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तत्पुरुष समास: पाणिनीय अष्टाध्यायी का संपूर्ण एवं गहन विश्लेषण

अथ तत्पुरुषः

तत्पुरुष समास: पाणिनीय अष्टाध्यायी का संपूर्ण एवं गहन विश्लेषण

प्रस्तावना

संस्कृत वाङ्मय में व्याकरण का स्थान सर्वोपरि है। महर्षि पाणिनि ने अपनी कालजयी रचना 'अष्टाध्यायी' में भाषा के जिन नियमों का प्रतिपादन किया है, उनमें 'समास' प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है। 'समास' का अर्थ है—संक्षेपण (समसनं समासः)। जब दो या दो से अधिक सुबन्त पद अपनी-अपनी विभक्तियों का त्याग कर एक नए अर्थबोधक पद का निर्माण करते हैं, तो उसे समास कहते हैं।

समासों के विस्तृत वर्गीकरण में 'तत्पुरुष समास' अपनी व्यापकता और गहराई के लिए जाना जाता है। इस लेख में हम तत्पुरुष समास के भेदों, सूत्रों और उनके व्यावहारिक उदाहरणों का विस्तार से वर्णन करेंगे।


१. तत्पुरुष समास का अधिकार और संज्ञा

संस्कृत व्याकरण में किसी भी प्रकरण को समझने के लिए उसके अधिकार सूत्रों को जानना आवश्यक है।

सूत्र: तत्पुरुषः (२/१/२२)

वृत्ति: अधिकारोऽयं प्राग्बहुव्रीहेः।
व्याख्या: अष्टाध्यायी के दूसरे अध्याय के प्रथम पाद में स्थित यह एक 'अधिकार सूत्र' है। इसका अर्थ यह है कि यहाँ से लेकर 'शेषो बहुव्रीहिः' (२/२/२३) सूत्र के पहले तक जितने भी समास कहे जाएंगे, उनकी संज्ञा 'तत्पुरुष' होगी। यह सूत्र एक सीमा निर्धारित करता है कि तत्पुरुष का राज्य कहाँ तक फैला है।

सूत्र: द्विगुश्च (२/१/२३)

वृत्ति: द्विगुरपि तत्पुरुषसंज्ञकः स्यात्।
व्याख्या: महर्षि पाणिनि यहाँ स्पष्ट करते हैं कि 'द्विगु' समास भी तत्पुरुष का ही एक विशेष भेद है। जब तत्पुरुष समास का पूर्वपद संख्यावाचक हो, तो उसे 'द्विगु' संज्ञा दी जाती है। अतः द्विगु को तत्पुरुष से अलग नहीं, बल्कि उसी का एक अंग समझना चाहिए।


२. द्वितीया तत्पुरुष समास

तत्पुरुष समास के भेदों में 'विभक्ति तत्पुरुष' प्रमुख है। इसमें द्वितीया से लेकर सप्तमी विभक्ति तक के लोप के आधार पर भेद किए गए हैं।

सूत्र: द्वितीयाश्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः (२/१/२४)

वृत्ति: द्वितीयान्तं श्रितादिप्रकृतिकैः सुबन्तैः सह वा समस्यते स च तत्पुरुषः।
हिन्दी अर्थ: द्वितीया विभक्ति वाले पदों का 'श्रित', 'अतीत', 'पतित', 'गत', 'अत्यस्त', 'प्राप्त' और 'आपन्न' शब्दों के साथ विकल्प से समास होता है।

विस्तृत उदाहरण एवं विश्लेषण:

  1. कृष्णं श्रितः = कृष्णश्रितः (कृष्ण का आश्रय लिया हुआ): यहाँ 'कृष्ण' पद में द्वितीया है और उत्तरपद 'श्रित' है।

  2. दुःखम् अतीतः = दुःखातीतः (दुःख से परे): 'अतीत' शब्द के योग में द्वितीया तत्पुरुष।

  3. नरकं पतितः = नरकपतितः (नरक में गिरा हुआ): 'पतित' शब्द के साथ।

  4. ग्रामं गतः = ग्रामगतः (गाँव को गया हुआ): 'गत' शब्द के साथ।


३. तृतीया तत्पुरुष समास

जब पूर्वपद तृतीया विभक्ति में हो और उत्तरपद के साथ उसका विशेष संबंध हो, तब तृतीया तत्पुरुष होता है।

सूत्र: तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन (२/१/३०)

वृत्ति: तृतीयान्तं तृतीयान्तार्थकृतगुणवचनेनार्थेन च सह वा प्राग्वत्।
व्याख्या: तृतीयान्त सुबन्त का उस तृतीयान्त के अर्थ द्वारा किए गए गुणवाचक शब्द के साथ या 'अर्थ' शब्द के साथ समास होता है।

