संस्कृत व्याकरण का अनमोल रत्न: द्वन्द्व समास का विस्तृत एवं गहन विवेचन
प्रस्तावना: समास का स्वरूप और महत्त्व
संस्कृत भाषा विश्व की सबसे वैज्ञानिक और व्यवस्थित भाषा मानी जाती है। इसके व्याकरण का आधार महर्षि पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' है। 'समासनं समासः' अर्थात् संक्षेपीकरण को समास कहते हैं। जब दो या दो से अधिक सुबन्त पद (शब्द) अपनी विभक्तियों का त्याग कर एक पद बन जाते हैं, तो उस प्रक्रिया को समास कहा जाता है।
पाणिनि व्याकरण में समास के मुख्य चार प्रकार माने गए हैं: अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व। इनमें 'द्वन्द्व समास' अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है क्योंकि इसमें 'उभयपद प्रधानता' होती है।
॥ अथ द्वन्द्वः ॥
द्वन्द्व का अर्थ होता है - 'जोड़ा' या 'युगल'। जहाँ दो या दो से अधिक संज्ञाएँ समान रूप से प्रधान हों और 'च' (और) के अर्थ से जुड़ी हों, वहाँ द्वन्द्व समास होता है।
1. मुख्य सूत्र: चार्थे द्वन्द्वः (अष्टाध्यायी 2/2/29)
वृत्ति: अनेकं सुबन्तं चार्थे वर्तमानं वा समस्यते स द्वन्द्वः।
हिन्दी व्याख्या:
यह सूत्र द्वन्द्व समास की आधारशिला है। इसका अर्थ है कि 'च' के अर्थ में विद्यमान अनेक सुबन्त (पद) विकल्प से आपस में मिलकर 'द्वन्द्व समास' बनाते हैं। यहाँ 'विकल्प' का अर्थ है कि वक्ता चाहे तो समास करे या पदों को अलग-अलग (विग्रह रूप में) भी रख सकता है।
'च' के चार अर्थ (Chaturvidha Chartha):
आचार्य पाणिनि और उत्तरवर्ती वैयाकरणों ने 'च' के चार मुख्य अर्थ बताए हैं। इन चारों को समझना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि द्वन्द्व समास केवल अंतिम दो में ही होता है:
समुच्चय (Cumulative): जब दो स्वतंत्र क्रियाएँ या पदार्थ एक साथ आएँ, पर वे एक-दूसरे पर निर्भर न हों।
लक्षण: 'परस्परनिरपेक्षस्यानेकस्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः।'
उदाहरण: ईश्वरं गुरुं च भजस्व (ईश्वर को भजो और गुरु को भी)। यहाँ ईश्वर की भक्ति और गुरु की भक्ति दो अलग-अलग स्वतंत्र कार्य हैं। इनमें समास नहीं होता।
अन्वाचय (Adjunct/Secondary): जहाँ एक कार्य मुख्य हो और दूसरा कार्य उसके साथ प्रासंगिक या गौण रूप से जुड़ जाए।
लक्षण: 'अन्यतरस्यानुषङ्गिकत्वेन अन्वयोऽन्वाचयः।'
उदाहरण: भिक्षामट गां चानय (भिक्षा के लिए जाओ और गाय को भी ले आओ)। यहाँ भिक्षा मुख्य उद्देश्य है, गाय लाना गौण। इसमें भी समास नहीं होता।
इतरेतरयोग (Mutual Connection): जहाँ पदों का समूह एक क्रिया के साथ इस प्रकार जुड़े कि प्रत्येक पद की अपनी अलग सत्ता बनी रहे।
लक्षण: 'मिलितानामन्वय इतरेतरयोगः।'
उदाहरण: धवखदिरौ छिन्धि (धव और खदिर के वृक्षों को काटो)। यहाँ दोनों वृक्षों का अलग-अलग महत्त्व है।
समाहार (Aggregation/Collection): जहाँ पदों का समूह एक 'समूह' या 'इकाई' के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
लक्षण: 'समूहः समाहारः।'
उदाहरण: संज्ञापरिभाषम् (संज्ञा और परिभाषा का समूह)।
2. द्वन्द्व समास में पदों का क्रम (Word Order)
समास करते समय यह प्रश्न उठता है कि किस पद को पहले रखा जाए और किसे बाद में। इसके लिए पाणिनि जी ने विशिष्ट नियम दिए हैं:
(A) राजदन्तादिषु परम् (2/2/31)
वृत्ति: एषु पूर्वप्रयोगार्हं परं स्यात्।
व्याख्या: सामान्यतः जो पद विशेषण होता है या जिसका पूर्व प्रयोग होना चाहिए, 'राजदन्त' गण में आने वाले शब्दों में उसे बाद में रखा जाता है।
