अच्सन्धि-प्रकरणम्: पाणिनीय व्याकरण का विस्तृत विवेचन
मंगलाचरण
नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्।
पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम्॥
संस्कृत वाङ्मय में व्याकरण को 'वेदांग' माना गया है। मुखं व्याकरणं स्मृतम्—अर्थात् व्याकरण वेदों का मुख है। शब्दों की शुद्धि और पदों की सिद्धि के लिए सन्धि का ज्ञान अनिवार्य है। प्रस्तुत लेख में हम 'अच्सन्धि' (स्वर सन्धि) के समस्त सूत्रों की व्याख्या, उनकी प्रक्रिया और उदाहरणों का सांगोपांग वर्णन करेंगे।
1. यण-सन्धि (Yan Sandhi)
अच्सन्धि के प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम सन्धि 'यण-सन्धि' है। इसके लिए पाणिनी के अष्टाध्यायी में अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है।
सूत्र: इको यणचि (6/1/77)
वृत्ति: इकः स्थाने यण् स्यादचि संहितायां विषये।
हिन्दी अर्थ: संहिता (परः सन्निकर्षः संहिता) के विषय में, यदि 'इक्' प्रत्याहार (इ, उ, ऋ, ऌ) के बाद कोई 'अच्' (स्वर) विद्यमान हो, तो 'इक्' के स्थान पर 'यण्' (य्, व्, र्, ल्) आदेश हो जाता है।
उदाहरण परिस्थिति: 'सुधी + उपास्य'
यहाँ 'सुधी' का अन्तिम वर्ण 'ई' (इक्) है और उसके बाद 'उपास्य' का प्रथम वर्ण 'उ' (अच्) है। अतः यहाँ यण-सन्धि की प्राप्ति होती है।
सहायक सूत्र: तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (1/1/66)
वृत्ति: सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यं वर्णान्तरेणाव्यवहितस्य पूर्वस्य बोध्यम्।
हिन्दी अर्थ: व्याकरण शास्त्र में जहाँ सप्तमी विभक्ति (जैसे 'अचि') द्वारा निर्देश किया जाता है, वहाँ वह कार्य अव्यवहित (बिना किसी व्यवधान के) पूर्व वर्ण के स्थान पर होता है। अतः 'अचि' परे होने पर 'इक्' को ही यण् होगा।
सूत्र: स्थानेऽन्तरतमः (1/1/50)
वृत्ति: प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: जब एक स्थानी के स्थान पर कई आदेश प्राप्त हों, तो जो सबसे अधिक 'सदृश' (समान उच्चारण स्थान वाला) हो, वही आदेश होता है।
'इ/ई' (तालु) = यकार (तालु)
'उ/ऊ' (ओष्ठ) = वकार (ओष्ठ)
'ऋ/ॠ' (मूर्धा) = रेफ (मूर्धा)
'ऌ' (दन्त) = लकार (दन्त)
स्थिति: सु ध् य् + उपास्य।
सूत्र: अनचि च (8/4/47)
वृत्ति: अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि।
हिन्दी अर्थ: अच् (स्वर) से परे 'यर' प्रत्याहार के वर्ण को विकल्प से द्वित्व (दो बार) हो जाता है, बशर्ते उसके बाद कोई अच् न हो।
यहाँ 'सु' के 'उ' (अच्) से परे 'ध' (यर) है, अतः 'ध' को द्वित्व होकर 'सुध् ध् य् + उपास्य' बना।
सूत्र: झलां जश् झशि (8/4/53)
वृत्ति: स्पष्टम्। (झशि परे झलां जशः स्युः)।
हिन्दी अर्थ: झश् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर 'जश्' आदेश हो जाता है। यहाँ 'ध' (झल्) के बाद 'ध' (झश्) है, अतः प्रथम 'ध' के स्थान पर 'द' (जश्) हो गया।
