अजन्तनपुंसकलिङ्ग प्रकरण: संस्कृत व्याकरण की गहराई और शब्द रूपों की सिद्धि (अदन्त ज्ञान और इकारान्त वारि शब्द)
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण का आध्यात्मिक और भाषाई महत्त्व
संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की ध्वनियों का विज्ञान है। महर्षि पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' इस विज्ञान का आधार स्तंभ है। जब हम 'अजन्तनपुंसकलिङ्ग' (Ajantha Napumsakalinga) की बात करते हैं, तो हम उन शब्दों के संसार में प्रवेश करते हैं जो स्वर (अच्) से अंत होते हैं और जो न पुरुषवाची हैं, न स्त्रीवाची, बल्कि 'नपुंसक' श्रेणी में आते हैं।
जैसे कि शास्त्रों में कहा गया है:
"शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति।"
अर्थात् जो शब्दब्रह्म (व्याकरण और शब्द विज्ञान) में निपुण हो जाता है, वह परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
आज के इस विस्तृत लेख में हम पाणिनि सूत्रों के माध्यम से 'ज्ञान' (अदन्त) और 'वारि' (इकारान्त) शब्दों की रूप-सिद्धि और उनके पीछे के गूढ़ व्याकरणिक नियमों को समझेंगे।
भाग 1: अदन्त नपुंसकलिङ्ग - 'ज्ञान' शब्द की सिद्धि
अदन्त का अर्थ है जिसके अंत में 'अ' (अकार) हो। 'ज्ञान' शब्द इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। ज्ञान ही वह प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है।
"ज्ञानादेव तु कैवल्यम्" (ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है)।
आइए, ज्ञान शब्द के रूपों की सिद्धि करने वाले सूत्रों का गहराई से विश्लेषण करें।
1. सूत्र: अतोऽम् (7/1/24)
वृत्ति: अतोऽङ्गात् क्लीबात्स्वमोरम्। अमि पूर्वः।
व्याख्या: यह सूत्र कहता है कि अदन्त (अकार से अंत होने वाले) नपुंसक लिंग अंग से परे 'सु' (प्रथमा एकवचन) और 'अम्' (द्वितीया एकवचन) के स्थान पर 'अम्' आदेश होता है। इसके बाद 'अमि पूर्वः' सूत्र से पूर्वरूप एकादेश होकर रूप सिद्ध होता है।
उदाहरण (प्रथमा एकवचन):
ज्ञान + सु → 'अतोऽम्' से सु को 'अम्' आदेश।
ज्ञान + अम् → 'अमि पूर्वः' से (अ+अ = अ)।
रूप: ज्ञानम्।
सम्बोधन (हे ज्ञान):
यहाँ एक विशेष नियम कार्य करता है। 'एङ्-ह्रस्वात् सम्बुद्धेः' सूत्र से सम्बुद्धि के मकार का लोप हो जाता है, जिससे 'हे ज्ञान' रूप बनता है।
2. सूत्र: नपुंसकाच्च (7/1/19)
वृत्ति: क्लीबादौङः शी स्यात्। भसंज्ञायाम्॥
व्याख्या: नपुंसक लिंग अंग से परे 'औ' (प्रथमा/द्वितीया द्विवचन) को 'शी' आदेश होता है। 'शी' में से 'ई' शेष रहता है। यहाँ 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से 'श' की इत्संज्ञा और लोप होता है।
विशेष नियम: यस्येति च (6/4/148)
जब 'ई' परे हो, तब भसंज्ञक इवर्ण या अवर्ण का लोप होना चाहिए। लेकिन यहाँ एक वार्तिक कार्य करता है:
"औङः श्यां प्रतिषेधो वाच्यः।"
अर्थात् 'शी' आदेश होने पर अकार का लोप नहीं होगा।
उदाहरण (प्रथमा/द्वितीया द्विवचन):
ज्ञान + औ → 'नपुंसकाच्च' से औ को 'शी' (ई) आदेश।
ज्ञान + ई → यहाँ वार्तिक से अकार लोप का निषेध हुआ।
ज्ञान + ई → 'आद् गुणः' से (अ + ई = ए)।