उदाहरण: दन्तानां राजा = राजदन्तः (दांतों का राजा)। यहाँ 'राजा' शब्द बाद में प्रयुक्त हुआ है।
विशेष नियम (धर्मादिष्वनियमः): धर्म, अर्थ आदि शब्दों के द्वन्द्व में कोई कड़ा नियम नहीं है। आप अर्थधर्मौ भी कह सकते हैं और धर्मार्थावपि।
(B) द्वन्द्वे घि (2/2/32)
वृत्ति: द्वन्द्वे घिसंज्ञं पूर्वं स्यात्।
व्याख्या: जिस शब्द की 'घि' संज्ञा होती है (ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द, जैसे- हरि, भानु), वह द्वन्द्व समास में पहले आता है।
उदाहरण: हरिश्च हरश्च = हरिहरौ। (यहाँ 'हरि' इकारान्त है, अतः पहले आया)।
(C) अजाद्यदन्तम् (2/2/33)
वृत्ति: द्वन्द्वे पूर्वं स्यात्।
व्याख्या: जो शब्द 'अ' (अच) से शुरू होता हो और 'अ' पर ही समाप्त होता हो (अजादि और अदन्त), उसे समास में पहले रखा जाता है।
उदाहरण: ईशश्च कृष्णश्च = ईशकृष्णौ। (ईश शब्द 'ई' से शुरू है और 'श' में 'अ' है, अतः यह पहले आया)।
(D) अल्पाच्तरम् (2/2/34)
व्याख्या: जिस शब्द में स्वरों (अच) की संख्या कम होती है, वह द्वन्द्व समास में पहले आता है।
उदाहरण: शिवश्च केशवश्च = शिवकेशवौ। ('शिव' में दो स्वर हैं, 'केशव' में तीन। अतः शिव पहले आया)।
3. एकशेष द्वन्द्व: पिता मात्रा (1/2/70)
वृत्ति: मात्रा सहोक्तौ पिता वा शिष्यते।
व्याख्या: जब 'माता' और 'पिता' शब्द का एक साथ प्रयोग किया जाए, तो विकल्प से केवल 'पिता' शब्द ही शेष बचता है और वह द्विवचन में प्रयुक्त होता है।
उदाहरण: माता च पिता च = पितरौ (या मातापितरौ)।
यह सूत्र समाज में पिता के उत्तरदायित्व और परिवार की संरचना को भी दर्शाता है।
4. समाहार द्वन्द्व के विशेष नियम: एकवद्भाव
समाहार द्वन्द्व हमेशा नपुंसक लिंग एकवचन में होता है।
सूत्र: द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् (2/4/2)
वृत्ति: एषां द्वन्द्व एकवत्।
व्याख्या: निम्नलिखित स्थितियों में द्वन्द्व समास 'एकवचन' (समाहार) के रूप में ही प्रयोग किया जाता है:
प्राण्यङ्ग (Body parts): पाणि च पादौ च = पाणिपादम् (हाथों और पैरों का समूह)।
तूर्याङ्ग (Musical Instruments): मार्दङ्गिकश्च वैणविकश्च = मार्दङ्गिकवैणविकम् (मृदंग और बांसुरी बजाने वालों का समूह)।
सेनाङ्ग (Army divisions): रथिकाश्च अश्वारोहाश्च = रथिकाश्वारोहम् (रथियों और घुड़सवारों का समूह)।
5. समासान्त प्रत्यय: द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात्समाहारे (5/4/106)
वृत्ति: चवर्गान्ताद्दषहान्ताच्च द्वन्द्वाट्टच् स्यात्समाहारे।
व्याख्या: यदि किसी समाहार द्वन्द्व समास के अंत में च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ), दकार, षकार या हकार हो, तो उस शब्द के अंत में 'टच्' प्रत्यय जुड़ जाता है।
विभिन्न उदाहरण:
चवर्गान्त: वाक् च त्वक् च = वाक्त्वचम् (वाणी और त्वचा का समूह)। यहाँ 'त्वच्' के 'च' के कारण टच् प्रत्यय लगा।
दकारान्त: शमी च दृषत् च = शमीदृषदम् (शमी का वृक्ष और पत्थर)।
षकारान्त: वाक् च त्विष् च = वाक्त्विषम् (वाणी और दीप्ति)।
हकारान्त: छत्रं च उपानहौ च = छत्रोपानहम् (छाता और जूते)।
मन्त्र और श्लोकों में द्वन्द्व का प्रयोग
संस्कृत वाङ्मय में द्वन्द्व समास का प्रयोग एकता और समन्वय को दर्शाने के लिए किया जाता है।
1. अर्धनारीश्वर स्तोत्र का प्रसिद्ध श्लोक:
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥
यहाँ 'पार्वतीपरमेश्वरौ' में इतरेतर द्वन्द्व समास है। पार्वती च परमेश्वरश्च इति पार्वतीपरमेश्वरौ। यह 'पितरौ' का विशेषण है।
