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तद्धित मत्वर्थीय प्रकरण

तद्धित मत्वर्थीय

 संस्कृत व्याकरण का महासमुद्र: तद्धित मत्वर्थीय प्रकरण – एक संपूर्ण मार्गदर्शिका

प्रस्तावना (Introduction)

संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह विज्ञान और दर्शन की जननी है। आचार्य पाणिनी की 'अष्टाध्यायी' में शब्दों की व्युत्पत्ति के जो नियम दिए गए हैं, वे गणितीय सटीकता के साथ कार्य करते हैं। व्याकरण के इसी विशाल साम्राज्य में 'तद्धित प्रत्यय' का एक विशेष स्थान है।

तद्धित प्रत्ययों में भी 'मत्वर्थीय प्रकरण' (Matvarthiya Prakarana) अत्यंत महत्वपूर्ण है। 'मत्वर्थ' का अर्थ है— "वह इसका है" (तदस्य अस्ति) या "वह इसमें है" (तदस्मिन् अस्ति)। जब हम किसी संज्ञा के साथ उसके स्वामित्व या उसमें विद्यमान गुण को प्रकट करना चाहते हैं, तब मत्वर्थीय प्रत्ययों का प्रयोग होता है।

इस लेख में हम आपके द्वारा प्रस्तुत समस्त सूत्रों, उदाहरणों और मत्वर्थीय प्रत्ययों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।


मंगलाचरण

किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में ऋषियों का स्मरण अनिवार्य है:

येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः॥

अर्थ: जिन्होंने साक्षात् महेश्वर से अक्षर-समाम्नाय (वर्णमाला) प्राप्त कर संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन महर्षि पाणिनि को नमस्कार है।


भाग 1: संख्यावाचक और पूरणार्थक प्रत्यय (Ordinal Numbers)

संस्कृत में संख्याओं को 'क्रम' (Order) देने के लिए विशेष प्रत्ययों का विधान है।

1. ड, डट् और पूरण अर्थ के सूत्र

जब हम कहते हैं 'ग्यारहवां', 'बीसवां' या 'तीसवां', तो यहाँ 'पूरण' (Completing the number) का भाव होता है।

  • सूत्र: तस्य पूरणे डट् (4.8.48)

    • उदाहरण: एकादशानां पूरणः = एकादशः (ग्यारहवां)।

    • विशेष: यहाँ 'डट्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। इसी प्रकार 'त्रयस्त्रिंश' (33वाँ) आदि रूप बनते हैं।

  • उदाहरण (एकादश अधिका अस्मिन्निति): एकादशम्

  • उदाहरण (त्रिंशदधिका अस्मिन): त्रिंशच्छतम्

  • विंशम्: विंशति का पूरण 'विंशः' या 'विंशतितमः' दोनों बनते हैं।

2. डटो मट् और नान्तादसंख्यादेर्मट्

  • नियम: जब संख्या 'न्' अन्त वाली हो (जैसे पंचन्, सप्तन्), तो वहाँ 'मट्' आगम होता है।

    • उदाहरण: पञ्चानां पूरणः = पञ्चमः (पाँचवाँ)।

    • उदाहरण: सप्तानां पूरणः = सप्तमः (सातवाँ)।

3. षट्वतिपयचतुरां थुक् (आथुक आगम)

  • नियम: षष्, कतिपय और चतुर् शब्दों से पूरण अर्थ में 'थुक्' आगम होता है।

    • उदाहरण: षण्णां पूरणः = षष्ठः (छठा)। यहाँ 'थ' का 'ठ' हो जाता है।

4. वतोरिथुक और तीय प्रत्यय

  • नियम: 'कति' और 'यावत्' जैसे शब्दों में 'इथुक' आगम होता है।

    • उदाहरण: यावतिथः

  • तीय प्रत्यय: 'द्वि' और 'त्रि' के साथ 'तीय' प्रत्यय लगता है।

    • उदाहरण: द्वयोः पूरणो = द्वितीयः (दूसरा)।

    • उदाहरण: त्रयाणां पूरणः = तृतीयः (तीसरा)।


भाग 2: विंशति और शत सम्बन्धी विशेष नियम

5. विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम्

  • नियम: विंशति (20) से लेकर आगे की संख्याओं में 'तमट्' प्रत्यय विकल्प से होता है।