उदाहरण:

  • शङ्कुलया खण्डः = शङ्कुलाखण्डः (सरोते से काटा गया टुकड़ा): यहाँ काटने का काम 'सरोते' (शङ्कुला) से हुआ है।

  • धान्येन अर्थः = धान्यार्थः (धान्य से प्रयोजन/धन): यहाँ 'अर्थ' शब्द का प्रयोग हुआ है।

महत्वपूर्ण टिप्पणी: सूत्र में 'तत्कृत' (उसके द्वारा किया गया) कहना आवश्यक है। यदि कार्य उस कारक द्वारा न हुआ हो, तो समास नहीं होगा। जैसे—अक्ष्णा काणः (आँख से काना)। यहाँ आँख के द्वारा कानापन 'किया' नहीं गया है, अतः यहाँ समास नहीं होगा।

सूत्र: कर्तृकरणे कृता बहुलम् (२/१/३२)

वृत्ति: कर्तरि करणे च तृतीया कृदन्तेन बहुलं प्राग्वत्।
व्याख्या: कर्ता और करण अर्थ में जो तृतीया विभक्ति होती है, उसका कृदन्त शब्दों के साथ बहुलता से समास होता है।

उदाहरण:

  • नखैः भिन्नः = नखभिन्नः (नाखूनों से फाड़ा हुआ): यहाँ 'नख' करण (Instrument) है।

  • हरिणा त्रातः = हरित्रातः (हरि द्वारा रक्षित): यहाँ 'हरि' कर्ता (Agent) है।


४. चतुर्थी तत्पुरुष समास

सूत्र: चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः (२/१/३६)

वृत्ति: चतुर्थ्यन्तार्थाय यत् तद्वाचिना अर्थादिभिश्च चतुर्थ्यन्तं वा प्राग्वत्।
व्याख्या: चतुर्थ्यन्त पद का समास उसके अर्थ के लिए बनी वस्तु, तथा 'अर्थ', 'बलि', 'हित', 'सुख' और 'रक्षित' शब्दों के साथ होता है।

उदाहरण:

  1. यूपाय दारु = यूपदारु (खंभे के लिए लकड़ी): यहाँ लकड़ी का उद्देश्य खंभा बनाना है।

  2. भूतबलिः (भूतों के लिए बलि)।

  3. गोहितम् (गायों के लिए हितकारी)।

  4. गोरक्षितम् (गायों के लिए रक्षित)।

विशेष नियम (वार्तिक): "तदर्थेन प्रकृतिविकृतिभाव एवेष्टः"।
इसका अर्थ है कि 'तदर्थ' (उसके लिए) वही माना जाएगा जहाँ 'प्रकृति-विकृति' भाव हो (जैसे लकड़ी से खंभा बनना)। इसीलिए "रन्धनाय स्थाली" (पकाने के लिए पतीली) में समास नहीं होता, क्योंकि पतीली लकड़ी की तरह पकने की सामग्री में नहीं बदल जाती।


५. पञ्चमी तत्पुरुष समास

सूत्र: पञ्चमी भयेन (२/१/३७)

व्याख्या: पञ्चम्यन्त सुबन्त का 'भय' प्रकृति वाले शब्दों के साथ समास होता है।
उदाहरण: चोरात् भयम् = चोरभयम् (चोर से डर)।

सूत्र: स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन (२/१/३९)

व्याख्या: स्तोक (थोड़ा), अन्तिक (निकट), दूर और कृच्छ्र (कठिन) शब्दों का क्त-प्रत्ययान्त शब्दों के साथ समास होता है।

सूत्र: पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः (६/३/२)

वृत्ति: अलुगुत्तरपदे।
व्याख्या: स्तोक आदि शब्दों के बाद आने वाली पञ्चमी विभक्ति का 'लुक' (लोप) नहीं होता यदि उत्तरपद परे हो। इसे 'अलुक् तत्पुरुष' कहते हैं।
उदाहरण:

  • स्तोकान्मुक्तः (थोड़े से बचा हुआ)।

  • अन्तिकादागतः (पास से आया हुआ)।


६. षष्ठी तत्पुरुष समास

यह तत्पुरुष समास का सबसे अधिक प्रयोग होने वाला भेद है।

सूत्र: षष्ठी (२/२/८)

वृत्ति: सुबन्तेन प्राग्वत्।
व्याख्या: षष्ठ्यन्त पद का किसी भी समर्थ सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है।
उदाहरण: राज्ञः पुरुषः = राजपुरुषः (राजा का पुरुष)।

विशेष स्थितियाँ: पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे (२/२/१)

व्याख्या: यदि अवयवी (Whole) एकत्व संख्या वाला हो, तो पूर्व, अपर, अधर और उत्तर शब्दों का उसके साथ समास होता है।
उदाहरण: पूर्व कायस्य = पूर्वकायः (शरीर का अगला भाग)।