स्थिति: सु द् ध् य् + उपास्य।
सूत्र: संयोगान्तस्य लोपः (8/2/23)
वृत्ति: संयोगान्तं यत्पदं तदन्तस्य लोपः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: जिस पद के अंत में 'संयोग' (हलन्तराः संयोगः) हो, उस सम्पूर्ण पद के अंत का लोप होना चाहिए। यहाँ 'सुद्ध्य्' के अंत में यकार का लोप प्राप्त हुआ।
सूत्र: अलोऽन्त्यस्य (1/1/52)
वृत्ति: षष्ठीनिर्दिष्टाऽन्त्यस्याल आदेशः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: आदेश षष्ठी विभक्ति द्वारा निर्दिष्ट स्थानी के अंतिम 'अल्' (वर्ण) के स्थान पर ही होता है।
वार्तिक: यणः प्रतिषेधो वाच्यः
हिन्दी अर्थ: संयोग के अंत में यदि 'यण्' (य्, व्, र्, ल्) हो, तो उसका लोप नहीं करना चाहिए।
अतः यकार का लोप रुक गया और रूप सिद्ध हुआ: सुद्ध्युपास्यः (भगवान की अच्छी उपासना करने वाला)।
2. यण-सन्धि के अन्य प्रमुख उदाहरण
मध्वरि (विष्णु का शत्रु)
प्रक्रिया: मधु + अरि
इको यणचि से 'उ' के स्थान पर 'व्' आदेश।
स्थानेऽन्तरतमः से उच्चारण स्थान की समानता।
अनचि च से 'ध' को द्वित्व (म द् ध् व् + अरि)।
झलां जश् झशि से 'द' आदेश।
रूप: मध्वरिः
धात्रंशः (ब्रह्मा का अंश)
प्रक्रिया: धातृ + अंश
'ऋ' के स्थान पर 'र्' आदेश।
रूप: धात्रंशः
लाकृतिः (ऌ जैसी आकृति)
प्रक्रिया: ऌ + आकृति
'ऌ' के स्थान पर 'ल्' आदेश।
रूप: लाकृतिः
3. अयादि-सन्धि (Ayadi Sandhi)
सूत्र: एचोऽयवायावः (6/1/78)
वृत्ति: एचः क्रमादय, अव, आय, आव एते स्युरचि।
हिन्दी अर्थ: अच् परे होने पर 'एच्' (ए, ओ, ऐ, औ) के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् आदेश होते हैं।
सूत्र: यथासंख्यमनुदेशः समानाम् (1/3/10)
वृत्ति: समसम्बन्धी विधिर्यथासंख्यं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: जहाँ स्थानी और आदेश की संख्या समान हो, वहाँ क्रम के अनुसार कार्य होता है।
ए = अय्
ओ = अव्
ऐ = आय्
औ = आव्
उदाहरण:
हरये: हरे + ए → ह् + अय् + ए = हरये (विष्णु के लिए)।
विष्णवे: विष्णो + ए → विष्ण् + अव् + ए = विष्णवे (विष्णु के लिए)।
नायकः: नै + अकः → न् + आय् + अकः = नायकः (नेता)।
पावकः: पो + अकः → प् + आव् + अकः = पावकः (अग्नि)।
4. वान्त-सन्धि और विशेष वार्तिक
सूत्र: वान्तो यि प्रत्यये (6/1/79)
वृत्ति: यकारादौ प्रत्यये परे ओदौतोरव् आव् एतौ स्तः।
हिन्दी अर्थ: यदि बाद में 'यकार' से शुरू होने वाला कोई 'प्रत्यय' हो, तो 'ओ' को 'अव्' और 'औ' को 'आव्' आदेश हो जाता है।
उदाहरण:
गव्यम्: गो + यम् (ओ को अव्) = गव्यम्।
नाव्यम्: नौ + यम् (औ को आव्) = नाव्यम्।
वार्तिक: अध्वपरमाणे च
हिन्दी अर्थ: यदि मार्ग की दूरी (परिमाण) बतानी हो, तो 'गो' शब्द के बाद 'यूति' शब्द आने पर 'ओ' को 'अव्' आदेश हो जाता है।
उदाहरण: गव्यूतिः (कोश भर की दूरी)।
5. गुण-सन्धि (Guna Sandhi)
सूत्र: अदेङ् गुणः (1/1/2)