    • उदाहरण: विंशतितमः (20वाँ) या विंशः।

    • उदाहरण: एकविंशतितमः या एकविंशः।

6. नित्यं शतादिमासार्धमाससंवत्सराच्च

  • नियम: शत (100), मास, अर्धमास और संवत्सर शब्दों के साथ 'तमट्' नित्य (अनिवार्य) होता है।

    • उदाहरण: शतस्य पूरणः = शततमः (100वाँ)।

    • उदाहरण: संवत्सरतमः (वर्ष का पूर्ण करने वाला)।

7. मतौ छः सूक्तसाम्नोः

  • नियम: सूक्त और साम के अर्थ में 'छ' (ईय) प्रत्यय होता है।

    • उदाहरण: अच्छावाकीयसूक्तम् (अच्छावाक ऋषि का सूक्त)।

    • उदाहरण: वारवन्तीयसाम (सामवेद का एक विशिष्ट गान)।

    • गर्दभाण्ड: गर्दभाण्डीयः।


भाग 3: कुशलता, कर्म और मत्वर्थीय 'अण्', 'वुन्', 'कन्'

जब हम किसी व्यक्ति की किसी कार्य में कुशलता या उसके अधिकार की बात करते हैं, तो निम्नलिखित सूत्र प्रयुक्त होते हैं।

8. विमुक्तादिभ्योऽण् और गोषदादिभ्यो वुन्

  • वैमुक्तः: विमुक्त (मोक्ष) से संबंधित।

  • देवासुरः: देव और असुरों से संबंधित।

  • गोषदकः: गोषद् (गौओं में बैठने वाला) + वुन् (अक)।

  • इषेतकः: इषेत्वा (यजुर्वेद का मंत्र) से संबंधित।

9. तत्र कुशलः (पथिकुशलः)

  • नियम: जो किसी मार्ग या विद्या में कुशल हो।

    • उदाहरण: पथि कुशलः = पथिकः (राही या मार्ग का ज्ञाता)।

    • आकर्षः: निकषोपल (कसौटी) के अर्थ में आकर्षकः

10. धनहिरण्यात्कामे और स्वाङ्गेभ्यः प्रसिते

  • नियम: धन या हिरण्य की इच्छा रखने वाले के लिए 'कन्' प्रत्यय।

    • उदाहरण: धने कामः यस्य = धनकः (देवदत्त)।

    • उदाहरण: हिरण्यकः।

  • स्वाङ्ग (अंगों के प्रति आसक्ति): केशेषु प्रसितः = केशकः (जिसे बालों से बहुत प्रेम हो)।


भाग 4: स्वभाव और शारीरिक अवस्था (ठक्, ठञ्, श, न)

11. उदराट्ठगाद्यूने और अंशहारी ठक

  • औदरिकः: जो केवल पेट भरने में लगा रहे (पेटू)।

  • साहसिकः: साहस (अंधाधुंध कार्य) करने वाला। 'ठक्' प्रत्यय।

12. शीतोष्णाभ्यां कारिणि

  • शीतकः: जो धीरे काम करे (अलस/आलसी)।

  • उष्णकः: जो शीघ्रता से कार्य करे (फुर्तीला)।

13. अनुकाभिकाभीकः कमिता

  • नियम: काम (इच्छा) के अर्थ में।

    • अनुकः: पीछे-पीछे चाहने वाला।

    • अभिकः / अभीकः: अत्यंत कामुक या इच्छुक।

14. शृङ्खलमस्य बन्धनं करभे

  • शृङ्खलकः: वह करभ (हाथी का बच्चा या ऊँट) जिसे जंजीरों से बाँधा गया हो।

  • उत्कः: उत्कण्ठित (व्याकुल या उत्सुक)।

15. कुल्माषादञ् और श्रोत्रियं छन्दोऽधीते

  • कौल्माषी: वह स्त्री जिसका मुख्य भोजन कुल्माष (उड़द आदि का अन्न) है।

  • श्रोत्रियः: 'श्रोत्रियं छन्दोऽधीते' - जो वेदों (छन्द) का अध्ययन करता है, वह श्रोत्रिय कहलाता है।