रूप: ज्ञाने।
3. सूत्र: जश्शसोः शिः (7/1/20) और शि सर्वनामस्थानम् (1/1/42)
व्याख्या: नपुंसक लिंग से परे 'जस्' और 'शस्' (बहुवचन) को 'शि' आदेश होता है। 'शि' की 'सर्वनामस्थान' संज्ञा होती है।
अगला सूत्र: नपुंसकस्य झलचः (7/1/72)
नपुंसक लिंग अंग को 'नुम्' (न्) का आगम होता है यदि उसके बाद सर्वनामस्थान संज्ञक प्रत्यय (जैसे 'शि') हो।
सूत्र: मिदचोऽन्त्यात्परः (1/1/47)
यह सूत्र बताता है कि 'नुम्' (जो कि मित् है) कहाँ लगेगा? यह शब्द के अंतिम अच् (स्वर) के ठीक बाद लगेगा।
उदाहरण (बहुवचन सिद्धि):
ज्ञान + जस्/शस् → 'जश्शसोः शिः' से 'शि' (इ) आदेश।
ज्ञान + इ → 'नपुंसकस्य झलचः' से 'नुम्' (न्) आगम।
ज्ञा + न् + अ + इ → 'मिदचोऽन्त्यात्परः' के नियम से अकार के बाद 'न्'।
ज्ञानन् + इ → 'सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ' से उपधा को दीर्घ।
रूप: ज्ञानानि।
अन्य उदाहरण: इसी प्रकार 'फल' (फलानि), 'पुष्प' (पुष्पाणि), 'वन' (वनानि) के रूप चलते हैं।
भाग 2: इकारान्त नपुंसकलिङ्ग - 'वारि' (जल) शब्द की सिद्धि
'वारि' का अर्थ है जल। वेदों में जल को देवताओं का रूप माना गया है:
"आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन।" (ऋग्वेद)
इकारान्त (इ से अंत होने वाले) नपुंसक लिंग शब्दों की प्रक्रिया अदन्त शब्दों से थोड़ी भिन्न होती है।
1. सूत्र: स्वमोर्नपुंसकात् (7/1/23)
वृत्ति: लुक् स्यात्।
व्याख्या: नपुंसक लिंग से परे 'सु' और 'अम्' का 'लुक्' (पूर्ण लोप) हो जाता है।
उदाहरण:
वारि + सु → 'स्वमोर्नपुंसकात्' से सु का लोप।
रूप: वारि।
2. सूत्र: इकोऽचि विभक्तौ (7/1/73)
वृत्ति: इगन्तस्य क्लीबस्य नुमचि विभक्तौ।
व्याख्या: यदि अंत में इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) हो और उसके बाद अजादि (स्वर से शुरू होने वाली) विभक्ति हो, तो 'नुम्' का आगम होता है।
द्विवचन (वारिणी):
वारि + औ → 'औ' को 'शी' (ई) आदेश।
वारि + ई → 'इकोऽचि विभक्तौ' से 'नुम्' (न्) का आगम।
वारि + न् + ई → 'अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि' से 'न' को 'ण' आदेश।
रूप: वारिणी।
बहुवचन (वारीणि):
वारि + जस्/शस् → 'शि' (इ) आदेश।
वारि + इ → 'नुम्' आगम और 'सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ' से इकार को दीर्घ (ई)।
वारी + न् + इ → णत्व विधान।
रूप: वारीणि।
3. विशेष सम्बोधन नियम (हे वारे / हे वारि)
सम्बोधन में 'न लुमताङ्गस्य' सूत्र के अनित्य होने के कारण विकल्प से 'गुण' होता है।
जब गुण होगा: हे वारे।
जब गुण नहीं होगा: हे वारि।
4. तृतीया विभक्ति और नुम् का विशेष वार्तिक
सूत्र: वारिणा
वारि + टा (आ) → नुम् आगम → वारिन् + आ → णत्व → वारिणा।
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण वार्तिक आता है जो प्रतियोगी परीक्षाओं और विद्वानों के लिए आवश्यक है:
"वृद्ध्यौत्त्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन।"
अर्थ: वृद्धि, औत्व, तृज्वद्भाव और गुण — इन सबके प्राप्त होने पर भी, 'नुम्' आगम पहले होगा (विप्रतिषेध नियम के अनुसार)।
उदाहरण (चतुर्थी एकवचन):