हिन्दी अर्थ: 'अ' (ह्रस्व) और 'एङ्' (ए, ओ) की 'गुण' संज्ञा होती है।
सूत्र: तपरस्तत्कालस्य (1/1/70)
हिन्दी अर्थ: जिस स्वर के बाद 'त्' लगा हो, वह केवल अपने ही काल (ह्रस्व/दीर्घ/प्लुत) का बोध कराता है।
सूत्र: आद्गुणः (1/6/87)
वृत्ति: अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेशः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: 'अ' या 'आ' के बाद यदि कोई भी 'अच्' (स्वर) आए, तो दोनों के स्थान पर एक 'गुण' एकादेश (अ, ए, ओ) हो जाता है।
उदाहरण:
उपेन्द्रः: उप + इन्द्रः (अ + इ = ए) = उपेन्द्रः।
गङ्गोदकम्: गङ्गा + उदकम् (आ + उ = ओ) = गङ्गोदकम्।
सूत्र: उपदेशेऽजनुनासिक इत् (1/3/2)
हिन्दी अर्थ: उपदेश अवस्था में जो 'अच्' अनुनासिक होता है, उसकी 'इत्' संज्ञा होती है।
सूत्र: उरण रपरः (1/1/51)
हिन्दी अर्थ: 'ऋ' के स्थान पर होने वाला 'अण्' (अ, इ, उ) 'र्' या 'ल्' के साथ ही आता है।
उदाहरण:
कृष्णर्द्धि: कृष्ण + ऋद्धि (अ + ऋ = अर्) = कृष्णर्द्धिः।
तवल्कारः: तव + ऌकारः (अ + ऌ = अल्) = तवल्कारः।
6. शाकल्य ऋषि का मत और लोप
सूत्र: लोपः शाकल्यस्य (8/3/19)
वृत्ति: अवर्णपूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्लोपो वाशि परे।
हिन्दी अर्थ: पद के अंत में स्थित 'य्' और 'व्' (जिनके पहले अ या आ हो) का 'अश्' प्रत्याहार परे होने पर विकल्प से लोप हो जाता है।
सूत्र: पूर्वत्रासिद्धम् (8/2/1)
वृत्ति: सपादसप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा।
हिन्दी अर्थ: अष्टाध्यायी के शुरू के सवा सात अध्यायों के प्रति बाद के तीन पाद (त्रिपादी) असिद्ध होते हैं।
उदाहरण: हर इह, हरयिह। विष्ण इह, विष्णविह।
7. वृद्धि-सन्धि (Vriddhi Sandhi)
सूत्र: वृद्धिरादैच् (1/1/1)
हिन्दी अर्थ: आ, ऐ, और औ की 'वृद्धि' संज्ञा होती है।
सूत्र: वृद्धिरेचि (6/1/88)
वृत्ति: आदेचि परे वृद्धिरेकादेशः स्यात्। गुणापवादः।
हिन्दी अर्थ: 'अ/आ' से 'एच्' (ए, ओ, ऐ, औ) परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर 'वृद्धि' एकादेश हो जाता है।
उदाहरण:
कृष्णैकत्वम्: कृष्ण + एकत्वम् (अ + ए = ऐ) = कृष्णैकत्वम्।
गङ्गौघः: गङ्गा + ओघः (आ + ओ = औ) = गङ्गौघः।
देवैश्वर्यम्: देव + ऐश्वर्यम् (अ + ऐ = ऐ) = देवैश्वर्यम्।
कृष्णौत्कण्ठ्यम्: कृष्ण + औत्कण्ठ्यम् (अ + औ = औ) = कृष्णौत्कण्ठ्यम्।
सूत्र: एत्येधत्यूठ्सु (6/1/89)
हिन्दी अर्थ: अवर्ण से परे यदि 'इण्' या 'एधृ' धातु के वर्ण या 'ऊठ्' हो, तो वृद्धि आदेश होता है।
उदाहरण: उपैति, उपैधते, प्रष्ठौहः।
विशेष वार्तिक (वृद्धि के अपवाद):
अक्षादूहन्यामुपसंख्यानम्: अक्ष + ऊहिनी = अक्षौहिणी (सेना)।
प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु: प्र + ऊह = प्रौहः, प्र + ऊढः = प्रौढः।
ऋते च तृतीयासमासे: सुख + ऋतः = सुखार्तः (सुख से पीड़ित/युक्त)।
प्रवत्सतरकम्बलवसनार्णदशानामृणे: ऋण + ऋणम् = ऋणार्णम्।