भाग 5: मत्वर्थीय 'मतुप्' प्रत्यय - प्राण और आधार

यह इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। 'तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्'

16. मतुप् प्रत्यय के विविध रूप (वत् और मत्)

  • नियम: जिन शब्दों के अंत में 'अ' या 'आ' हो, वहाँ 'म' का 'व' हो जाता है।

    • उदाहरण:

      • ज्ञान + मतुप् = ज्ञानवान्

      • विद्या + मतुप् = विद्यावान्

      • लक्ष्मी + मतुप् = लक्ष्मीवान्

      • यशस् + मतुप् = यशस्वान्

  • नियम: जहाँ 'अ' या 'आ' न हो, वहाँ 'म' ही रहता है।

    • उदाहरण:

      • गो + मतुप् = गोमान्

      • विदुष् + मतुप् = विदुष्मन् (विद्वान्)

      • धी + मतुप् = धीमान्

17. संज्ञा और विशेष प्रयोग (आसन्दीवत्, उदन्वान्)

  • आसन्दीवान्: वह ग्राम जहाँ आसन्दियाँ (कुर्सियाँ/पीढे) हों।

  • उदन्वान्: 'उदन्वानुदधौ च' - समुद्र के लिए 'उदन्वान्' शब्द का प्रयोग होता है।

  • राजन्वान्: 'राजन्वान् सौराज्ये' - जहाँ अच्छा राजा हो, उस भूमि को राजन्वती भूमि कहते हैं।

18. शारीरिक लक्षण (सिध्मादिभ्यश्च, वत्सांसाभ्याम्)

  • चूडालः / चूडवान्: जिसकी चोटी (शिखा) हो। 'लच्' और 'मतुप्'।

  • सिध्मलः: जिसे सिध्म (एक प्रकार का चर्म रोग) हो।

  • वातुलः: वात (गैस) से प्रभावित।

  • वत्सलः: 'वत्स' (संतान) के प्रति स्नेह रखने वाला।

  • दन्तुरः: 'दन्त उन्नत उरच्' - जिसके दाँत बाहर निकले हुए हों।


भाग 6: इनि, ठन् और विनि प्रत्यय

19. अत इनिठनौ (दण्डी, दण्डिकः)

  • नियम: अकारान्त शब्दों से स्वामित्व दिखाने के लिए 'इनि' और 'ठन्' होते हैं।

    • दण्डी: जिसके पास दण्ड हो।

    • दण्डिकः: दण्ड धारण करने वाला।

    • व्रीही / व्रीहिकः: जिसके पास व्रीहि (चावल) हो।

20. अस्मायामेधास्रजो विनिः

  • यशस्वी: यश + विनि।

  • मायावी: माया + विनि।

  • मेधावी: मेधा + विनि।

  • स्रज्वी: जिसके पास माला (स्रज्) हो।

21. वाचो ग्मिनिः और आलजाटचौ

  • वाग्मी: 'वाचो ग्मिनिः' - जो बोलने में चतुर हो (प्रखर वक्ता)।

  • वाचालः / वाचाटः: 'आलजाटचौ बहुभाषिणि' - जो बहुत अधिक बोलता हो।


भाग 7: विशेष धार्मिक और सामाजिक पद

22. श्राद्धमनेन भुक्तं (इनिठनौ)