७. सप्तमी तत्पुरुष समास

सूत्र: सप्तमी शौण्डैः (२/१/४०)

व्याख्या: सप्तम्यन्त पदों का 'शौण्ड' (चतुर/निपुण) आदि शब्दों के साथ समास होता है।
उदाहरण: अक्षेषु शौण्डः = अक्षशौण्डः (जुआ खेलने में चतुर)।


८. कर्मधारय और द्विगु समास (तत्पुरुष के विशेष भेद)

सूत्र: तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः (१/२/४२)

व्याख्या: जब तत्पुरुष समास के दोनों पदों में समान विभक्ति (समानाधिकरण) हो, तो उसे 'कर्मधारय' कहा जाता है।
उदाहरण: नीलम् उत्पलम् = नीलोत्पलम् (नीला कमल)।

सूत्र: संख्यापूर्वी द्विगुः (२/१/५२)

व्याख्या: जिस कर्मधारय समास का पूर्वपद संख्यावाचक हो, उसे 'द्विगु' कहा जाता है।
उदाहरण: पञ्चानां गवां समाहारः = पञ्चगवम् (पाँच गायों का समूह)।


९. नञ् और कु-गति-प्रादि तत्पुरुष

सूत्र: नञ् (२/१/६)

व्याख्या: 'नञ्' अव्यय का समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है।
नियम: उत्तरपद व्यंजन से शुरू हो तो 'न' का 'अ' हो जाता है (जैसे—न ब्राह्मणः = अब्राह्मणः)। यदि स्वर से शुरू हो, तो 'अन' हो जाता है (जैसे—न अश्वः = अनश्वः)।

सूत्र: कुगतिप्रादयः (२/२/१८)

व्याख्या: 'कु' शब्द, गतिसंज्ञक शब्द और 'प्र' आदि उपसर्गों का समर्थ सुबन्तों के साथ नित्य समास होता है।
उदाहरण:

  • कुत्सितः पुरुषः = कुपुरुषः

  • प्रगतः आचार्यः = प्राचार्यः

  • अतिक्रान्तो मालाम् = अतिमालः


१०. उपपद तत्पुरुष समास

सूत्र: तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् (३/१/९२) एवं उपपदमतिङ् (२/२/१९)

व्याख्या: वह सुबन्त पद जो क्रिया के साथ जुड़कर एक विशेष संज्ञा बनाता है, उसे 'उपपद' कहते हैं।
उदाहरण: कुम्भं करोति इति = कुम्भकारः (घड़ा बनाने वाला)। यहाँ 'कुम्भ' उपपद है।


११. समासान्त प्रत्यय और लिंग निर्धारण

तत्पुरुष समास के अंत में कुछ विशेष प्रत्यय जुड़ते हैं, जैसे 'टच्', 'अच्' आदि।

  • राजाहःसखिभ्यष्टच् (५/४/९१): राजन्, अहन् और सखि शब्दों के अंत में 'टच्' प्रत्यय लगता है। (उदाहरण: परमराजः)।

  • परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः (२/४/२६): द्वन्द्व और तत्पुरुष समास का लिंग उत्तरपद के समान होता है। (उदाहरण: मयूरीकुक्कुटाविमौ)।


आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक महत्व

तत्पुरुष समास केवल व्याकरण का नियम नहीं है, बल्कि यह विचारों को संक्षिप्त करने की एक कला है। भारतीय दर्शन और मंत्रों में इसका व्यापक प्रयोग मिलता है।

एक मंत्र उदाहरण:

"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।"

यहाँ 'त्र्यम्बक' शब्द भी एक समास है (त्रीणि अम्बकानि यस्य - हालांकि यह बहुव्रीहि है, पर प्रक्रिया तत्पुरुष जैसी ही है)। तत्पुरुष समास हमें सिखाता है कि कैसे विशेषण और विशेष्य मिलकर एक पूर्ण अर्थ प्रकट करते हैं।


निष्कर्ष

तत्पुरुष समास पाणिनीय व्याकरण का एक विशाल स्तंभ है। द्वितीया से सप्तमी विभक्ति तक के भेदों से लेकर कर्मधारय, द्विगु, नञ् और उपपद तक, यह समास भाषा को सटीकता और गहराई प्रदान करता है। 'राजपुरुषः' से लेकर 'पञ्चगवम्' तक के उदाहरणों के माध्यम से हमने देखा कि कैसे शब्द आपस में जुड़कर नए अर्थों का सृजन करते हैं।

आशा है कि यह विस्तृत आलेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा। संस्कृत व्याकरण के अन्य गूढ़ विषयों के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।

॥ जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ॥


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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