2. गीता में भगवान कृष्ण का कथन:
श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय (विभूति योग) के 33वें श्लोक में भगवान कहते हैं:
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥
भगवान कहते हैं, "समासों में मैं द्वन्द्व समास हूँ।" इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि द्वन्द्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं, जो संसार के द्वैत (प्रकृति-पुरुष, शिव-शक्ति) के सामंजस्य को दर्शाता है।
द्वन्द्व समास के उदाहरणों की विस्तृत व्याख्या
| रामश्च कृष्णश्च | रामकृष्णौ | इतरेतर द्वन्द्व | चार्थे द्वन्द्वः |
| सीता च रामश्च | सीतारामौ | इतरेतर द्वन्द्व | स्त्रीलिङ्ग का पूर्व प्रयोग |
| कन्दश्च मूलं च फलम् च | कन्दमूलफलानि | इतरेतर (बहुवचन) | अनेक सुबन्त पद |
| अहिश्च नकुलश्च | अहिनकुलम् | समाहार द्वन्द्व | जन्मजात वैर वाले प्राणी |
| सुखं च दुःखं च | सुखदुःखे | इतरेतर द्वन्द्व | द्वन्द्व द्विवचन |
समास प्रक्रिया: एक गहन विश्लेषण
जब हम 'हरिहरौ' सिद्ध करते हैं, तो प्रक्रिया इस प्रकार होती है:
लौकिक विग्रह: हरिश्च हरश्च।
अलौकिक विग्रह: हरि + सु, हर + सु।
'चार्थे द्वन्द्वः' सूत्र से समास संज्ञा।
'कृतद्धितसमासाश्च' से प्रातिपदिक संज्ञा।
'सुपो धातुप्रतिपदिकयोः' से विभक्तियों का लुक् (हरि + हर)।
'द्वन्द्वे घि' से 'हरि' (इकारान्त) का पूर्व प्रयोग।
पुनः सु विभक्ति लाकर 'हरिहरौ' रूप सिद्ध होता है।
निष्कर्ष: जीवन में द्वन्द्व का महत्त्व
द्वन्द्व समास केवल व्याकरण का नियम नहीं है, बल्कि यह जीवन के संतुलन का दर्शन है। जहाँ 'अव्ययीभाव' में पूर्व पद हावी होता है और 'तत्पुरुष' में उत्तर पद, वहीं 'द्वन्द्व' हमें सिखाता है कि दो भिन्न अस्तित्व एक साथ मिलकर भी अपनी विशिष्टता बनाए रख सकते हैं।
मुख्य बातें याद रखें:
द्वन्द्व समास में सभी पद प्रधान होते हैं।
इसका विग्रह 'च' के साथ होता है।
इतरेतर द्वन्द्व में लिंग निर्धारण उत्तर पद के अनुसार होता है।
समाहार द्वन्द्व सदैव नपुंसक लिंग एकवचन में रहता है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. द्वन्द्व समास और तत्पुरुष समास में क्या अंतर है?
तत्पुरुष में उत्तर पद प्रधान होता है (जैसे- राजपुरुषः), जबकि द्वन्द्व में दोनों पद समान रूप से प्रधान होते हैं (जैसे- रामलक्ष्मणौ)।
2. 'पितरौ' में कौन सा समास है?
इसमें 'एकशेष द्वन्द्व' समास है, जहाँ माता और पिता में से केवल पिता शब्द शेष रहता है।
3. क्या द्वन्द्व समास में दो से अधिक पद हो सकते हैं?
हाँ, 'चार्थे द्वन्द्वः' सूत्र में 'अनेकं सुबन्तं' कहा गया है, जिसका अर्थ है दो या दो से अधिक कितने भी पद हो सकते हैं (जैसे- रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्नाः)।
लेखक का संदेश:
संस्कृत व्याकरण के ये सूत्र केवल भाषा के नियम नहीं हैं, बल्कि ये ऋषि पाणिनि की उस सूक्ष्म दृष्टि के परिचायक हैं जिन्होंने ध्वनियों और शब्दों को एक सूत्र में पिरोया। 'द्वन्द्व' का अभ्यास हमें भाषा की स्पष्टता और सुंदरता को समझने में मदद करता है।
(नोट: यह ब्लॉग पोस्ट शैक्षणिक और शोध उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। संस्कृत व्याकरण की बारीकियों को समझने के लिए अष्टाध्यायी और लघुसिद्धान्तकौमुदी का निरंतर अभ्यास अनिवार्य है।).
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।