8. उपसर्ग एवं धातु संज्ञान
सन्धि प्रक्रिया में उपसर्गों का विशेष महत्व है।
सूत्र: उपसर्गाः क्रियायोगे (1/4/59)
हिन्दी अर्थ: 'प्र' आदि 22 शब्दों की 'उपसर्ग' संज्ञा तब होती है जब वे क्रिया के साथ जुड़ते हैं।
(प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप)।
सूत्र: भूवादयो धातवः (1/3/1)
हिन्दी अर्थ: 'भू' आदि क्रियावाचक शब्दों की 'धातु' संज्ञा होती है।
सूत्र: उपसर्गादृति धातौ (6/1/91)
हिन्दी अर्थ: अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि धातु परे होने पर वृद्धि होती है।
उदाहरण: प्र + ऋच्छति = प्रार्च्छति।
9. पररूप और पूर्वरूप सन्धि
सूत्र: एङि पररूपम् (6/1/94)
वृत्ति: आदुपसर्गादेङादौ धातौ पररूपमेकादेशः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: अवर्णान्त उपसर्ग के बाद यदि ए/ओ से शुरू होने वाली धातु हो, तो 'पररूप' (बाद वाला वर्ण) हो जाता है।
उदाहरण: प्र + एजते = प्रेजते, उप + ओषति = उपोषति।
सूत्र: अचोऽन्त्यादि टि (1/1/64)
हिन्दी अर्थ: शब्दों के अचों (स्वरों) में जो अंतिम अच् है, वह जिसके आदि में हो, उस समुदाय की 'टि' संज्ञा होती है।
वार्तिक: शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्
हिन्दी अर्थ: शकन्धु आदि गण के शब्दों में 'टि' को पररूप होता है।
उदाहरण:
शक + अन्धुः = शकन्धुः
कर्क + अन्धुः = कर्कन्धुः
मनस् + ईषा = मनीषा
मृत + अण्डः = मार्त्तण्डः
सूत्र: ओमाङ्गोश्च (6/1/95)
हिन्दी अर्थ: 'अ' के बाद 'ओम्' या 'आङ्' (आ) आने पर पररूप होता है।
उदाहरण: शिवाय + ओम् = शिवायोम्।
सूत्र: एङः पदान्तादति (6/1/109)
हिन्दी अर्थ: पदान्त 'ए' या 'ओ' के बाद ह्रस्व 'अ' आए, तो 'पूर्वरूप' (पहले वाला वर्ण) हो जाता है और 'अ' के स्थान पर अवग्रह (ऽ) लग जाता है।
उदाहरण: हरे + अव = हरेऽव, विष्णो + अव = विष्णोऽव।
10. प्रकृतिभाव और प्रगृह्य संज्ञा
प्रकृतिभाव का अर्थ है - सन्धि कार्य की प्राप्ति होने पर भी सन्धि न करना, जैसा है वैसा ही रहना।
सूत्र: ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (1/1/11)
हिन्दी अर्थ: ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचन पदों की 'प्रगृह्य' संज्ञा होती है।
उदाहरण:
हरी एतौ (दो हरि ये)
विष्णू इमौ (दो विष्णु ये)
गङ्गे अमू (दो गंगा वे)
सूत्र: प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् (6/1/125)
हिन्दी अर्थ: प्लुत और प्रगृह्य संज्ञक वर्णों के बाद अच् होने पर सन्धि नहीं होती (प्रकृतिभाव)।
सूत्र: अदसो मात् (1/1/12)
हिन्दी अर्थ: 'अदस्' शब्द के 'म्' के बाद आने वाले 'ई' और 'ऊ' की प्रगृह्य संज्ञा होती है।
उदाहरण: अमी ईशाः।
निपात संज्ञा और प्रगृह्य:
चादयोऽसत्त्वे (1/4/57): द्रव्य से भिन्न अर्थ वाले 'च' आदि की 'निपात' संज्ञा होती है।