  • श्राद्धी / श्राद्धिकः: जिसने श्राद्ध का भोजन किया हो।

  • कृतपूर्वी: जिसने पहले कभी कुछ किया हो (सपूर्वाच्च इनि)।

  • इष्टी / अधीती: जिसने यज्ञ किया हो या जिसने अध्ययन किया हो।

23. साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम्

  • साक्षी: 'साक्षाद् द्रष्टा' - जिसने अपनी आँखों से घटना देखी हो।

24. ज्योतिष्नादि उपसंख्यानम्

  • ज्यौत्स्नः: चाँदनी से युक्त।

  • तामिस्रः: अंधकार से युक्त।

  • शार्करः: शर्करा (कंकड़ या चीनी) से युक्त।


भाग 8: शारीरिक दोष, रोग और मत्वर्थ

25. अर्श आदिभ्यो अच्

  • अर्शसः: जिसे अर्श (बवासीर) का रोग हो।

26. द्वन्द्वोपतापगर्ह्यात् (इनि)

  • कुष्ठी: जिसे कुष्ठ रोग हो।

  • किलासी: जिसे सफेद दाग (किलास) हो।

  • हस्ती: 'हस्ताज्जातौ' - जिसके पास हस्त (सूँड) हो। जाति अर्थ में ही 'हस्ती' (हाथी) होगा, अन्यथा 'हस्तवान् पुरुषः'।

27. स्वामी और ईश्वर्य

  • स्वामी: 'स्वामिन्नैश्वर्ये' - जो ऐश्वर्य का मालिक हो। इसमें 'अमिनच्' प्रत्यय माना गया है।


भाग 9: अन्य विशेष प्रत्यय (भ, युस्, मन्)

  • तुन्दिभः / वलिभः: जिसका पेट (तुन्द) बड़ा हो या जिसकी खाल में झुर्रियां (वलि) हों।

  • अहंयुः: 'अहंशु भमोर्युस्' - जिसमें 'अहं' का भाव (अहंकार) हो।

  • शुभंयुः: जो शुभ से युक्त हो।

  • कंवः / शंभः: कल्याण प्रदान करने वाले।


मत्वर्थीय प्रत्ययों का आध्यात्मिक महत्व

वैदिक मंत्रों में भी इन प्रत्ययों का भरपूर प्रयोग मिलता है। उदाहरण के लिए, भगवान को 'भगवान्' कहा जाता है, क्योंकि उनमें छह प्रकार के 'भग' (ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य) विद्यमान हैं।

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥

यहाँ 'भग' शब्द में 'मतुप्' प्रत्यय लगकर 'भगवान्' शब्द सिद्ध होता है, जो पूर्णता का द्योतक है।


निष्कर्ष (Conclusion)

तद्धित मत्वर्थीय प्रकरण केवल शब्दों की सूची नहीं है, बल्कि यह वस्तु और उसके गुणों के बीच के संबंध को परिभाषित करने का शास्त्र है। 'मतुप्' से लेकर 'ग्मिनि' तक के प्रत्यय हमें बताते हैं कि संस्कृत भाषा कितनी सूक्ष्मग्राही है।

चाहे वह 'साक्षी' जैसा कानूनी शब्द हो, 'श्रोत्रिय' जैसा धार्मिक शब्द हो, या 'वाग्मी' जैसा साहित्यिक शब्द—इन सबकी जड़ें इन्हीं पाणिनीय सूत्रों में निहित हैं।

अव्ययम् निपुणं शास्त्रं तद्धितं नाम कथ्यते।
येन विज्ञातमात्रेण शब्दबोधो भवेत् ध्रुवम्॥

(तद्धित शास्त्र अत्यंत निपुण है, जिसके ज्ञान मात्र से शब्दों का वास्तविक बोध सुनिश्चित हो जाता है।)


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आशा है कि यह विस्तृत आलेख विद्यार्थियों, शोधार्थियों और संस्कृत प्रेमियों के लिए ज्ञानवर्धक सिद्ध होगा।

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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