वारि + ङे (ए) → यहाँ 'घेर्डिति' से गुण प्राप्त था, लेकिन वार्तिक के कारण पहले 'नुम्' हुआ।
वारि + न् + ए = वारिणे।
पंचमी/षष्ठी: वारिणः।
षष्ठी बहुवचन: वारि + नाम् → वारीणाम् (नुट् और दीर्घ)।
सप्तमी: वारिणि।
भाग 3: व्यावहारिक उदाहरण और अन्य शब्द
नपुंसक लिंग के ये नियम केवल 'ज्ञान' और 'वारि' तक सीमित नहीं हैं। संस्कृत साहित्य के हजारों शब्द इन्हीं ढांचों पर आधारित हैं।
अदन्त (ज्ञान के समान) शब्द:
पुष्प (Flower): पुष्पाणि देवानामर्चनार्थं उपयुज्यन्ते। (फूलों का उपयोग देव पूजन के लिए होता है।)
फल (Fruit): कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं।)
धन (Wealth): विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्। (विद्या रूपी धन सभी धनों में श्रेष्ठ है।)
इकारान्त (वारि के समान) शब्द:
शुचि (Pure): शुचीनि कर्माणि कुरु। (पवित्र कर्म करो।)
दधि (Curd): दधि स्वास्थ्यप्रदं भवति। (दही स्वास्थ्यवर्धक होता है।)
अस्थि (Bone): दधीचस्य अस्थीनि। (दधीचि की हड्डियां।)
भाग 4: तुलनात्मक अध्ययन - पुंवद्भाव (शेषं पुंवत्)
लेख में कहा गया है—"शेषं पुंवत्"। इसका अर्थ है कि तृतीया विभक्ति से लेकर सप्तमी तक के वे रूप जहाँ 'नुम्' आगम के विशेष नियम नहीं लगते, वे पुल्लिंग के समान ही चलते हैं। लेकिन नपुंसक लिंग में 'नुम्' आगम का प्रभाव इसे पुल्लिंग (जैसे 'हरि') से अलग कर देता है।
उदाहरण तुलना:
हरि (पुल्लिंग) तृतीया: हरिणा
वारि (नपुंसक) तृतीया: वारिणा
(यहाँ समानता दिखती है, लेकिन चतुर्थी में भेद स्पष्ट हो जाता है)
हरि (चतुर्थी): हरये (गुण हुआ)
वारि (चतुर्थी): वारिणे (नुम् हुआ, गुण बाधित हुआ)
भाग 5: आध्यात्मिक एवं दार्शनिक निष्कर्ष
व्याकरण के ये सूत्र केवल भाषा के नियम नहीं हैं, बल्कि यह मन के अनुशासन की प्रक्रिया है। जब हम 'ज्ञानम्' शब्द की सिद्धि करते हैं, तो हम सीखते हैं कि कैसे एक मूल धातु ('ज्ञा') प्रत्ययों और आगमों के साथ मिलकर एक पूर्ण अर्थ धारण करती है।
शांति मंत्र:
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
जैसे पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, वैसे ही संस्कृत व्याकरण में एक मूल प्रकृति से अनेक रूपों की सिद्धि होती है, फिर भी मूल अर्थ स्थिर रहता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
अजन्तनपुंसकलिङ्ग प्रकरण संस्कृत व्याकरण का वह भाग है जो हमें सिखाता है कि कैसे सूक्ष्म 'अ' और 'इ' शब्दों के साथ मिलकर विभक्तियों के अनुसार अपना स्वरूप बदलते हैं। 'अतोऽम्' से लेकर 'नुम्' आगम तक की यह यात्रा भाषा की शुद्धता और स्पष्टता को बनाए रखती है।
यदि आप संस्कृत के विद्यार्थी हैं या प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखते हैं, तो इन सूत्रों का अभ्यास आपकी भाषाई समझ को एक नई ऊंचाई प्रदान करेगा।
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वारि शब्द रूप सिद्धि
हमें उम्मीद है कि यह विस्तृत लेख आपके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। व्याकरण के अन्य कठिन विषयों को सरलता से समझने के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।