके तीन मुख्य भेद हैं:
१. अश्लिष्ट योगात्मक (Agglutinative / प्रत्यय-प्रधान)
इसमें प्रकृति और प्रत्यय इस प्रकार जुड़े होते हैं कि उन्हें अलग-अलग स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसे 'तिल-तण्डुल न्याय' (जैसे तिल और चावल मिले होने पर भी अलग दिखते हैं) कहा जाता है।
इसके चार उप-भाग हैं:
पूर्वयोगात्मक: जहाँ प्रत्यय पहले लगता है (उदाहरण: जुलु, काफिर)।
मध्ययोगात्मक: जहाँ प्रत्यय शब्द के बीच में लगता है (उदाहरण: संथाली)।
अन्तयोगात्मक: जहाँ प्रत्यय अंत में जुड़ता है (उदाहरण: तुर्की, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम)।
पूर्वान्तयोगात्मक: जहाँ प्रत्यय आगे और पीछे दोनों ओर जुड़ता है (उदाहरण: मफोर)।
२. श्लिष्ट योगात्मक (Inflectional / विभक्ति-प्रधान)
इसमें प्रकृति और प्रत्यय इतनी घनिष्ठता से मिले होते हैं कि उन्हें अलग करना कठिन होता है। इस संयोग को 'नीर-क्षीर न्याय' (जैसे दूध और पानी का मिलन) कहा जाता है। संसार की सबसे उन्नत भाषाएं इसी वर्ग में आती हैं।
श्लिष्ट योगात्मक के दो मुख्य भेद हैं:
(क) अन्तर्मुखी श्लिष्ट (Internal Inflectional):
इसमें शब्द के भीतर ही परिवर्तन करके नए रूप बनाए जाते हैं।
संयोगात्मक: उदाहरण - अरबी। (इसमें धातुओं में स्वर बदलकर अर्थ परिवर्तन होता है)।
वियोगात्मक: उदाहरण - हिब्रू।
(ख) बहिर्मुखी श्लिष्ट (External Inflectional):
इसमें प्रत्यय प्रकृति के बाद जुड़ते हैं। संस्कृत इसकी सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि है।
संयोगात्मक (Synthetic): जिसमें विभक्ति शब्द के साथ जुड़ी रहती है। (जैसे: संस्कृत में 'गच्छति' = गच्छ+अ+ति)। अन्य उदाहरण: ग्रीक, लैटिन, अवेस्ता।
वियोगात्मक (Analytic): जिसमें विभक्ति या सहायक क्रियाएं अलग से लगाई जाती हैं। (जैसे: हिन्दी में 'बालक को', अंग्रेजी में 'To the boy')। आधुनिक हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला, मराठी इसी वर्ग में हैं।
३. प्रश्लिष्ट योगात्मक (Incorporate / समास-प्रधान)
इसमें प्रकृति और प्रत्यय इस प्रकार गुंथे होते हैं कि पूरा वाक्य ही एक शब्द जैसा प्रतीत होता है। इसे 'समास-प्रधान' भाषा भी कहते हैं।
पूर्ण प्रश्लिष्ट: इसमें पूरा वाक्य एक शब्द बन जाता है। (उदाहरण: दक्षिण अमेरिका की 'चेरोफी' भाषा)। जैसे— नाधोलिनिन (अर्थ: हमारे लिए नाव लाओ)।
आंशिक प्रश्लिष्ट: इसमें क्रिया और सर्वनाम का मिश्रण होता है। (उदाहरण: बास्क भाषा)। जैसे— हकार्त (मैं तुझे ले जाता हूँ)।
भाषा विज्ञान का महत्व: उपसंहार
भाषा विज्ञान केवल एक शैक्षणिक विषय नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना के विकास का आइना है। यह हमें बताता है कि किस प्रकार एक सूक्ष्म ध्वनि ने विकसित होकर महान साहित्य और दर्शन को जन्म दिया। जैसा कि कहा गया है:
भाषया विना जगदन्धं स्यात्।
(भाषा के बिना यह संपूर्ण संसार अंधकारमय होता।)
आज के युग में कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स (Computational Linguistics) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास में भी पाणिनि के व्याकरण और भाषा विज्ञान के सिद्धांतों का अभूतपूर्व योगदान है। यह शास्त्र हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और वैश्विक संचार के पुल का निर्माण करता है।
मुख्य बिंदु (Key Highlights for SEO):
भाषा की व्युत्पत्ति: भाषँ व्यक्तायां वाचि।
प्रथम वैयाकरण: महर्षि पाणिनि (अष्टाध्यायी)।
आधुनिक भाषा विज्ञान का प्रारंभ: सर विलियम जोन्स (1786)।
विश्व की भाषाओं की संख्या: लगभग 3000।
वर्गीकरण: आकृतिमूलक (Morphological) और पारिवारिक (Genealogical)।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।