निपात एकाजनाङ् (1/1/14): 'आङ्' को छोड़कर एक स्वर वाले निपात की प्रगृह्य संज्ञा होती है। जैसे: इ इन्द्रः, उ उमेशः।
ओत् (1/1/15): ओकारान्त निपात प्रगृह्य होता है। जैसे: अहो ईशाः।
सूत्र: सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे (1/1/16)
हिन्दी अर्थ: संबोधन के 'ओ' के बाद यदि 'इति' शब्द हो, तो विकल्प से प्रगृह्य संज्ञा होती है।
उदाहरण: विष्णो इति (प्रकृतिभाव) या विष्णविति (अयादि सन्धि)।
11. सवर्ण दीर्घ सन्धि (Savarna Dirgha Sandhi)
सूत्र: अकः सवर्णे दीर्घः (6/1/101)
वृत्ति: अकः सवर्णेऽचि परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: 'अक्' प्रत्याहार (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) के बाद यदि वही समान स्वर (सवर्ण) आए, तो दोनों के स्थान पर दीर्घ एकादेश हो जाता है।
उदाहरण:
दैत्यारिः: दैत्य + अरिः (अ + अ = आ) = दैत्यारिः।
श्रीशः: श्री + ईशः (ई + ई = ई) = श्रीशः।
विष्णूदयः: विष्णु + उदयः (उ + उ = ऊ) = विष्णूदयः।
होतृकारः: होतृ + ऋकारः (ऋ + ऋ = ॠ) = होतृकारः।
12. विशेष सूत्र और सन्धि विकल्प
सूत्र: अवङ् स्फोटायनस्य (6/1/133)
हिन्दी अर्थ: स्फोटायन ऋषि के अनुसार पदान्त 'गो' शब्द को अच् परे होने पर विकल्प से 'अवङ्' आदेश होता है।
उदाहरण: गवाग्रम् (गो + अग्रम्)।
सूत्र: इन्द्रे च (6/1/124)
हिन्दी अर्थ: 'इन्द्र' शब्द परे होने पर 'गो' को नित्य 'अव्' होता है।
उदाहरण: गो + इन्द्र = गवेन्द्रः।
सूत्र: इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च (6/1/127)
हिन्दी अर्थ: असवर्ण अच् परे होने पर पदान्त इक् को विकल्प से ह्रस्व होता है और सन्धि नहीं होती।
उदाहरण: चक्रि अत्र (विकल्प में चक्र्यत्र)।
सूत्र: ऋत्यकः (6/1/128)
हिन्दी अर्थ: पदान्त 'अक्' के बाद 'ऋ' होने पर विकल्प से ह्रस्व होता है।
उदाहरण: ब्रह्मा + ऋषिः = ब्रह्म ऋषिः (ह्रस्व पक्ष), ब्रह्मर्षिः (गुण पक्ष)।
निष्कर्ष (Conclusion)
अच्सन्धि का यह विस्तृत विवेचन हमें यह सिखाता है कि संस्कृत भाषा कितनी वैज्ञानिक और नियमों में बंधी हुई है। भगवान पाणिनी के ये सूत्र केवल शब्दों को जोड़ने के नियम नहीं हैं, बल्कि यह ध्वनिविज्ञान का चरम शिखर है।
चाहे वह 'इको यणचि' से शुरू होने वाली यण सन्धि हो या 'अकः सवर्णे दीर्घः' की सरलता, प्रत्येक सूत्र का अपना एक गौरव है। 'सुद्ध्युपास्यः' जैसे पदों की सिद्धि व्याकरण के उस सूक्ष्म परिश्रम को दर्शाती है जो हमारे ऋषियों ने भाषा की शुद्धता बनाए रखने के लिए किया था।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
इस लेख के माध्यम से आप संस्कृत व्याकरण की अच्सन्धि प्रक्रिया को गहराई से समझ सकते हैं। यह अध्ययन प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे NET, JRF, CTET, TGT, PGT) और संस्कृत के जिज्ञासुओं के लिए अत्यंत फलदायी सिद्ध होगा।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।